उन्नीसवीं सदी का भारत जब सामाजिक संकीर्णताओं, वर्ण-व्यवस्था, पितृसत्तात्मक जकड़न और अज्ञानता के घोर अंधकार में डूबा हुआ था, तब समाज के हाशिए पर खड़े शूद्रों, अति-शूद्रों, वंचितों और आधी आबादी (महिलाओं) के लिए शिक्षा के कपाट खोलने का बीड़ा महात्मा ज्योतिराव फुले और क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले ने उठाया।

इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक सामाजिक क्रांति की सबसे मजबूत, साहसी और अडिग सहयात्री बनकर जो विभूति इतिहास के पटल पर उभरीं, वे थीं—राष्ट्रमाता फातिमा शेख।

वे न केवल आधुनिक भारत की प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका थीं, बल्कि बहुजन मुक्ति आंदोलन, दलित-मुस्लिम साझी चेतना और स्त्री-शिक्षा क्रांति की अमर दीपशिखा थीं।

जन्म एवम पारिवारिक पृष्ठभूमि
जन्म तिथि: 9 जनवरी 1831
जन्म स्थान: पुणे (महाराष्ट्र)

पारिवारिक पृष्ठभूमि
फातिमा शेख का जन्म पुणे के एक स्वाभिमानी, संवेदनशील और प्रगतिशील मुस्लिम परिवार में हुआ था।

तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों, पितृसत्तात्मक संरचना और इतिहास-लेखकों की उपेक्षा के कारण उनके माता-पिता के विस्तृत व्यक्तिगत नाम और दस्तावेज बहुत अधिक लिपिबद्ध नहीं हो सके, परंतु उनका परिवार मानवीय मूल्यों, आपसी सौहार्द और समतावादी सोच से ओत-प्रोत था।

भाई उस्मान शेख का ऐतिहासिक संबल

फातिमा शेख के बड़े भाई उस्मान शेख ज्योतिराव फुले के अत्यंत घनिष्ठ मित्र और समतावादी विचारक थे।

उस दौर में जब मुस्लिम समाज के भीतर भी पर्दा प्रथा और बालिकाओं को घर की चहारदीवारी में कैद रखने की कठोर पाबंदियाँ थीं, तब उस्मान शेख ने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ते हुए अपनी बहन फातिमा शेख को पढ़ने-लिखने की पूरी स्वतंत्रता दी और उनके हर सामाजिक कदम में ढाल बनकर साथ खड़े रहे।

प्रारंभिक शिक्षा एवं उच्च शिक्षक-प्रशिक्षण

उस दौर में जब बहुजन और मुस्लिम कन्याओं का अक्षराभ्यास करना भी धर्म और परंपरा के विरुद्ध मानकर अक्षम्य अपराध घोषित किया जाता था, फातिमा शेख ने असाधारण लगन से ज्ञान प्राप्त किया:

प्रारंभिक शिक्षा
अपने भाई उस्मान शेख की छत्रछाया में उन्होंने घर पर ही बुनियादी तालीम हासिल की।

तीव्र मेधा की धनी फातिमा शेख ने मराठी, उर्दू और फारसी भाषाओं पर मजबूत पकड़ बनाई।

उच्च व औपचारिक शिक्षक प्रशिक्षण

1840 के दशक में सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख दोनों ने अहमदनगर स्थित अमेरिकन मिशनरी की सुश्री सिंथिया फरार (Ms. Cynthia Farrar) द्वारा संचालित नॉर्मल स्कूल से आधुनिक शिक्षण विधियों का बाकायदा औपचारिक प्रशिक्षण (Teachers’ Training) प्राप्त किया।

यह उस कालखंड में महिलाओं के लिए उपलब्ध सबसे उच्च और आधुनिक प्रशिक्षण था, जिसने फातिमा शेख को बाल-मनोविज्ञान, आधुनिक पाठ्यक्रम और वैज्ञानिक शिक्षण कला में पूरी तरह पारंगत किया।

गंज पेठ का ऐतिहासिक ठिकाना: संकट की घड़ी में फुले दंपत्ति का आश्रय वर्ष 1848 में जब महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले ने पुणे के भिड़े वाड़ा में अछूत बालिकाओं के लिए पहला स्वदेशी स्कूल शुरू किया, तो पुणे के उच्चवर्गीय व रूढ़िवादी समाज में तीखा आक्रोश फैल गया।

घर से बेदखली का कठिन दौर
रूढ़िवादी तत्वों के भीषण दबाव और सामाजिक बहिष्कार की धमकियों के आगे झुकते हुए ज्योतिराव फुले के पिता गोविंदराव फुले को विवश होकर अपने ही बेटे और बहू को घर से निकाल देना पड़ा।

उस्मान शेख व फातिमा शेख का ऐतिहासिक कदम उस घनघोर संकट में जब अपने सगे-संबंधियों ने भी मुँह फेर लिया था, तब उस्मान शेख और फातिमा शेख ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने घर के दरवाजे फुले दंपत्ति के लिए खोल दिए।

गंज पेठ की हवेली बनी क्रांति का केंद्र

उन्होंने पुणे के गंज पेठ (उस्मान शेख का वाड़ा) में न केवल फुले दंपत्ति को सम्मानजनक शरण दी, बल्कि अपने घर के एक बड़े हिस्से में विद्यालय शुरू करने के लिए स्थान भी उपलब्ध कराया। यहीं से आधुनिक भारत के बहुजन और बालिका शिक्षा आंदोलन की नई और सुदृढ़ आधारशिला
रखी गई।

बहुजन समाज व स्त्री-मुक्ति के लिए महान कार्य एवं दैनिक संघर्ष
फातिमा शेख का जीवन केवल कक्षा में बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं था; उनका हर कदम सामाजिक विषमता के विरुद्ध सीधा संग्राम था

1 घर-घर जाकर जन-जागरण

उस समय रूढ़िवादिता और धर्म-दंड के भय से लोग अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से डरते थे।

फातिमा शेख स्वयं पुणे की तंग बस्तियों और झोपड़ियों में जाती थीं, अशिक्षित माताओं से संवाद करती थीं, उन्हें शिक्षा से जीवन में आने वाले बदलावों के बारे में समझाती थीं और बच्चियों को विद्यालय भेजने के लिए प्रेरित करती थीं।

2 सड़क पर बर्बर विरोध और अटूट धैर्य:

जब सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख पढ़ाने के लिए निकलती थीं, तो असामाजिक और कट्टरपंथी तत्व उन पर गालियों की बौछार करते थे, गोबर, कीचड़, सड़े अंडे और पत्थर फेंकते थे। इस प्रताड़ना का सामना करने के लिए वे अपने झोले में एक अतिरिक्त साड़ी रखकर निकलती थीं, ताकि स्कूल पहुँचकर गंदे वस्त्र बदलकर बच्चों को गरिमा और प्रेम से पढ़ा सकें।

3 सभी 18 विद्यालयों में निरंतर शिक्षण कार्य

फुले दंपत्ति द्वारा 1848 से 1852 के दौरान पुणे और आसपास के क्षेत्रों में स्थापित किए गए सभी 18 स्कूलों में फातिमा शेख ने दिन-रात अध्यापन कार्य किया।

4 प्रशासनिक व प्रबंधकीय नेतृत्व

जब कभी सावित्रीबाई फुले अस्वस्थ होती थीं अथवा महात्मा फुले सत्यशोधक समाज के कार्यों से बाहर प्रवास पर रहते थे, तब विद्यालयों के संपूर्ण संचालन, आर्थिक प्रबंधन और बच्चों की सुरक्षा की बागडोर फातिमा शेख ही पूरी निष्ठा से संभालती थीं।

5 दलित-मुस्लिम साझी चेतना की शिल्पकार

उन्होंने सत्यशोधक समाज के मानवतावादी आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। वे भारत में दलित, पिछड़े और पसमांदा/मुस्लिम समाज के बीच उस ऐतिहासिक साझी चेतना की पहली शिल्पकार थीं, जिसने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की जड़ों को हिला दिया।

ऐतिहासिक दस्तावेजों में प्रमाण एवं आधुनिक मान्यता

1 सावित्रीबाई फुले के पत्रों में उल्लेख

1856 में जब सावित्रीबाई फुले अस्वस्थ होकर अपने मायके (नायगांव) गईं, तब उन्होंने महात्मा फुले को लिखे अपने पत्रों में फातिमा शेख के प्रति अपार आदर, स्नेह और कृतज्ञता व्यक्त की थी। सावित्रीबाई ने लिखा था कि कैसे फातिमा उनके पीछे से सारे स्कूलों और बच्चों की पढ़ाई का भार पूरी लगन और कुशलता से संभाल रही हैं।

2 इतिहास की उपेक्षा और पुनर्स्थापना

आज़ादी के बाद के अकादमिक इतिहास में फातिमा शेख के अभूतपूर्व योगदान को लंबे समय तक वह स्थान नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं। परंतु बहुजन चिंतकों और समतावादी शोधकर्ताओं के प्रयासों से उनका गौरव पुनः स्थापित हुआ। 9 जनवरी 2022 को उनकी 191वीं जयंती पर वैश्विक स्तर पर गूगल डूडल (Google Doodle) बनाकर उन्हें नमन किया गया, तथा आंध्र प्रदेश सहित कई राज्यों के स्कूली पाठ्यक्रमों में उनके जीवन और संघर्ष को सम्मानपूर्वक शामिल किया गया।

3 निर्वाण (देहावसान): 9 अक्टूबर 1900

आजीवन ज्ञान, समता और मानवीय गरिमा की अलख जगाने वाली यह महान राष्ट्रमाता 9 अक्टूबर 1900 को इस नश्वर संसार को अलविदा कहकर परिनिर्वाण को प्राप्त हुईं।

अपने अंतिम समय तक वे समाज सेवा, वंचितों की तालीम और महिलाओं के आत्मसम्मान की लड़ाई में अडिग रहीं। उनका संपूर्ण जीवन एक ऐसी जलती हुई मशाल की तरह रहा, जिसने स्वयं हर प्रकार के सामाजिक दंश और प्रताड़ना को झेलकर बहुजन समाज की आने वाली पीढ़ियों के लिए उजाले का मार्ग प्रशस्त किया।

4 फातिमा शेख के जीवन का अमर संदेश

राष्ट्रमाता फातिमा शेख का जीवन वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए एक शाश्वत प्रकाश-स्तंभ है

“कलम, ज्ञान और विचार ही सदियों पुरानी गुलामी, गैर-बराबरी और अज्ञानता की बेड़ियों को काटने का सबसे अचूक अस्त्र हैं।”

उनका जीवन हमें सिखाता है कि:
किसी भी बड़े सामाजिक बदलाव के लिए निस्वार्थ त्याग और अदम्य साहस पहली शर्त है।

जब तक समाज की आधी आबादी (महिलाएं) शिक्षित और आत्मनिर्भर नहीं होंगी, तब तक देश की सच्ची स्वतंत्रता और समता अधूरी है।

बहुजन समाज, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों की साझी एकता ही शोषण और अन्याय की बड़ी से बड़ी दीवारों को ढहा सकती है।

राष्ट्रमाता फातिमा शेख का त्याग, शौर्य और अमर बलिदान भारतीय सामाजिक क्रांति के इतिहास में सदैव ध्रुवतारे की तरह जगमगाता रहेगा।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर-94622-60179

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *