Month: October 2026

आधुनिक भारत में नारी व बहुजन शिक्षा की अग्रदूत,राष्ट्रमाता फातिमा शेख

उन्नीसवीं सदी का भारत जब सामाजिक संकीर्णताओं, वर्ण-व्यवस्था, पितृसत्तात्मक जकड़न और अज्ञानता के घोर अंधकार में डूबा हुआ था, तब समाज के हाशिए पर खड़े शूद्रों, अति-शूद्रों, वंचितों और आधी…

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस समारोह संपन्न

मकराना। समता समता सैनिक दल तहसील शाखा मकराना के तत्वावधान में 11 अक्टूबर 2026 रविवार को दल के मकराना स्थित कार्यालय में अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस समारोह मनाया गया। समारोह को…

मेरिट का मायाजाल और थैलीशाहों का तिलिस्म: जब बैंक बैलेंस के आगे योग्यता शून्य हो जाती है

(भारतीय चिकित्सा शिक्षा में पूँजी का एकाधिकार, वंचितों का संघर्ष और स्वास्थ्य व्यवस्था का यथार्थ) लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहन लाल सिंगारिया आमुख: मेरिट का ढोल और धरातल की हकीकत…

ओटीटी और थिएटर नहीं, यूट्यूब पर रिलीज हुई फिल्म “बेघर” – 11 दिनों में 1 लाख व्यूज पार

जयपुर । जयपुर की रहने वाली अभिनेत्री आकांक्षा यादव की हिंदी फीचर फिल्म ‘बेघर’ इन दिनों सुर्खियों में है। असम के फिल्ममेकर कंगकन बोरा द्वारा निर्देशित इस फिल्म को ओटीटी…

बहुजन महिला की हसरतों का सच, पराए मर्द के धोखे से बेहतर है अपना सादा जीवन साथी

भूमिकाअभावों की भट्ठी में सुलगा बचपन और भय का सायाबहुजन और वंचित समाज की एक बेटी का जीवन किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं होता। जन्म लेते ही उसे विरासत…

सामाजिक परिवर्तन के युगदृष्टा: मान्यवर कांशीराम और चेतना की क्रांति

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहन लाल सिंगारिया डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)यह आलेख मान्यवर कांशीराम जी के जीवन, उनके सामाजिक संघर्ष, वैचारिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक योगदान पर आधारित एक वस्तुनिष्ठ, अकादमिक और सामाजिक-ऐतिहासिक…

छूमंतर हुए पुराने जख्म: टूटे ख्वाबों के मलबे से उठकर एक गरिमापूर्ण आशियाना बनाने की कहानी।

राख से उगी चिंगारी: एक बहुजन बेटी के स्वाभिमान और आत्म-खोज की गाथा उसने इन शब्दों में कहा !मैंने जब से होश संभाला, दुनिया को एक अलग नजरिए से देखा।…

जिस ग़ुरूर को हकीकत माना, बुढ़ापे की बेरुखी ने उसे महज़ एक भावुक सपना बना दिया।

स्त्री के जीवन के तीन ग़ुरूर (अभिमान)!एक औरत के जीवन यात्रा को यदि ध्यान से देखा जाए, तो उसके आत्म-गौरव के तीन मुख्य पड़ाव आते हैं: मातृत्व का सर्वोच्च त्याग:…

“मेरा अंतिम ग़ुरूर” — एक माँ की आत्मकथा

मैं आज शीशे के सामने खड़ी थी। बहुत दिनों बाद खुद को इतनी देर तक देखा। आँखों के नीचे काले घेरे, चेहरे पर झुर्रियों की लकीरें और यह बेडौल सा…

ऊँची ड्योढ़ी, कड़ा पहरा: गाँव-जवार में वंचितों की सामाजिक हैसियत!

भूमिकासदियों के शोषण और प्रताड़ना की आग में झुलसा बहुजन-वंचित समाज आज भी हक-हिस्सेदारी के लिए छटपटा रहा है। संसाधनों पर तथाकथित उच्च वर्ग के कब्जे ने उन्हें अपनी ही…