दीवारें नहीं, व्यवस्था को पहचानिए; जनता की एकता ही लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी शक्ति।
भूमिका
गजब का प्रबंध है इस देश में — मुनाफा निजी तिजोरियों में जाता है और घाटा जनता के खाते में लिखा जाता है।
मंगलम् (कल्याण) किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए, परंतु जब शासन की नीतियों का लाभ सीमित हाथों तक सिमटने लगे और उसके दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ें, तब नागरिकों का चिंतित होना स्वाभाविक है। आज देश में विकास, निजीकरण, आर्थिक सुधार और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर तीखी बहस चल रही है। इन बहसों के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या विकास का लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुँच रहा है या नहीं। ट्रांसपेरेंसी (पारदर्शिता) केवल भाषणों का विषय नहीं बल्कि शासन की आत्मा होनी चाहिए। यदि जनता संसाधनों की स्वामी है तो उसे निर्णयों की जानकारी और उनका लाभ भी मिलना चाहिए। स्टार्टअप (नवाचार आधारित नया उद्यम) जैसी अवधारणाएँ तभी सफल मानी जाएँगी जब अवसर समान हों। लोकतंत्र का मूल्य केवल चुनाव नहीं बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था से तय होता है। इंसाफ़ (न्याय)।
- समत्वम् (समानता) संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, लेकिन आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उनका वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। जब राष्ट्रीय संपत्तियाँ निजी हाथों में जाती हैं और जनता से कहा जाता है कि यही विकास का मार्ग है, तब यह भी देखना आवश्यक है कि उस विकास का लाभ कितना व्यापक है। यदि लाभ सीमित वर्ग तक सिमट जाए और जोखिम समाज उठाए तो असंतुलन पैदा होता है। अकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही) हर नीति की अनिवार्य शर्त होनी चाहिए। जनता कर देती है ताकि उसका धन सार्वजनिक हित में उपयोग हो। इकोसिस्टम (समग्र कार्य-परिवेश) तभी स्वस्थ बनता है जब सरकार, उद्योग और समाज तीनों उत्तरदायी हों। लोकतंत्र विश्वास पर चलता है, केवल प्रचार पर नहीं। एहतिराम (सम्मान)।
- विवेकः (सद्बुद्धि) लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जागरूक नागरिक होता है। शब्दों का चयन कई बार वास्तविकता से अधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है। बड़े आर्थिक निर्णयों को आकर्षक नाम दिए जाते हैं और सामान्य नागरिक कठिन परिस्थितियों को अपनी नियति मान लेता है। इसलिए आवश्यक है कि समाज हर नीति को उसके परिणामों के आधार पर परखे। नैरेटिव (घटनाओं की व्याख्या) बदलने से सत्य नहीं बदलता। भाषा का प्रयोग यदि भ्रम पैदा करने के लिए हो तो लोकतंत्र कमजोर पड़ता है। डिजिटल (अंकीय तकनीक आधारित) युग में सूचना की सत्यता परखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। विवेकपूर्ण समाज ही सही दिशा चुन सकता है। हकीकत (वास्तविकता)।
- धैर्यम् (संयम) कठिन समय में समाज की सबसे बड़ी पूँजी है। बेरोज़गारी, महँगाई और अवसरों की कमी किसी एक जाति या धर्म की समस्या नहीं बल्कि पूरे देश की चुनौती है। दुर्भाग्य यह है कि अनेक बार मूल प्रश्न पीछे छूट जाते हैं और समाज पहचान की बहसों में उलझ जाता है। इससे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान कम हो जाता है। स्किल (कौशल) आधारित शिक्षा और रोजगार पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। युवा यदि अपनी ऊर्जा रचनात्मक दिशा में लगाए तो देश की तस्वीर बदल सकती है। नेटवर्किंग (संपर्क निर्माण) आज सफलता का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। जागरूक युवा ही राष्ट्र का भविष्य हैं। उम्मीद (आशा)।
- सौहार्दम् (भाईचारा) किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होता है। महँगाई किसी की जाति नहीं पूछती, बेरोज़गारी किसी का धर्म नहीं देखती और आर्थिक संकट किसी विशेष वर्ग तक सीमित नहीं रहता। फिर भी समाज यदि आपसी विभाजन में उलझा रहे तो सबसे अधिक लाभ उसी को मिलता है जो जनता की एकता से डरता है। यूनिटी (एकता) केवल भाषण का विषय नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार बननी चाहिए। साझा समस्याओं का समाधान भी साझा प्रयासों से ही संभव है। को-वर्किंग (सहकार्य) की भावना लोकतंत्र को मजबूत करती है। एकजुट समाज ही सशक्त राष्ट्र बनाता है। अमन (शांति)।
- प्रज्ञा (गहन बुद्धि) यह सिखाती है कि किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके दीर्घकालिक प्रभाव से किया जाना चाहिए। यदि आर्थिक विकास के साथ सामाजिक असमानता भी बढ़ती जाए तो वह विकास अधूरा माना जाएगा। सार्वजनिक धन और राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग जनहित में होना चाहिए। यही कल्याणकारी राज्य की पहचान है। इन्क्लूसिव (समावेशी) विकास ही टिकाऊ विकास माना जाता है। प्रत्येक नागरिक को समान अवसर मिलना चाहिए। ग्रीनफील्ड (नव विकसित परियोजना क्षेत्र) में निवेश के साथ स्थानीय लोगों का हित भी सुरक्षित रहना चाहिए। समृद्धि का अर्थ सबकी भागीदारी है। बरकत (समृद्धि)।
- संकल्पः (दृढ़ निश्चय) परिवर्तन की पहली सीढ़ी है। इतिहास गवाह है कि जागरूक समाज अपने अधिकारों की रक्षा स्वयं करता है। लोकतंत्र में केवल मतदान पर्याप्त नहीं, बल्कि निरंतर संवाद और उत्तरदायित्व भी आवश्यक है। नागरिक जितने सजग होंगे, शासन उतना अधिक जवाबदेह बनेगा। फैक्ट (तथ्य) आधारित चर्चा लोकतंत्र को मजबूत करती है। भावनाओं के साथ प्रमाणों का भी सम्मान होना चाहिए। स्मार्टसिटी (आधुनिक नियोजित नगर) तभी सार्थक होगी जब उसके लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचें। जागरूकता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। ख़ुलूस (निष्कपटता)।
- सत्यम् (सत्य) आखिरकार स्वयं अपना मार्ग बना लेता है। लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं बल्कि विचारों की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है तब उत्तरदायित्व भी कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए नागरिकों का सजग रहना आवश्यक है। रिस्पॉन्सिबिलिटी (जिम्मेदारी) केवल सरकार की नहीं बल्कि समाज की भी होती है। संवाद और तथ्य मिलकर स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण करते हैं। फिनटेक (वित्तीय प्रौद्योगिकी) जैसे नए क्षेत्रों का लाभ भी समान रूप से समाज तक पहुँचना चाहिए। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता है। रौनक (गरिमा और चमक)।
- लोकहितम् (जनकल्याण) शासन की प्रत्येक नीति का अंतिम उद्देश्य होना चाहिए। जब जनता अपने साझा हितों को पहचानती है तब विभाजन की दीवारें स्वतः कमजोर होने लगती हैं। शोषण वहीं सफल होता है जहाँ समाज बिखरा हुआ हो। इसलिए समय की माँग है कि नागरिक जाति, धर्म और संकीर्ण पहचान से ऊपर उठकर संविधान, समान अवसर और सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर विचार करें। पार्टिसिपेशन (सहभागिता) लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। हाइपरलोकल (स्थानीय स्तर पर केंद्रित) भागीदारी भी राष्ट्रीय परिवर्तन का आधार बन सकती है। जागरूक नागरिक ही राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी हैं। कामयाबी (सफलता)।
समापन
शुभम् (मंगलकारी) किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं बल्कि उसके नागरिकों के विश्वास, समान अवसर और न्यायपूर्ण व्यवस्था से निर्धारित होता है। यदि लाभ निजी हाथों में सिमट जाए और बोझ समाज पर आ जाए तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होने लगती है। इसलिए आवश्यक है कि नागरिक भावनाओं के बजाय तथ्यों के आधार पर निर्णय लें, संविधान के मूल्यों को समझें और लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक उत्तरदायी बनाने की दिशा में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ। गुड गवर्नेंस (सुशासन) तभी संभव है जब शासन और जनता के बीच विश्वास बना रहे। सस्टेनेबिलिटी (दीर्घकालिक स्थिरता) न्यायपूर्ण विकास की पहचान है। आखिरकार वही राष्ट्र आगे बढ़ता है जहाँ जनहित सर्वोपरि हो। फ़लाह (समग्र कल्याण)।
शेर :
“जो हक़ की बात करे, वही ज़माने को अखरता है,
मगर सच का सूरज हर अँधेरे से उभरता है।”

संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी , रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
हाल मुकाम ग्राम नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर।
(राजस्थान)
स्रोत एवं संदर्भ :
डा पुरुषोत्तम मेघवाल की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं भारतीय संविधान, सामाजिक न्याय की अवधारणा, लोकतांत्रिक मूल्य, सार्वजनिक विमर्श, आर्थिक असमानता और समसामयिक जनचर्चाओं के विश्लेषण पर आधारित।
