ढूंढना आम आदमी को, बदस्तूर जारी है,, राह देखता वह, कब आएगी हमारी बारी है,, मुस्तैदी से मुस्तैद रहता, सुनाने अपनी कहानी,, चाहे शब्द हो पराये, पर बात हो अपनी जुबानी,, मुंहजोर लोगों से सुनता, फरमाबरदार आवाजें,, आच्छादित हो पहुंचेगा, योजना आम दरवाजे,, कर्ण उत्कर्ण है, अस्फुट शब्द सुनने,, जूझता है प्रतिपल, अनवरत विकास को पाने,, आम फलों का राजा है, हर दलों का राजा है,, पर हर कोई बजाता है, जैसे वह बाजा है,, कलमकार कलम से, लिखता है कहानी,, वह अकेला चलता है, अपनी जिंदगी विरानी,, चित्रकार चित्र में उकेलता, सुरों में भरता गायक,, अधिकारी के मुख में बसता, बनकर वह एक नायक,, नेता शाम सवेरे करते, ईश सा उसे याद,, जैसे वही करेगा, उनका जीवन आबाद,, सब जगह छाया है, कैसी आम की माया है,, आम को आम चाहे ना मिले, बाकी सब ने वह पाया है,, आम आदमी की काया है, कृषकाय बदन, वदन है निस्तेज, उदर पूर्ति को हमेशा, निहारता एक टक रख आंखों में तेज,, आम को आम की तरह चूसते हैं, फिर भी मुझसे पूछते हैं, आम की चाम के कितने दाम मिलेंगे, वे आम हमें कहां वह कैसे मिलेंगे,,, मुझे अपनी ,उस तक आवाज पहुंचना है,, मैंने ही तो उसका, करुण क्रंदन पहचान है, सब खोज रहे हैं उसको, मिल जाए तो बताना मुझको,, निकाल कर अंधेरे से, प्रकाश तक पहुंचाना उसको,,

रचनाकार– अध्यापक प्रकाश चंद्र मेघवाल गरदाना चित्तौड़गढ़

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