लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहनलाल सिंगारिया

“हमारे ज़्यादातर पुराने रिवाज आदर पर नहीं, बल्कि डर पर टिके हैं— खुदा का डर, समाज का डर, बदनामी का डर। जो रिवाज आज़ाद दिमाग को डर से भर दे, वो समाज को बीमार बनाता है, बेहतर नहीं।” — इस्मत चुगताई

जब समाज का बहुसंख्यक और वंचित हिस्सा सदियों पुरानी रूढ़ियों, मानसिक गुलामी और जड़ परंपराओं के पाश में जकड़ा होता है, तब साहित्य केवल कला की वस्तु नहीं रह जाता।

वह एक वैचारिक हथियार बन जाता है। बीसवीं सदी के भारतीय क्षितिज पर इस्मत चुगताई एक ऐसी ही प्रखर, निर्भीक और क्रांतिकारी मशाल बनकर उभरीं, जिन्होंने अपनी धारदार कलम से सामंती व्यवस्था, धार्मिक पाखंड और पितृसत्तात्मक शोषण की चूलें हिला दीं।

प्रगतिशील लेखक संघ’ की अग्रिम पंक्ति की योद्धा के रूप में उन्होंने समाज के उस हाशिए को मुख्यधारा के विमर्श में ला खड़ा किया, जिसे देखने से भी संभ्रांत वर्ग कतराता था।

वर्तमान सामाजिक-आर्थिक संक्रमण काल में, जब बहुजन समाज अपनी अस्मिता, समता और मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत है, इस्मत चुगताई का संपूर्ण जीवन-संघर्ष, उनके जीवन के अनछुए पहलू और उनकी वैचारिक दृढ़ता एक महान प्रेरणापुंज है।

  1. जन्म, पृष्ठभूमि एवं प्रारंभिक जीवन: सामंती परिवेश में विद्रोह का बीजारोपण

इस्मत चुगताई का जन्म 21 अगस्त 1915 को उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक जनपद बदायूँ के एक रसूखदार और सुशिक्षित मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था।

उनके पिता मिर्ज़ा नज़ीर बेग चुगताई एक सिविल मजिस्ट्रेट थे। सरकारी सेवा के कारण उनके पिता के स्थानांतरण निरंतर होते रहे, जिसने इस्मत को बचपन से ही भारत की बहुरंगी सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों को बहुत करीब से देखने और समझने का अवसर दिया।

10 भाई-बहनों के विशाल परिवार में 9वें स्थान पर होने के कारण, उन पर पारंपरिक बंदिशों का पहरा कुछ कम रहा।

उनका प्रारंभिक संग-साथ अपने भाइयों के साथ हुआ, जिसके फलस्वरूप तत्कालीन समाज द्वारा लड़कियों के लिए गढ़े गए ‘दब्बू, संकोची और मूक’ आचरण के विपरीत उनके भीतर एक अदम्य साहस, जिंदादिली और तार्किक विद्रोही तेवर का जन्म हुआ।

उन्होंने बचपन में ही यह समझ लिया था कि परंपरा के नाम पर थोपी जाने वाली असमानता कोई दैवीय नियम नहीं, बल्कि इंसानी स्वार्थ का ढांचा है।

  1. शिक्षा-दीक्षा का महासंग्राम: जब बेड़ियों को तोड़कर खुली हवा में उड़ान भरी

जिस युग में बहुजन समाज और विशेषकर महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार पूरी तरह बंद थे, जहाँ लड़कियों का जीवन केवल चारदीवारी, धार्मिक ग्रन्थों के रटने और विवाह के बंधनों तक सीमित माना जाता था, उस दौर में इस्मत ने अक्षरों से नाता जोड़ने के लिए एक ऐतिहासिक और कड़ा संघर्ष किया।

अविस्मरणीय प्रतिरोध

जब परिवार ने उनकी शिक्षा को विराम देकर उन पर विवाह का पारंपरिक दबाव बनाया, तब इस किशोर वय की लड़की ने व्यवस्था के विरुद्ध खुली बगावत कर दी।

उन्होंने दो टूक शब्दों में गृह-त्याग करने अथवा ईसाई मिशनरी स्कूल में जाकर शिक्षा प्राप्त करने की घोषणा कर दी।

इस अडिग संकल्प के सम्मुख रूढ़िवादिता को घुटने टेकने पड़े।

उच्च शिक्षा के कीर्तिमान: उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के महिला कॉलेज से अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में स्नातक (B.A.) की उपाधि प्राप्त की।

ऐतिहासिक मील का पत्थर: इसके उपरांत, उन्होंने लंदन मिशनरी सोसाइटी कॉलेज, बनारस से बी.टी. (बैचलर ऑफ टीचिंग) की उच्च व्यावसायिक डिग्री अर्जित की।

वह तत्कालीन भारत में इस शैक्षणिक ऊंचाई को छूने वाली प्रथम मुस्लिम महिला बनीं।

शिक्षा के इस अनुष्ठान ने उनके भीतर के विद्रोही को एक सुसंगत, तार्किक और प्रगतिशील वैचारिक धरातल प्रदान किया।

  1. इस्मत चुगताई के जीवन के कुछ ‘अनछुए तथ्य’

इस्मत जी का व्यक्तित्व जितना उनकी कहानियों में झलकता था, उससे कहीं अधिक दिलचस्प और क्रांतिकारी उनका वास्तविक जीवन था।

उनके जीवन के कुछ ऐसे अनछुए पहलू हैं जो उनके अप्रतिम साहस को दर्शाते हैं

सिलाई-कढ़ाई से नफ़रत,

कागज़-कलम से मोहब्बत: उस दौर में शरीफ़ घरानों की लड़कियों के लिए सिलाई, कढ़ाई और खाना पकाना अनिवार्य योग्यता मानी जाती थी। इस्मत को इन पारंपरिक कामों से सख्त नफ़रत थी।

उन्होंने एक बार कहा था कि वह भूखी रह सकती हैं, लेकिन अपनी उंगलियों को सिलाई की सुई से जख्मी करने के बजाय कलम पकड़ना पसंद करेंगी।

सिनेमा जगत में क्रांतिकारी योगदान

बहुत कम लोग जानते हैं कि इस्मत केवल किताबों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने भारतीय सिनेमा में भी महत्व पूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने अपने पति शाहिद लतीफ़ के साथ मिलकर कई फ़िल्मों की पटकथाएँ और संवाद लिखे। उनकी लिखी कहानी पर बनी फ़िल्म ‘गर्म हवा’ (1973) आज भी विभाजन की विभीषिका और अल्पसंख्यकों के दर्द को बयां करने वाली भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन फ़िल्मों में शुमार की जाती है।

इसके अलावा उन्होंने ‘ज़िद्दी’ और ‘आरज़ू’ जैसी फ़िल्मों के लिए भी काम किया।

जोधपुर का ऐतिहासिक संस्मरण: उनके भाई अज़ीम बेग चुगताई भी एक जाने-माने लेखक थे, जो जोधपुर (राजस्थान) में रहा करते थे।

इस्मत जी का जोधपुर से गहरा जुड़ाव रहा; उन्होंने वहाँ के सामंती समाज और महिलाओं के बंद जीवन को बहुत करीब से देखा, जिसने उनके लेखन को और अधिक धारदार बनाया।

रूढ़िवादी अंतिम इच्छा (वसीयत): इस्मत चुगताई जीवनभर किसी भी प्रकार के धार्मिक पाखंड और कर्मकांड के सख्त खिलाफ रहीं।

उनकी यही प्रगतिशील सोच उनकी मृत्यु के बाद भी दिखाई दी। उन्होंने अपनी वसीयत में स्पष्ट लिखा था कि मृत्यु के बाद उन्हें दफ़नाया न जाए (क्योंकि वे कब्रिस्तानों की घेराबंदी और ज़मीन के घिराव को निरर्थक मानती थीं) बल्कि उनका दाह-संस्कार (अग्नि-संस्कार) किया जाए।

एक मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के बावजूद ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाना उनके समय से बहुत आगे की सोच को दर्शाता है।

  1. महापरिनिर्वाण / देहावसान: विचारों के रूप में अमरता

साहित्य और समाज को नई दिशा देने वाली यह महान विदुषी आज भौतिक रूप से हमारे बीच जीवित नहीं हैं।

24 अक्टूबर 1991 को मुम्बई में 76 वर्ष की आयु में उनका देहावसान (महापरिनिर्वाण) हुआ। उनकी अंतिम इच्छानुसार, मुम्बई के चंदनवाड़ी श्मशान घाट पर उनका दाह-संस्कार किया गया।

यद्यपि उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया, किंतु उनकी बेबाक विचारधारा, उनकी कहानियाँ और उनका अदम्य साहस आज भी शोषितों और जागरूक नागरिकों के दिलों में पूरी तरह जीवित हैं और युगों-युगों तक मार्ग दिखाते रहेंगे।

  1. विचारधारा के मूल स्तंभ: मानवता, समता और वर्ग-चेतना

इस्मत चुगताई का वैचारिक अधिष्ठान किसी संकीर्ण दायरे में आबद्ध नहीं था।

उनका संपूर्ण लेखन और चिंतन मानवतावाद, मार्क्सवादी वर्ग-चेतना, स्त्री-मुक्ति और शोषितों के प्रति अगाध सहानुभूति से ओत-प्रोत था।

(क) ‘भय’ आधारित सामाजिक व्यवस्था का विखंडन

जैसा कि उनके अमर वाक्यों से परिलक्षित होता है, इस्मत ने समाज की सबसे गहरी बीमारी को पकड़ा था।

उनका मानना था कि समाज के अधिकांश रीति-रिवाज़, कुप्रथाएं और पाखंड किसी आदरभाव से नहीं, बल्कि ‘डर’ की बुनियाद पर खड़े हैं।

शोषक वर्ग ने हमेशा बहुजनों, वंचितों और महिलाओं को नियंत्रित करने के लिए ‘ईश्वर का भय’, ‘समाज का भय’ और ‘लोकलाज या बदनामी का भय’ पैदा किया है।

इस्मत का यह दर्शन आज के बहुजन समाज के लिए सबसे बड़ा सबक है: जो रीति-रिवाज़ मानव के स्वतंत्र मस्तिष्क को भय से पंगु बना दें, वे समाज को स्वस्थ नहीं, बल्कि असाध्य रूप से बीमार करते हैं।

(ख) हाशिए के समाज (बहुजन चेतना) का सजीव चित्रण

इस्मत की कलम कभी महलों के वैभव या सामंतों के झूठे गौरवगान की चेरी नहीं बनी।

उन्होंने समाज के सबसे निचले पायदान पर जीवन बसर करने वाले घरेलू नौकरों, दाइयों, धोबियों, चमारों, भिक्षुओं और सर्वहारा वर्ग को अपनी कहानियों का नायक-नायिका बनाया।

उनकी कालजयी कृतियाँ जैसे ‘लिहाफ़’, ‘टेढ़ी लकीर’, ‘जड़ें’, ‘चौथी का जोड़ा’ और ‘सैदा’ आदि सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर पल रहे नैतिक खोखलेपन, वर्ग-भेद और निर्धनों के निर्मम आर्थिक शोषण का ऐसा जीवंत दस्तावेज़ हैं, जो पाठक के भीतर एक गहरी सामाजिक चेतना और आक्रोश उत्पन्न करता है।

(ग) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अदालती संघर्ष

उनकी कालजयी कहानी ‘लिहाफ़’ में महिलाओं के अंतःपुर की दमित इच्छाओं और समलैंगिकता जैसे अछूते व यथार्थवादी विषय को उठाने पर, तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत और समाज के कथित ठेकेदारों ने उन पर ‘अश्लीलता’ का मुकदमा दायर कर लाहौर की अदालत में घसीटा।

साम्राज्यवादी सत्ता और रूढ़िवादी समाज के इस संयुक्त मोर्चे के सामने इस्मत रत्ती भर भी विचलित नहीं हुईं।

उन्होंने न्यायालय में गरजते हुए कहा

“साहित्य समाज का आईना होता है। यदि समाज की हकीकत बदसूरत है, तो आईने को मत तोड़िए, बल्कि समाज के उस चेहरे को बदलिए।

उन्होंने किसी भी प्रकार की माफी मांगने से इनकार कर दिया और अंततः अपने अकाट्य तर्कों के बल पर मुकदमा जीता।

यह संघर्ष केवल एक कहानी का नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी और सत्य के पक्ष में लड़ा गया एक युगांतकारी युद्ध था।

  1. विशेष रूप से महिलाओं के लिए प्रेरणा आत्म-निर्भरता और स्वाभिमान का मार्ग
    इस्मत चुगताई का जीवन और उनका साहित्य विशेष रूप से आधी आबादी यानी महिलाओं के लिए आत्म-सम्मान से जीने का एक उत्कृष्ट घोषणापत्र है। आज की महिलाओं को उनके जीवन से निम्नलिखित अमूल्य प्रेरणाएँ मिलती हैं

आर्थिक आत्मनिर्भरता सर्वोपरि है: इस्मत जी का दृढ़ विश्वास था कि जब तक महिलाएं आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर रहेंगी, उनका शोषण होता रहेगा।

उन्होंने स्वयं पढ़-लिखकर नौकरी की, सम्मान कमाया और अपनी शर्तों पर जीवन जिया।

महिलाओं के लिए उनका सीधा संदेश था कि अपनी नियति खुद तय करने के लिए पैरों पर खड़ा होना अनिवार्य है।

अपनी आवाज़ खुद बनें (मूकता का परित्याग)

समाज अक्सर महिलाओं को ‘मौन’ रहने और सहने की सीख देता है। इस्मत ने सिखाया कि अन्याय के खिलाफ बोलना बदतमीज़ी नहीं, बल्कि आपका अधिकार है। चाहे वह परिवार हो या अदालत, उन्होंने कभी अपने सच से समझौता नहीं किया।

‘लोकलाज’ के झूठे डर से मुक्ति:

उल्लिखित उनका विचार महिलाओं को सबसे बड़ी मानसिक आज़ादी देता है।

समाज महिलाओं को हमेशा ‘बदनामी’ और ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर दिखाकर दबाता है।

इस्मत कहती हैं कि जो समाज आपको डराकर बीमार बनाए, उसकी परवाह करना छोड़ देना ही समझदारी है।

रूढ़िवादी और थोपी गई भूमिकाओं को नकारना

समाज ने महिलाओं के जो सांचे तय कर रखे हैं—सिर्फ चूल्हा-चौका संभालना और आज्ञाकारी बने रहना—इस्मत ने उन सभी सांचों को तोड़कर अपनी एक स्वतंत्र बौद्धिक पहचान बनाई।

  1. बहुजन समाज के आत्म-उत्थान के लिए मार्गदर्शक सूत्र

आज जब बहुजन समाज आर्थिक विषमता, सामाजिक स्तरीकरण और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा है, तब इस्मत चुगताई का जीवन-दर्शन और विचार इस संघर्ष को तीव्र करने के लिए निम्नलिखित मार्गदर्शक सूत्र प्रदान करते हैं

मानसिक गुलामी और सांस्कृतिक भय से मुक्ति

सदियों से शोषित वर्गों को जिन काल्पनिक भयों, अंधविश्वासों और अतार्किक परंपराओं के जाल में बांधकर रखा गया है, उन्हें छिन्न-भिन्न करना होगा। जब तक दिमाग आज़ाद नहीं होगा, तब तक सामाजिक और आर्थिक आज़ादी अधूरी रहेगी।

हमें हर उस रिवाज़ को ठुकराना होगा जो इंसान को इंसान के बराबर नहीं मानता।

शिक्षा को आत्म-सम्मान का माध्यम बनाना:

इस्मत का जीवन प्रमाणित करता है कि विपरीत से विपरीत सामाजिक परिवेश में भी शिक्षा ही वह अचूक अस्त्र है, जो शासक वर्ग की आंखों में आंखें डालकर सत्य बोलने का साहस देता है।

बहुजन समाज को अपनी आने वाली पीढ़ियों, विशेषकर बेटियों को उच्च और तार्किक शिक्षा से सुसज्जित करना होगा।

शोषित वर्गों की व्यापक एकजुटता: इस्मत ने जाति, धर्म और लिंग के भेदों से ऊपर उठकर हर उस व्यक्ति की आवाज़ बुलंद की जो व्यवस्था द्वारा सताया गया था।

बहुजन समाज को भी अपनी आंतरिक कड़ियों को मजबूत करते हुए, आर्थिक और सामाजिक रूप से पीड़ित सभी वर्गों को एक मंच पर लाना होगा।

उपसंहार: समय की मांग और हमारा उत्तरदायित्व

इस्मत चुगताई केवल उर्दू की एक महान कथाकार भर नहीं थीं; वह रूढ़ियों के घने अंधकार को चीरने वाली एक निर्भीक वैचारिक क्रांति थीं।

उन्होंने अपनी लेख़नी से सिद्ध किया कि यदि इरादे मजबूत हों, तो व्यवस्था की कोई भी दमनकारी शक्ति आपके विचारों को कैद नहीं कर सकती।

आज के इस दौर में, जब हम सामाजिक-आर्थिक न्याय पर आधारित एक समतामूलक समाज के निर्माण का स्वप्न देख रहे हैं, हमारा यह परम दायित्व बनता है कि हम इस्मत चुगताई जैसी प्रगतिशील हस्तियों के विचारों को जन-जन तक पहुँचाएँ।

उनके संघर्षों से प्रेरणा लेकर ही हम एक भयमुक्त, जागरूक और स्वाभिमानी बहुजन समाज की सुदृढ़ नींव रख सकते हैं।

उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी बेबाक कलम और अदम्य साहस को कोटि-कोटि नमन!

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहनलाल सिंगारिया सामाजिक-आर्थिक चिंतक एवं विचारक ब्यावर 94622-60179

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