मैं आज शीशे के सामने खड़ी थी। बहुत दिनों बाद खुद को इतनी देर तक देखा। आँखों के नीचे काले घेरे, चेहरे पर झुर्रियों की लकीरें और यह बेडौल सा शरीर। मुझे याद आया वो वक़्त, जब लोग मेरी सुंदरता, मेरी छरहरी काया की तारीफ़ करते नहीं थकते थे। औरत का पहला ग़ुरूर उसका शरीर होता है। हर लड़की की तरह मुझे भी अपने इस रूप पर नाज़ था, एक अल्हड़ सा स्वाभिमान था।
फिर मेरी ज़िंदगी में वो आए। मेरा हाथ थामा और मुझे एक नया मुकाम दिया। एक औरत का दूसरा ग़ुरूर उसका पति होता है। उनके साथ मैंने एक नया संसार देखा, उनके साए में खुद को सुरक्षित महसूस किया। मुझे लगा कि ज़िंदगी मुकम्मल हो गई। लेकिन नियति ने मेरे भीतर एक और बड़ा सैलाब छुपा रखा था—मातृत्व का सैलाब।
जब पहली बार मुझे अपने भीतर एक नन्ही सी धड़कन महसूस हुई, तो मेरे जीने का मायना ही बदल गया। औरत का अंतिम और सबसे बड़ा ग़ुरूर उसके बच्चे होते हैं। उस दिन के बाद, मैं ‘मैं’ नहीं रही, सिर्फ ‘माँ’ बन गई।
लोग कहते हैं कि औरत कमज़ोर होती है, लेकिन मैंने अपने उस अंतिम ग़ुरूर को पाने के लिए अपने पहले ग़ुरूर को हंसते-हंसते खाक में मिला दिया। उसी पल से मेरी सुंदर काया बदलने लगी। बच्चों को दुनिया में लाने और उन्हें सींचने के लिए मैंने अपने शरीर को बेडौल होने दिया। रातों की नींद खोई, अपनी भूख-प्यास भूली, अपनी हर ख़्वाहिश को एक तरफ रख दिया। मेरे पेट पर पड़े वो स्ट्रेच मार्क्स (खिंचाव के निशान) मेरे लिए किसी बदसूरती की निशानी नहीं, बल्कि मेरे मातृत्व के गौरव पदक थे।
मैंने अपने बच्चों के लिए हर तूफ़ान का रुख मोड़ दिया। जब भी उन पर कोई आँच आने लगी, मैं आख़िरी सांस तक ढाल बनकर खड़ी रही। दुनिया की कोई ताक़त, कोई मुसीबत मुझे हिला नहीं सकी क्योंकि मेरे पीछे मेरे बच्चों का भविष्य था। पुरुष चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, कितना भी कमा ले, लेकिन त्याग, दर्द और समर्पण के इस मामले में पुरुष कभी एक माँ की बराबरी नहीं कर सकता। वह नौ महीने उस तड़प को अपने भीतर नहीं पाल सकता, वह अपने वजूद को मिटाकर नया वजूद नहीं गढ़ सकता। मैंने गर्व से जिया कि मैं एक माँ हूँ, मेरा अंतिम ग़ुरूर मेरे साथ है।
लेकिन वक़्त का पहिया कितनी बेरहमी से घूमता है…
वही बच्चे, जिनके घुटनों के बल चलने पर मैं पूरे घर में ख़ुशियाँ बिखेर देती थी, आज बड़े हो गए हैं। उनके पास अब अपनी दुनिया है, अपने सपने हैं और उन सपनों में शायद इस बूढ़ी माँ के लिए कोई जगह नहीं बची। कल जब मैंने अदब से उनसे वक़्त माँगा, दवाइयों के लिए हाथ फैलाया, या बस थोड़ा सा प्यार चाहा… तो बदले में मुझे क्या मिला? तीखी आवाज़, कड़वे शब्द और नफ़रत से भरी निगाहें।
मगर यही अंतिम ग़ुरूर जब बुढ़ापे में मुझे आँखें दिखाता है, तब मैं अंदर से पूरी तरह टूट जाती हूँ।
शारीरिक रूप से बेडौल होना मुझे कभी नहीं खला, लेकिन जब ममता के बदले में दिल पर ये ज़ख़्म मिलते हैं, तो आत्मा चीख उठती है। जिस ग़ुरूर के दम पर मैं दुनिया से लड़ गई, जब वही ग़ुरूर मुझे पराया कर दे, तो जीने की चाह ख़त्म होने लगती है। मन करता है कि चीख-चीख कर रोऊँ, अपने इस बूढ़े शरीर को समेटकर कहीं छिप जाऊँ।
पर मैं एक माँ हूँ। टूटकर भी बिखर नहीं सकती। आज इस दर्द को पन्नों पर उड़ेलते हुए मैं दुनिया की हर उस संतान से बस इतना कहना चाहती हूँ—तुम्हारी माँ ने तुम्हें यह मुकाम देने के लिए खुद को मिटा दिया था। उसे किसी महल की चाह नहीं है, उसे सिर्फ तुम्हारा थोड़ा सा वक़्त और आदर चाहिए। अपने उस आख़िरी ग़ुरूर को कभी टूटने मत देना, क्योंकि जब माँ का ग़ुरूर टूटता है, तो भगवान का आशीर्वाद भी घर से रूठ जाता है।
मैं आज भी दुआ करती हूँ, भले ही मेरी आँखें नम हों, पर मेरे बच्चे हमेशा मुस्कुराते रहें। यही एक माँ की लाचारी है, और यही उसकी सबसे बड़ी ताक़त भी।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)
