स्त्री के जीवन के तीन ग़ुरूर (अभिमान)!
एक औरत के जीवन यात्रा को यदि ध्यान से देखा जाए, तो उसके आत्म-गौरव के तीन मुख्य पड़ाव आते हैं:
- पहला ग़ुरूर*(घमंड)(रूप और काया): हर युवा लड़की की तरह, एक स्त्री का पहला गौरव उसका सौंदर्य, उसकी छरहरी काया और उसका अल्हड़ स्वाभिमान होता है। वह अपने इस रूप पर नाज़ करती है।
- दूसरा ग़ुरूर (जीवनसाथी): विवाह के बाद जब कोई उसका हाथ थामकर उसे जीवन में एक नया मुकाम देता है, तो उसका पति उसका दूसरा ग़ुरूर बन जाता है। उसके साए में वह खुद को सुरक्षित पाती है और एक नया संसार बसाती है।
- अंतिम और सर्वोच्च ग़ुरूर (संतान): जब एक स्त्री के भीतर एक नन्ही धड़कन दस्तक देती है, तो उसके जीवन के मायने पूरी तरह बदल जाते हैं। ‘मातृत्व’ का यह सैलाब उसके जीवन का सबसे बड़ा और अंतिम ग़ुरूर होता है। इस पड़ाव पर आकर वह केवल ‘माँ’ रह जाती है।
मातृत्व का सर्वोच्च त्याग: पुरुष से कहीं आगे
समाज अक्सर कहता है कि औरत कमज़ोर होती है, लेकिन मातृत्व की शक्ति इस धारणा को पूरी तरह खारिज कर देती है। अपने अंतिम ग़ुरूर (बच्चों) को पाने और उन्हें एक बेहतर भविष्य देने के लिए, एक माँ अपने पहले ग़ुरूर,अभिमान (सुंदर शरीर) को हंसते-हंसते दांव पर लगा देती है।
बच्चों को दुनिया में लाने की प्रक्रिया में उसकी सुंदर काया बेडौल हो जाती है। वह रातों की नींद खो देती है, अपनी भूख-प्यास और इच्छाओं का गला घोंट देती है। गर्भावस्था के दौरान पेट पर आए खिंचाव के निशान (स्ट्रेच मार्क्स) उसके लिए बदसूरती नहीं, बल्कि मातृत्व के गौरव पदक बन जाते हैं।
त्याग, दर्द और समर्पण के इस तराजू पर पुरुष कभी भी एक माँ की बराबरी नहीं कर सकता। पुरुष चाहे कितना भी शक्तिशाली हो या कितना भी धन कमा ले, लेकिन वह नौ महीने तक उस असहनीय तड़प को अपने भीतर नहीं पाल सकता। अपने वजूद को पूरी तरह मिटाकर एक नया वजूद गढ़ने की यह अलौकिक क्षमता सिर्फ और सिर्फ एक माँ के पास होती है।
वक्त का क्रूर पहिया और आधुनिक समाज की त्रासदी
बदलाव प्रकृति का नियम है, लेकिन कभी-कभी यह बदलाव बेहद दर्दनाक होता है। जिन बच्चों के घुटनों के बल चलने पर माँ पूरे घर में खुशियाँ बिखेर देती थी, आज वे बड़े हो चुके हैं। उनके पास अपनी हाई-टेक दुनिया है, अपने बड़े सपने हैं और व्यस्त जीवन है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि उन सपनों और आलीशान दुनिया में उस बूढ़ी माँ के लिए कोई जगह नहीं बची है।
आज की आधुनिक और भागती-दौड़ती पीढ़ी में बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता लगातार कम हो रही है। जब एक बूढ़ी माँ अपने ही बच्चों से थोड़ा सा वक़्त, अपनी बीमारियों के लिए दवाइयाँ या बस थोड़ा सा स्नेह माँगती है, तो बदले में उसे अक्सर तीखी आवाज़, कड़वे शब्द और उपेक्षा से भरी निगाहें मिलती हैं।
शारीरिक रूप से कमज़ोर या बेडौल होना किसी माँ को कभी नहीं खलता, लेकिन जब उसकी अगाध ममता के बदले में बच्चों से दिल को छलनी करने वाले ज़ख्म मिलते हैं, तो उसकी आत्मा चीख उठती है। जिस ग़ुरूर के दम पर वह कभी पूरी दुनिया से लड़ गई थी, जब वही ग़ुरूर उसे पराया कर देता है, तो जीवन की इच्छा ही समाप्त होने लगती है।
नई पीढ़ी के लिए एक गंभीर संदेश
टूटकर भी बिखर न पाना ही एक माँ की सबसे बड़ी लाचारी और उसकी सबसे बड़ी ताक़त है। दिल में बेहिसाब दर्द और आँखों में आँसू होने के बावजूद, एक माँ हमेशा अपने बच्चों की मुस्कुराती ज़िंदगी की ही दुआ करती है।
आज के युवाओं और संतानों को यह समझने की सख्त ज़रूरत है कि उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए उनकी माँ ने खुद को मिटा दिया था। बुजुर्ग माता-पिताओं को किसी आलीशान महल या धन-दौलत की चाह नहीं होती; उन्हें सिर्फ अपने बच्चों का थोड़ा सा समय, सम्मान और प्यार चाहिए होता है।
संतानों को यह याद रखना चाहिए कि जब घर में माँ का ग़ुरूर टूटता है, तो ईश्वर का आशीर्वाद भी उस घर से रूठ जाता है। माता-पिता की सेवा और उनका आदर ही सबसे बड़ा धर्म है। अपने ‘अंतिम ग़ुरूर’ को कभी टूटने न दें, क्योंकि उनका आशीर्वाद ही आपकी असली संपत्ति है।
शेर
उम्र भर बच्चों की खुशियों के लिए खुद को मिटाती रही,
वो माँ है साहब, जो ज़ख्म खाकर भी दुआएँ लुटाती रही।

संकलनकर्ता:
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।9829230966
निवासी: ग्राम नवाब, पोस्ट झाड़ोल, वाया रामसर, जिला अजमेर, राजस्थान।8 अक्टूबर 2026
