समान नागरिक सहिंता के प्रावधान भारतीय सविधान के अनुच्छेद 44 में उल्लेखित है जिसमें राज्य को नीति निर्देशक तत्वों में निर्देश है कि राज्य यह प्रयास करेगा कि धर्म, जाति,पंथ , समुदाय से परे एक व्यक्तिगत कानून हो जिनमें व्यक्तिगत कानूनों में भेदभाव ना हो । यह नीति निर्देशक तत्वों का हिस्सा है और। राज्य को एक निर्देश है ।
दूसरी तरफ भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार अनुच्छेद 25 से 28 में है । जिसमें अनुच्छेद 25 (1) में किसी भी धर्म के अंतकरण ,धर्म को मानने ,आचरण करने ,प्रचार करने , अपने धर्म विरासत का सरंक्षण ,प्रबंधन की स्वतंत्रता देती है जिसमें किसी को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए ।
फौजदारी , संपति हस्तांतरण , अनुबंध, परिवाद ,दायित्व आदि कानूनों में एकरुपता है लेकिन अपने धर्म व संस्कृति के अनुसार व्यक्तिगत कानून अलग है , जिसमें विवाह ,तलाक ,गोद , उत्तराधिकार ,भरणपोषण आदि अपनी संस्कृति व अपने धर्म के अनुसार होता है । अभी कानूनन रुप से व्यक्तिगत गत कानून में हिंदू विधि , मुस्लिम विधि व सिक्खों का आनंद मेरिज एक्ट मुख्य रुप से प्रचलित है और समान नागरिक संहिता का उद्देश्य उनको एक करना है और सभी धर्मो पर एक व्यक्तिगत कानून लागू करना है।

बौद्ध समाज का अलग व्यक्तिगत कानून नही है और यह कानूनन  हिंदू विधि से संचालित है । लेकिन बौद्ध समाज के रीति- रिवाज , विवाह पद्धति व अन्य संस्कार व संस्कृति  अन्यो धर्मो से अलग है जिसके आधार पर बौद्ध व्यक्तिगत कानून की मांग लंबे समय से चल रही है और बौद्ध व्यक्तिगत कानून का मसौदा विधि आयोग भारत सरकार के पास लंबित है।, महाबोधि महाविहार आंदोलन में  बौद्धों को प्रबंधन सौंपने , अनुच्छेद 25(2) स्पष्टीकरण  में बौदो को अलग करने आदि की मांगे व कानूनी लड़ाई चल रही हैं । 

समान नागरिक संहिता के प्रावधानों से बौद्ध समाज अपनी पहचान , अपनी संस्कृति ,अपने संस्कार ,अपने रीति-रिवाज , अपनी विरासत बचाने में असमर्थ हो जाएगा । बौद्ध समाज की विरासत संरक्षण , व्यक्तिगत कानून की लड़ाई रुक जावेगी और समान रूप से बहुसंख्यक के बने व्यक्तिगत कानून का हिस्सा होना पडेगा । हो सकता हैं , बौद्ध विवाह में सप्तपथी व अग्नि साक्षी अनिवार्य हो सकती हैं ,यह संभावना हैं । बौद्ध गया महाविहार में बौद्ध विरासत में बौद्ध प्रतिनिधि का मांग इसके बाद जायज नही रहे । हम अपने अस्तित्व व विरासत की लड़ाई लड रहे हैं । जो बौद्ध समाज का हिस्सा नही है ,उनपर कोई प्रभाव नही पडेगा।
कुछ राज्य उतराखंड , गुजरात , गोवा आदि में समान नागरिक संहिता राज्य सरकार द्वारा लागू की गई ।
संक्षेप रुप में समान नागरिक सहिंता मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है और प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप है। अल्पसंख्यक समाज , आदिवासी समाज , बौद्ध समाज को अपनी पहचान , संस्कृति , प्रथाए , रिवाज के अस्तित्व पर खतरा है । समता ,स्वतंत्रता, भाईचारे व धर्मनिरपेक्ष प्रावधानके प्रतिकूल है ।नीति निर्देशक तत्वों के निर्देश के बजाय मोलिक अधिकारों को प्राथमिकता मिलना चाहिए।
बौद्ध समाज को सजक रहकर अपनी संस्कृति ,संस्कार व विरासत के लिये संघर्ष करना चाहिए । बौद्ध संस्कृति समण ,मानवतावादी , सदाचार व नैतिकता पर आधारित है जिसका संरक्षण व स्वतंत्रता बनी रहना चाहिए। मै व्यक्तिगत रुप से समान आचार संहिता से असहमत हूँ जो मेरे निजी विचार है ।

एडवोकेट रघुनाथ बौद्ध
प्रदेश अध्यक्ष
मिशन जय भीम राजस्थान
7976214238

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