लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहन लाल सिंगारिया

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
यह आलेख मान्यवर कांशीराम जी के जीवन, उनके सामाजिक संघर्ष, वैचारिक दृष्टिकोण और ऐतिहासिक योगदान पर आधारित एक वस्तुनिष्ठ, अकादमिक और सामाजिक-ऐतिहासिक विश्लेषण है।

इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल, विचारधारा विशेष के प्रचार अथवा चुनावी राजनीति को प्रभावित करना नहीं है।

यह सामग्री ऐतिहासिक अभिलेखों, जीवनीपरक संदर्भों और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के विशुद्ध अध्ययन एवं संकलन पर केंद्रित है।

प्रस्तावना:
सोई हुई कौम की जाग्रत चेतना

भारतीय समाज के इतिहास में सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा के लिए लड़े गए आंदोलनों की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है।

ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज और बोधिसत्व डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जिस वैचारिक धरातल को गढ़ा, स्वतंत्रता के बाद के भारत में उस वैचारिक आंदोलन को धरातल पर एक संगठित शक्ति में तब्दील करने का ऐतिहासिक श्रेय मान्यवर कांशीराम जी को जाता है। उन्होंने वंचित, शोषित, पिछड़े, कमेरा वर्ग और अल्पसंख्यकों के मन में आत्मसम्मान और सामाजिक भागीदारी की जो अलख जगाई, उसने भारतीय समाजशास्त्र की पूरी रूपरेखा को बदल दिया।

कांशीराम जी केवल एक संगठनकर्ता नहीं थे; वे सामाजिक चेतना के वास्तुकार थे, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं होगा, तब तक वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना संभव नहीं है।

जन्म, पारिवारिक पृष्ठभूमि और बाल्यकाल
मान्यवर कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ (अब रूपनगर) जिले के अंतर्गत आने वाले ख्वासपुर गाँव में हुआ था। वे एक साधारण रामदासिया (रविदासिया) सिख परिवार से ताल्लुक रखते थे।

पिता का नाम: सरदार हरी सिंह
माता का नाम: श्रीमती बिशन कौर
सरदार हरी सिंह अत्यंत परिश्रमी, स्वाभिमानी और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे, जबकि माता बिशन कौर धार्मिक, दृढनिश्चयी और संस्कारों से ओत-प्रोत महिला थीं। परिवार में सीमित संसाधन थे, लेकिन माता-पिता ने बच्चों के आत्मसम्मान और शिक्षा के साथ कभी समझौता नहीं किया।

कांशीराम अपने भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनके परिवार में चार बहनें और दो छोटे भाई थे। संयुक्त और बड़े परिवार के दायित्वों के बीच पले-बढ़े कांशीराम में बचपन से ही अद्भुत धैर्य, नेतृत्व क्षमता और सामूहिकता की भावना स्पष्ट दिखाई देती थी। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, जहाँ उन्होंने भारतीय समाज में मौजूद विषमता और जातीय भेदों को बहुत करीब से देखा और महसूस किया।

शिक्षा-दीक्षा: वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास
कांशीराम जी की प्राथमिक शिक्षा गाँव के स्थानीय विद्यालय में ही संपन्न हुई। वे कुशाग्र बुद्धि के धनी थे और पढ़ाई के प्रति उनका रुझान बाल्यकाल से ही विशिष्ट था।

प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए रुख किया।

उन्होंने 1956 में रोपड़ के गवर्नमेंट कॉलेज (पंजाब विश्वविद्यालय से संबद्ध) से विज्ञान स्नातक (B.Sc.) की डिग्री प्राप्त की। उस दौर में वंचित समाज के किसी युवक द्वारा विज्ञान वर्ग से स्नातक उपाधि प्राप्त करना अत्यंत दुर्लभ और उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जाती थी। विज्ञान के इस अध्ययन ने उनके चिंतन को तार्किक, वैज्ञानिक, विश्लेषणात्मक और अंधविश्वास-मुक्त बनाया। वे किसी भी तथ्य या सामाजिक कुरीति को बिना तर्क के स्वीकार नहीं करते थे। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण आगे चलकर उनके सामाजिक अभियानों और संगठनात्मक ढाँचों की नींव बना।

रोजगार और पुणे में पदस्थापना
स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात, 1957 में कांशीराम जी का चयन रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के अंतर्गत ‘एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी’ (ERDL), पुणे (महाराष्ट्र) में एक वैज्ञानिक सहायक (रिसर्च असिस्टेंट) के रूप में हुआ। यह एक प्रतिष्ठित और सुरक्षित सरकारी नौकरी थी, जो उनके परिवार के आर्थिक उत्थान के लिए पर्याप्त थी। पुणे में पदस्थापना उनके जीवन का सबसे बड़ा निर्णायक मोड़ साबित हुई।
जीवन का ऐतिहासिक मोड़: नौकरी का त्याग और महात्याग
पुणे प्रवास के दौरान 1965 में एक ऐसी घटना घटी जिसने कांशीराम जी के जीवन की दिशा को सदैव के लिए बदल दिया।

ERDL प्रयोगशाला में डॉ. बी.आर. आंबेडकर की जयंती और बुद्ध पूर्णिमा के अवकाश को लेकर संस्थान प्रशासन ने उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया। कार्यालय के चतुर्थ श्रेणी के एक दलित कर्मचारी दीनाभाना ने जब इस अन्याय का विरोध किया, तो प्रशासन ने उनका उत्पीड़न शुरू कर दिया और उन्हें निलंबित कर दिया।

इस घटना ने वैज्ञानिक कांशीराम के भीतर सोए हुए सामाजिक विवेक को झकझोर दिया।

वे दीनाभाना के समर्थन में खुलकर सामने आए। उन्होंने कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर लड़ाई लड़ी और अंततः प्रशासन को झुकना पड़ा तथा अवकाश और सम्मान दोनों बहाल हुए।

इसी संघर्ष के दौरान कांशीराम जी का परिचय डॉ. आंबेडकर के संपूर्ण वाङ्मय से हुआ। उन्होंने बाबा साहेब की कालजयी पुस्तक ‘जाति का विनाश’ (Annihilation of Caste) को एक ही रात में कई बार पढ़ा। इस अध्ययन ने उनके अंतर्मन में क्रांति का सूत्रपात किया। उन्हें अहसास हुआ कि केवल व्यक्तिगत रूप से शिक्षित होना या व्यक्तिगत संपन्नता हासिल करना पूरे समाज के उद्धार का मार्ग नहीं हो सकता।

ऐतिहासिक संकल्प पत्र (महात्याग): समाज सेवा और वंचितों के अधिकारों की खातिर उन्होंने अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने परिवार को एक ऐतिहासिक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज को समर्पित करने का संकल्प लिया:
वे कभी विवाह नहीं करेंगे और आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे।
वे कोई निजी संपत्ति या बैंक खाता नहीं बनाएंगे।
वे अपने परिवार या रिश्तेदारों के मोह से मुक्त रहेंगे और तभी घर लौटेंगे जब समाज का उद्धार सुनिश्चित हो जाएगा।
उनका पूरा समय, ऊर्जा और जीवन केवल और केवल समाज के जागरण में लगेगा।

यह पत्र केवल एक व्यक्ति का निर्णय नहीं था, बल्कि त्याग और समर्पण की उस पराकाष्ठा का प्रमाण था, जो इतिहास में विरले ही देखने को मिलती है।

अंबेडकर मिशन से जुड़ाव और संगठनात्मक यात्रा
कांशीराम जी ने समझ लिया था कि बिना संगठन के कोई भी क्रांति संभव नहीं है। उन्होंने महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के साथ जुड़कर जमीनी काम शुरू किया, लेकिन जल्द ही वे पारंपरिक राजनीतिक बिखराव और अवसरवादिता से निराश हो गए। उन्होंने महसूस किया कि समाज को किसी तात्कालिक लाभ की नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक वैचारिक और संगठनात्मक प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए उन्होंने चरणबद्ध तरीके से संगठनों की स्थापना की:

  1. बामसेफ (BAMCEF) की स्थापना (1978):
    कांशीराम जी का मानना था कि संविधान और आरक्षण के लाभ से जो वर्ग पढ़ा-लिखा और अधिकारी बना है, उसकी पहली जिम्मेदारी अपने समाज के प्रति है। इसी सोच के तहत उन्होंने 6 दिसंबर 1978 को BAMCEF (The All India Backward and Minority Communities Employees Federation) का गठन किया।
    उद्देश्य: शिक्षित और साधन-संपन्न सरकारी कर्मचारियों के ‘ब्रेन बैंक’ और ‘टैलेंट बैंक’ को समाज के हित में उपयोग करना।
    दर्शन: “Pay back to society” (समाज से जो लिया है, उसे वापस लौटाना)। बामसेफ एक गैर-राजनीतिक, गैर-धार्मिक संगठन था जिसने देश भर के बुद्धिजीवियों को एक मंच पर ला खड़ा किया।
  2. दलित शोषित समाज संघर्ष समिति – डीएस-4 (DS-4) (1981):
    कर्मचारियों के वैचारिक गठन के बाद, उन्होंने छात्रों, महिलाओं, मजदूरों और किसानों को जोड़ने के लिए 6 दिसंबर 1981 को DS-4 का गठन किया।
    इस मंच के माध्यम से उन्होंने सामाजिक बुराइयों जैसे शराबबंदी, अंधविश्वास और जातीय उत्पीड़न के खिलाफ जमीनी संघर्ष छेड़ा।
    कांशीराम जी ने इसी दौरान देशव्यापी साइकिल यात्राएं निकालीं। हजारों किलोमीटर की इस यात्रा में उन्होंने गाँव-गाँव जाकर रात के समय खाटों पर बैठकर ग्रामीणों से संवाद किया, जिसे ‘कैडर कैंप’ (Cadre Camps) कहा गया।
  3. बहुजन समाज पार्टी – बसपा (1984):
    सामाजिक चेतना के एक निश्चित स्तर पर पहुँचने के बाद, कांशीराम जी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक भागीदारी के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सामाजिक और आर्थिक न्याय तब तक अधूरा है जब तक वंचित वर्ग के हाथों में सत्ता की चाबी न हो। इसी उद्देश्य से 14 अप्रैल 1984 (डॉ. आंबेडकर की जयंती) को उन्होंने विधिवत राजनीतिक विकल्प की नींव रखी, जिसका उद्देश्य ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ के सिद्धांत को सत्ता के माध्यम से लागू करना था।
    वैचारिक दर्शन और मौलिक रणनीतियाँ
    मान्यवर कांशीराम जी का सामाजिक दर्शन अत्यंत व्यावहारिक, तार्किक और जमीनी वास्तविकताओं पर आधारित था:
    संख्याबल और भागीदारी का सिद्धांत: उनका प्रसिद्ध उद्घोष था— “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।” उन्होंने समाज के 85 प्रतिशत उपेक्षित वर्ग को अपनी जनसांख्यिकीय शक्ति को पहचानने और व्यवस्था में समान भागीदारी की मांग करने का आह्वान किया।

जाति-चेतना के विरुद्ध सशक्तिकरण: उनका मानना था कि जाति ने समाज को हजारों टुकड़ों में बाँट दिया है। उन्होंने बिखरी हुई उपजातियों को ‘बहुजन’ की एक साझी पहचान के तहत संगठित करने का प्रयास किया ताकि वे अपनी शक्ति को पहचान सकें।

आत्मसम्मान का आह्वान: वे हमेशा कहते थे— “ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस-फोर।” उनका उद्देश्य किसी वर्ग के प्रति घृणा फैलाना नहीं, बल्कि उन दबे-कुचले वर्गों में अपने आत्मसम्मान को जागृत करना था जो पीढ़ियों से हीनभावना के शिकार थे।

स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता: कांशीराम जी ने आंदोलन चलाने के लिए कभी बड़े उद्योगपतियों या पूंजीपतियों से धन नहीं लिया।

उन्होंने जनता से ही “एक वोट और एक नोट” का आह्वान किया। इस नीति ने कार्यकर्ताओं में जिम्मेदारी और संगठन के प्रति अपनत्व की भावना पैदा की।

प्रचार की अनूठी शैली: साइकिल यात्राएं और कैडर कैंप
आधुनिक दौर में जब जनसंचार के साधन सीमित थे, कांशीराम जी ने संवाद की सबसे प्रभावी और जनोन्मुखी शैली अपनाई।

साइकिल यात्रा: 1980 के दशक में उन्होंने देश के कोने-कोने में साइकिल जत्थे भेजे। वे स्वयं धूप, बारिश और ठंड की परवाह किए बिना धूल भरी सड़कों पर साइकिल चलाते हुए जनता के बीच पहुँचे। इसने नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच की दूरी को समाप्त कर दिया।

कैडर कैंप: वे रात-रात भर जागकर कार्यकर्ताओं के साथ वैचारिक कार्यशालाएं करते थे। वे ब्लैकबोर्ड और चॉक का उपयोग करके समाज के आर्थिक और सामाजिक ढाँचे को समझाते थे। इस शैली ने सामान्य अनपढ़ और अर्ध-शिक्षित व्यक्तियों को भी एक प्रखर वक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता बना दिया।

स्वास्थ्य संघर्ष और महापरिनिर्वाण
अनवरत यात्राओं, अनियमित खान-पान, निरंतर भागदौड़ और अत्यधिक मानसिक-शारीरिक श्रम के कारण 1990 के दशक के उत्तरार्ध में उनका स्वास्थ्य प्रभावित होने लगा। वे गंभीर मधुमेह (डायबिटीज), उच्च रक्तचाप और तंत्रिका संबंधी रोगों से ग्रस्त हो गए। 2003 में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक (मस्तिष्क आघात) हुआ, जिसके बाद वे पक्षाघात के कारण बिस्तर पर आ गए।

लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं से जूझने के बाद, 9 अक्टूबर 2006 को नई दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से इस महान सामाजिक क्रांति के प्रणेता का महापरिनिर्वाण हो गया।

उनके जाने से भारतीय सामाजिक आंदोलन का एक स्वर्णिम, निष्कलंक और त्यागमयी अध्याय भौतिक रूप से समाप्त हो गया, यद्यपि उनके विचार आज भी अमर हैं।

मूल्यांकन और
ऐतिहासिक विरासत

मान्यवर कांशीराम आधुनिक भारत के उन विरले महापुरुषों में से हैं जिन्होंने किसी स्थापित व्यवस्था या विरासत के बिना शून्य से एक विराट आंदोलन खड़ा किया।

उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता पाने का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे मजबूत माध्यम माना।

उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को समावेशी बनाया। जिन वर्गों को सदियों से केवल ‘वोट बैंक’ माना जाता था, उन्हें कांशीराम जी ने नेतृत्वकर्ता और निर्णयकर्ता की पंक्ति में लाकर खड़ा किया।

उनका संपूर्ण जीवन त्याग, शुचिता, अनुशासन और समर्पण का एक ऐसा प्रकाश स्तंभ है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव समता, बंधुता और सामाजिक न्याय के पथ पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर 94622-60179

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