राख से उगी चिंगारी: एक बहुजन बेटी के स्वाभिमान और आत्म-खोज की गाथा उसने इन शब्दों में कहा !
मैंने जब से होश संभाला, दुनिया को एक अलग नजरिए से देखा। एक ऐसा नजरिया, जिसमें मेरे लिए सिर्फ प्रताड़ना, तिरस्कार और साये की तरह पीछा करता भय था। हमारे समाज को सब की नजर में निम्न और गरीब माना जाता था। बचपन की वह यादें आज भी सीने में टीस पैदा करती हैं, जब स्कूल में अन्य तथाकथित उच्च वर्ग के समाज की लड़कियों की मम्मी घर पर आराम से रहती थीं, और मेरी माँ सुबह-सुबह कड़कती ठंड या तपती धूप में मजदूरी करने निकल जाती थी। स्कूल के गलियारों में वे लड़कियाँ मुझे हमेशा हेय दृष्टि से देखती थीं, जैसे मेरा वहाँ होना कोई अपराध हो।
मैं अक्सर सोचती थी कि एक वंचित समाज की लड़की को विरासत में क्या मिलता है? जमीन-जायदाद या रुतबा नहीं, बल्कि उसे विरासत में मिलता है—संघर्ष, समझौता और हर कदम पर अपनी अस्मिता को बचाने की जद्दोजहद। जीवन में पग-पग पर समाज के तानों और तिरस्कार को सहन करना ही हमारी नियति मान ली गई थी।
इसी दर्द, अकेलेपन और उपेक्षा के बीच जब मैं नवयौवना हुई, तो मेरे भीतर भी एक आम लड़की की तरह अरमान जागे। मेरा भी मन किसी के द्वारा सराहे जाने, प्यार पाने और सम्मान का अहसास करने को तरसा। और एक दिन, मुझे प्यार हुआ भी। मुझे लगा कि शायद इस बेरंग दुनिया में कोई मेरे अस्तित्व को स्वीकार कर रहा है। लेकिन मुझे क्या पता था कि जहाँ मैं अपनी पूरी रूह सौंप रही थी, वहाँ मेरे साथ सिर्फ एक छलावा, एक क्रूर धोखा हो रहा था। वंचित समाज की बच्चियों को न केवल सामाजिक स्तर पर, बल्कि भावनाओं के धरातल पर भी कितना कुछ सहना पड़ता है, इसका अहसास मुझे तब हुआ जब उस रिश्ते का सच सामने आया।
उस दिन मुझे उसका अंतिम जवाब मिल गया। मैं रो रही थी और वो बिल्कुल नॉर्मल था। पहले मुझे लगा शायद उसे मेरी बात समझ नहीं आई होगी, शायद वो खुद किसी बात से परेशान होगा या शायद उसे थोड़ा वक़्त चाहिए होगा। पर फिर मैंने गहरे से एक बात महसूस की—जो इंसान तुम्हारी आँखों के आँसू देख कर भी ना बदले, वो कभी तुम्हारा था ही नहीं। उस रात पहली बार मुझे समझ आया कि मैं तो उससे बेपनाह मोहब्बत करती थी, और वो सिर्फ मेरी आदत का आदी था।
उसी तड़प और बिखराव के बीच मेरे भीतर की बहुजन चेतना और स्त्री का स्वाभिमान एक साथ जाग उठा। मैंने खुद से कहा: अब मैं तुमसे अनंत काल तक बिछड़ जाना चाहती हूँ… क्योंकि जितनी तकलीफ़ मैंने तुम्हारे साथ रहकर सही है, उसे दोबारा महसूस करने की हिम्मत अब मुझमें नहीं बची।
एक दिन मुझे गहरा अहसास हुआ कि मैं तो वो लड़की हूँ, जिसे सम्मान, सुकून और बेपनाह मोहब्बत मिलनी चाहिए थी। मैं हर रोज़ टूटना, खुद को खोना और अपनी ही कीमत भूल जाना डिज़र्व नहीं करती थी। मैंने तुम्हें पाने की कोशिश में खुद को ही खो दिया था, और अब खुद को वापस पा लेने के लिए मुझे तुमसे हमेशा के लिए बिछड़ना होगा। शायद तुम्हारे लिए ये बस एक वक्तगुजारी या एक मामूली रिश्ता था, लेकिन मेरे लिए यह मेरी पूरी दुनिया थी। फिर भी, आज पहली बार मैं अपनी तड़पती मोहब्बत से ज़्यादा अपनी आत्मा और अपने स्वाभिमान को चुन रही हूँ। अब मैं तुमसे अनंत काल तक बिछड़ जाना चाहती हूँ… क्योंकि मैं दर्द नहीं, सुकून डिज़र्व करती हूँ।
लोग अक्सर मुझसे कहते हैं कि तुमने अभी उम्र ही क्या है, देखा ही क्या है? पर मैं मन ही मन कहती हूँ कि मैंने बहुत कम उम्र में वो सब देख लिया जो लोग पूरी जिंदगी में नहीं देख पाते। मैंने देखा है कि अहंकार में घर कैसे बिखरते हैं, अपने एक पल में कैसे पराए हो जाते हैं, मोहब्बत कैसे स्वार्थ के लिए मुंह मोड़ लेती हैं, आँखों के सामने ख़्वाब कैसे दम तोड़ते हैं, और जरूरत ख़त्म होते ही लोग किस तरह गिरगिट की तरह बदल जाते हैं…!!
जब मैं उससे अलग हुई, तो उसके भीतर का पुरुषवादी और तथाकथित उच्चता का गुरूर तब भी कायम था। लेकिन मुझे पता था कि एक दिन उसका ये गुरूर भी टूटेगा और उसे मेरी कीमत का अहसास भी होगा। उस दिन वो मेरी पुरानी बातें याद करके अकेले में मुस्कुराएगा भी और रोएगा भी। वक्त गुज़ारने के लिए चेहरे तो उसे बहुत मिल जाएंगे… पर उसकी हर गलती को भुलाकर, उसके सामाजिक अहंकार के सामने भी सिर्फ उससे वफ़ा निभाने वाला साफ़ और सच्चा दिल दोबारा कभी नहीं मिलेगा। अफ़सोस… जब तक उसे मेरी कद्र समझ आएगी, तब तक जिंदगी का खेल ख़त्म हो चुका होगा।
जुदा होने के बाद, एक वक्त ऐसा भी आया जब उस लड़के ने मुझसे मिन्नत की। उसने कहा, “तू लौटकर आ और मुझे देख, क्या तुझे पहली बार मिली थी, तब भी मैं ऐसी ही थी? कभी तेरे आने से चेहरे पर मुस्कान हुआ करती थी, आज तेरे जाने के बाद वही चेहरा खामोश है… तूने तो बस मेरा हाथ छोड़ा था, मगर तेरे साथ मेरी वो हँसती हुई ‘मैं’ भी कहीं खो गई… एक बार लौटकर आ… मेरी आँखों में देखना, शायद तुझे समझ आए-तेरे जाने के बाद मैं कितनी बदल गई हूँ।”
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। लड़के ने बाद में आत्मग्लानि में विचार किया, उसने खुदा से पूछा कि उसने मुझे क्यों छोड़ दिया? उसकी क्या मजबूरी थी? तो मानो खुदा ने कहा, “ना कसूर तेरा था ना गलती उसकी थी, ये कहानी मैंने लिखी ही अधूरी थी…!!”
पर सच तो यह था कि जब तक उसे अपनी गलती का अहसास हुआ, तब तक पाशा पूरी तरह पलट चुका था। अपनी स्त्री, अपनी संगिनी की कद्र नहीं करने और उसके स्वाभिमान को उसकी नजर से नहीं देखने की गलती से परिवार कैसे तिनका-तिनका होकर टूटते हैं, यह मैंने अपनी आँखों से देख लिया था। उस दौर में गम भी बहुत था और अकेलापन भी, लेकिन मुझे समझ आ गया था कि जमाने के साथ सम्मान से चलने के लिए खुद को भीतर से बदलना और मजबूत करना बहुत जरूरी था।
मैंने यह सीख लिया कि जीवन में सिर्फ एकतरफा और आत्मसम्मान को गिराने वाली मोहब्बत के अलावा भी बहुत कुछ होता है। जब वक्त बीत जाता है, तो फिर क्या वीरानगी और क्या दीवानगी! जिंदगी आखिर सिर्फ रोने के लिए नहीं, बल्कि पूरे हौसले से गुजारने के लिए होती है। मैंने एक वंचित समाज की बेटी होने के नाते हार मानना नहीं सीखा था। मैंने अपने पैरों पर खड़े होना शुरू किया, अपनी शिक्षा और काम को अपनी ताकत बनाया।
वक्त बदला, और मैंने जीवन में एक नया अध्याय शुरू करने का फैसला किया। एक ऐसा अच्छा, सुलझा हुआ और सम्मान करने वाला जीवनसाथी देखकर मैंने अपना दांपत्य जीवन शुरू किया, जिसने मेरी जाति, मेरे अतीत या मेरे संघर्ष को कमतर नहीं आँका, बल्कि मेरी आत्मा को सम्मान दिया।
आज मैं 50 साल की उम्र के इस पड़ाव पर खड़ी हूँ। आज समाज और मोहल्ले में हमारी जोड़ी एक आदर्श जोड़ी मानी जाती है। वे पुराने जख्म, वो तिरस्कार, स्कूल के दिनों की वो प्रताड़ना और उस धोखेबाज प्यार का दर्द… न जाने कब के छूमंतर हो गए हैं। आज मेरा बेटा कॉलेज के प्रथम वर्ष का छात्र है और अपनी उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहा है। मेरी बिटिया ने सेकेंडरी का एग्जाम पास किया है और वह एक मजबूत स्वतंत्र लड़की बनने की राह पर है। मेरे पति का एक बहुत अच्छा और प्रतिष्ठित बिजनेस है। आज जिस मोहल्ले में हमारा निवास है, वहाँ हमारा घर एक बेहद सम्मानित और अच्छा घर माना जाता है—इसलिए नहीं कि वह ईंट-पत्थरों से आलीशान बना है, बल्कि इसलिए क्योंकि वहाँ दो समझदार प्रेमी इंसान अपने पूरे परिवार सहित आपसी सम्मान और प्रेम के साथ रहते हैं।
मैं आज अपने पति, बच्चों और परिवार के असीम प्रेम के बीच अपने इस खूबसूरत घर को संभाल रही हूँ। पुराने सपने और पुराने दर्द अब कहीं पीछे छूट चुके हैं। यह कहानी मेरे समाज की हर उस बच्ची के लिए एक प्रेरणा है जो सोचती है कि एक बार टूटने या प्रताड़ित होने के बाद जिंदगी खत्म हो जाती है। नहीं! अपनी आत्मा को चुनो, अपने स्वाभिमान के लिए लड़ो, क्योंकि जब तुम खुद की कद्र करना सीख जाती हो, तो यह पूरी दुनिया तुम्हारे कदमों में झुक जाती है।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)

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