
“विद्या (शिक्षा) के बिना बुद्धि गई, बुद्धि के बिना नीति गई, नीति के बिना गति (विकास/प्रगति) गई, गति के बिना वित्त (धन/संपत्ति) गया, और वित्त के बिना शूद्र लाचार व बर्बाद हो गए;
केवल एक अविद्या (अशिक्षा) ने इतने सारे अनर्थ कर डाले।” — क्रांतिसूर्य राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले
डिस्क्लेमर / अस्वीकरण
प्रस्तुत लेख राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले द्वारा वर्ष 1873 में रचित ऐतिहासिक एवं दार्शनिक कृति ‘गुलामगिरी’ के मूल संवादों, वैचारिक व्याख्यानों तथा ऐतिहासिक विमर्श के अध्ययन व विश्लेषण पर आधारित है।
इसका एकमात्र उद्देश्य 19वीं सदी के सामाजिक आंदोलन, सत्यशोधक दर्शन, शिक्षा के महत्व तथा मानवीय समता व आत्मसम्मान के ऐतिहासिक संघर्ष का निष्पक्ष व अकादमिक अध्ययन प्रस्तुत करना तथा जन-जागरूकता का प्रसार करना है। यह किसी भी संप्रदाय, जाति, धर्म अथवा समूह की व्यक्तिगत भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक समाज-वैज्ञानिक तथ्यों, महात्मा फुले के मूल दृष्टिकोण तथा उनके सामाजिक न्याय दर्शन को रेखांकित करने हेतु प्रस्तुत किया गया है।
प्राक्कथन: भारतीय सामाजिक क्रांति का प्रस्थान बिंदु
1 जून 1873 को जब राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव गोविंदराव फुले ने अपनी युगांतरकारी कृति ‘गुलामगिरी’ (Slavery: In the Civilized British Government Under the Cloak of Brahmanism) प्रकाशित की, तब वह केवल स्याही से लिखा गया एक दस्तावेज नहीं था; वह सदियों से जड़वत, पदानुक्रमित और विषमतामूलक वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध बहुजन समाज का पहला खुला वैचारिक एवं दार्शनिक विद्रोह था।
बोधिसत्व डॉ. भीमराव आंबेडकर ने तथागत बुद्ध और संत कबीर के साथ महात्मा ज्योतिराव फुले को अपना तीसरा गुरु स्वीकार किया।
बाबासाहब के समूचे मुक्ति संघर्ष—चाहे वह ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ हो, ‘हू वर द शूद्राज’ हो या भारतीय संविधान में प्रतिष्ठापित सामाजिक न्याय का दर्शन—की वैचारिक आधारशिला फुले की इसी कालजयी कृति में निहित है।
‘गुलामगिरी’ का प्रकाशन उस ऐतिहासिक मोड़ पर हुआ जब भारत में 1857 के विद्रोह के उपरांत ब्रिटिश हुकूमत अपनी प्रशासनिक व्यवस्था सुदृढ़ कर रही थी और भारतीय समाज में सुधार के नाम पर केवल उच्च वर्गीय सुधारक अपनी सांस्कृतिक सत्ता को बचाते हुए सतही विमर्श चला रहे थे।
फुले ने उस समय सत्ता, धर्म और ज्ञान के शोषणकारी गठजोड़ को बेनकाब किया। उन्होंने स्पष्ट उद्घोष किया कि शूद्रों (ओबीसी/पिछड़ी जातियां) और अति-शूद्रों (दलित/अनुसूचित जातियां) की पराधीनता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि गहरी सांस्कृतिक, धार्मिक और मानसिक दासता है।
जब तक मस्तिष्क को जकड़ने वाले अंधविश्वास और पाखंड के धागे नहीं तोड़े जाएंगे, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना असंभव है।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, दार्शनिक प्रेरणा और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि
(क) 19वीं सदी का सामाजिक यथार्थ और पेशवाई के अवशेष
महाराष्ट्र में पेशवाई शासन (1713–1818) के दौरान जातिवादी दमन अपने सर्वाधिक अमानवीय और क्रूरतम चरम पर पहुँच चुका था।
शूद्रों और अति-शूद्रों को गले में हांडी (थूकने के लिए ताकि धरती अपवित्र न हो) और पीछे झाड़ू (पैरों के निशान मिटाने के लिए) बांधकर चलने पर विवश किया जाता था।
सार्वजनिक मार्गों पर चलने का समय दोपहर को तय किया जाता था ताकि उनकी लंबी परछाई किसी सवर्ण पर न पड़ सके।
यद्यपि 1818 में कोरेगांव-भीमा के ऐतिहासिक संग्राम के बाद पेशवाई सत्ता का अंत हुआ और अंग्रेजों का शासन स्थापित हुआ, किंतु फुले ने गहराई से अनुभव किया कि प्रशासनिक तंत्र, न्यायपालिका, राजस्व विभागों और नवस्थापित शिक्षा संस्थाओं पर पुनः उन्हीं उच्च वर्णों का एकाधिकार कायम हो गया। अंग्रेज शासकों की तटस्थता और उदासीनता के कारण बहुजन जनता पर वही पुराना शोषण नए कानूनों की आड़ में जारी रहा।
फुले ने इसी विडंबना को उजागर करते हुए पुस्तक का उपशीर्षक निर्धारित किया: “सभ्य ब्रिटिश सरकार में ब्राह्मणवाद के मुखौटे तले गुलामी।
(ख) अमेरिकी अश्वेत दास-मुक्ति आंदोलन को ऐतिहासिक समर्पण
‘गुलामगिरी’ की प्रस्तावना महात्मा फुले ने अंग्रेजी भाषा में लिखी और इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के उन न्यायप्रिय और उदारचेता नागरिकों को समर्पित किया, जिन्होंने अश्वेत दासों को दासता से मुक्ति दिलाने के लिए गृहयुद्ध लड़ा और अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
फुले का यह कदम वैश्विक चेतना और सामाजिक विश्लेषण की दृष्टि से अत्यंत क्रांतिकारी था:
उन्होंने भारतीय शूद्रों और अछूतों की तुलना अमेरिकी अश्वेत दासों से की।
उन्होंने सिद्ध किया कि अमेरिकी दासों की शारीरिक गुलामी से भी अधिक घातक भारत की मानसिक व धार्मिक गुलामी है, क्योंकि अमेरिकी दास जानता था कि वह गुलाम है, जबकि भारत में धार्मिक शास्त्रों और ईश्वरीय विधान का ऐसा मायाजाल रचा गया कि शोषित वर्ग अपनी दासता को पूर्वजन्म के कर्मों का फल मानकर सहने लगा।
उन्होंने आह्वान किया कि जिस प्रकार अमेरिका में दासता उन्मूलन के लिए आंदोलन हुआ, उसी प्रकार भारत में भी बहुजन समाज की मुक्ति के लिए व्यापक बौद्धिक और सामाजिक क्रांति आवश्यक है।
(ग) होमर का उद्धरण और मानवीय गरिमा का हनन
महात्मा फुले ने पुस्तक के आमुख में ग्रीक महाकवि होमर की कालजयी उक्ति को उद्धृत किया
“जिस दिन मनुष्य दास बनता है, उसी दिन विधाता उसके आधे सद्गुण हर लेता है।
इस विचार से उन्होंने स्पष्ट किया कि पराधीनता केवल भौतिक संसाधनों का अभाव नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के स्वाभिमान, सृजनात्मक सामर्थ्य, बौद्धिक विवेक और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का पूर्ण विनाश कर देती है।
- संरचनात्मक शिल्प:
ज्योतिराव और धुंडीराव का ऐतिहासिक संवाद
महात्मा फुले ने ‘गुलामगिरी’ की रचना किसी शुष्क ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि संवाद शैली (Dialogic Format) में की।
इस संवाद में दो प्रमुख चरित्र हैं
धुंडीराव
वह एक आम बहुजन, परंपरावादी, जिज्ञासु और समाज में प्रचलित पौराणिक कथाओं तथा धर्मशास्त्रों की मान्यताओं से प्रभावित जनसामान्य का प्रतिनिधि है, जो सत्य की खोज के लिए प्रश्न उठाता है।
ज्योतिराव
वे स्वयं महात्मा फुले के वैचारिक प्रतिरूप हैं—तर्कशील, वैज्ञानिक चेतना से संपन्न, ऐतिहासिक अन्वेषक और निडर समाज-सुधारक, जो हर प्रश्न का उत्तर ऐतिहासिक तथ्यों और वैज्ञानिक तर्क के आधार पर प्रस्तुत करते हैं।
यह संवाद पद्धति जनसामान्य की चेतना को झकझोरने और पुस्तकालयों के स्थान पर खेतों, चौपालों और बस्तियों तक वैचारिक विमर्श पहुँचाने में अभूतपूर्व रूप से सफल रही।
- पुस्तक के 16 अध्यायों का विस्तृत व गहन विश्लेषणात्मक सार
अध्याय 1
मत्स्य अवतार की वास्तविकता
धुंडीराव के प्रश्न पर ज्योतिराव स्पष्ट करते हैं कि कोई भी प्राणी आधी मछली और आधा मनुष्य बनकर जन्म नहीं ले सकता।
‘मत्स्य’ वास्तव में पश्चिमी समुद्र मार्ग से भारत के तटीय भूभागों पर आक्रमण करने वाले आक्रांताओं के पहले गिरोह अथवा उनकी नौसेना का प्रतीक था।
शंखासुर यहाँ के तटीय प्रदेश का मूलनिवासी रक्षक राजा था।
आक्रांताओं ने शंखासुर की हत्या कर उसके ज्ञान-भंडार को छीना और उसे धर्म-रक्षा की मनगढ़ंत कहानी में बदल दिया।
अध्याय 2
कच्छप अवतार का रहस्य
कछुए द्वारा मंदराचल पर्वत को पीठ पर साधने की कथा को फुले ने अवैज्ञानिक बताते हुए खारिज किया।
ऐतिहासिक संदर्भ में ‘कच्छ’ आक्रांताओं के दूसरे समुद्री व दलदली अभियान का सूचक था।
समुद्र मंथन वास्तव में मूलनिवासियों के द्वीपों और प्राकृतिक संसाधनों की व्यवस्थित लूट थी, जिसमें से 14 बहुमूल्य रत्न (प्राकृतिक संपदा) आक्रांताओं ने छीन लिए और कष्ट व शोषण की विषैली परिस्थितियां मूलनिवासियों के हिस्से छोड़ी गईं।
अध्याय 3
वराह अवतार और धरती का शोषण
सूअर के दांतों पर पूरी पृथ्वी टिकने की कल्पना का तार्किक खंडन करते हुए फुले बताते हैं कि ‘वराह’ एक क्रूर, जंगली और बीहड़ मार्गों से आक्रमण करने वाले हमलावर सरदार की उपाधि थी।
उसने मूलनिवासी राजा हिरण्याक्ष के उपजाऊ कृषि प्रदेशों पर हमला किया, कृषि संपदा और खदानों को लूटा तथा राजा की हत्या कर दी, जिसे बाद में धार्मिक आवरण प्रदान कर दिया गया।
अध्याय 4
नृसिंह अवतार और राजा हिरण्यकशिपु की हत्या
फुले इसे एक राजनीतिक षड्यंत्र और सुनियोजित कूटनीति के रूप में व्याख्यायित करते हैं।
नृसिंह कोई अलौकिक जीव नहीं, बल्कि शेर का मुखौटा धारण किया हुआ आक्रांता हमलावर था।
हिरण्यकशिपु अपने क्षेत्र के न्यायप्रिय राजा थे। उनके पुत्र प्रह्लाद का मानसिक मतांतरण कर घर में दरार डाली गई और निहत्थे राजा की संध्या-विश्राम के समय चौखट पर विश्वासघात से हत्या की गई।
अध्याय 5
वामन अवतार और बलि राजा का स्वर्णिम युग
यह अध्याय पुस्तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र है।
राजा बलि भारत के मूलनिवासी किसानों, श्रमजीवियों और शिल्पकारों के अत्यंत लोकप्रिय, समतावादी और न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट थे। उनके शासनकाल में प्रजा सुखी, समृद्ध और भयमुक्त थी। वामन ने भिक्षुक का वेश बनाकर छल-प्रपंच और कूटनीति के बल पर राजा बलि के साम्राज्य, प्रशासनिक केंद्रों और राजधानी पर अधिकार किया। फुले ने बहुजनों से आह्वान किया कि वे छली वामन के स्थान पर अपने सच्चे पूर्वज राजा बलि के लोक-कल्याणकारी आदर्शों को अपनाएं।
अध्याय 6
परशुराम की क्रूरता और मूल क्षत्रियों का संहार
फुले स्पष्ट करते हैं कि यहाँ ‘क्षत्रिय’ का अर्थ जन्मना जाति नहीं, बल्कि ‘क्षेत्र-पति’ (भूमिपुत्र, किसान और धरती के रक्षक) था।
परशुराम ने भूमि पर वर्चस्व स्थापित करने के लिए मूलनिवासी शासकों और किसानों का भयानक रक्तपात किया। असहाय महिलाओं और अनाथ बच्चों को दास बना लिया गया, जिन्हें आगे चलकर सामाजिक पदानुक्रम में सबसे नीचे धकेल दिया गया।
अध्याय 7
शूद्र और अति-शूद्र शब्दों की वास्तविक उत्पत्ति
‘शूद्र’ और ‘अति-शूद्र’ शब्द किसी दैवीय विधान की देन नहीं हैं।
युद्ध में पराजित और निहत्थे कर दिए गए भूमिपुत्रों को ‘शूद्र’ कहा गया। जिन वीर लड़ाकों ने कभी पराधीनता स्वीकार नहीं की और जंगलों में रहकर प्रतिरोध जारी रखा, उन्हें व्यवस्था ने गांव की परिधि से बाहर धकेलकर ‘अति-शूद्र’ (अस्पृश्य) घोषित कर दिया। वस्तुतः वे इस धरती के सबसे स्वाभिमानी स्वतंत्रता सेनानी थे।
अध्याय 8
ब्रह्मा की सृष्टि और ‘मुख से जन्म’ के पाखंड का विखंडन
फुले ने चातुर्वर्ण्य व्यवस्था की जैविक असंगति पर तीखा प्रहार किया।
यदि ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण और पैरों से शूद्र पैदा हुए, तो शेष विश्व के मानव समुदाय ब्रह्मा के किस अंग से उत्पन्न हुए?
क्या मुख से जैविक प्रसव संभव है? यह सिद्धांत केवल एक वर्ग को जन्मजात सर्वोच्चता प्रदान करने और बहुसंख्यक श्रमजीवियों को जन्मजात हीनता में बांधने के लिए गढ़ा गया सामाजिक षड्यंत्र था।
अध्याय 9
शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों की रचना का गुप्त उद्देश्य
धर्मग्रंथ ईश्वर-निर्मित नहीं, अपितु विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग द्वारा अपनी सत्ता बनाए रखने हेतु रचित सामाजिक-राजनीतिक नियमावलियां हैं।
इन ग्रंथों में शूद्रों के लिए विद्यार्जन पर कड़े दंड निर्धारित किए गए ताकि वे कभी अपने अधिकारों और शोषण के कारणों को न समझ सकें।
अध्याय 10
शिक्षा की लूट और विद्याहीनता का षड्यंत्र
शिक्षा पर प्रतिबंध लगाना बहुजन समाज को पंगु बनाने का मूल कारण था।
विद्या के अभाव ने विवेक छीना, विवेक के अभाव ने प्रगति रोकी, प्रगति रुकने से आर्थिक संपदा छिन गई और बहुजन समाज अपनी ही भूमि पर अधिकारहीन मजदूर बनकर रह गया।
अध्याय 11:
ब्रिटिश शासन का दोहरा चरित्र और प्रशासनिक मिलीभगत
फुले ने ब्रिटिश शासन की आधुनिक न्यायप्रणाली को स्वीकार करते हुए भी उनकी प्रशासनिक प्रणाली की कड़ी आलोचना की।
स्थानीय स्तर पर राजस्व, न्यायालय और पुलिस तंत्र में वही पुराना सवर्ण वर्ग काबिज था, जो अनपढ़ किसानों के भूमि रिकॉर्ड में हेराफेरी कर उनका शोषण करता था और अंग्रेज अधिकारी जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ बने रहते थे।
अध्याय 12
किसानों, शिल्पकारों और मजदूरों की आर्थिक बदहाली
फुले ने कृषि संकट का यथार्थवादी विश्लेषण किया। किसान दिन-रात परिश्रम करता है, किंतु सरकारी लगान, साहूकारों के भारी ब्याज और धार्मिक कर्मकांडों में पुरोहितों को दी जाने वाली दक्षिणा के कारण वह आजीवन ऋण के दुष्चक्र में फंसा रहता है।
अध्याय 13
सत्यशोधक समाज का दर्शन और मध्यस्थता की समाप्ति
फुले के अनुसार संपूर्ण सृष्टि का रचयिता ‘निर्मिक’ (सृष्टिकर्ता) है।
जिस प्रकार संतान को माता-पिता से संबंध स्थापित करने के लिए किसी बिचौलिए की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार ईश्वर और मनुष्य के मध्य किसी भी पुरोहित या बिचौलिए की मध्यस्थता अनावश्यक और शोषणकारी है।
अध्याय 14
महिला मुक्ति-क्रांति की पहली शर्त
पितृसत्ता और जाति व्यवस्था एक-दूसरे को शक्ति प्रदान करते हैं।
स्त्रियों को शिक्षा और अधिकारों से वंचित रखा गया। फुले ने उद्घोष किया कि महिलाएं सामाजिक बदलाव की अग्रदूत हैं।
एक शिक्षित स्त्री पूरे परिवार और समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाती है।
अध्याय 15
आधुनिक विचारों और वैज्ञानिक शिक्षा का प्रभाव
थॉमस पेन के मानवाधिकार दर्शन और मिशनरी स्कूलों की सार्वभौमिक शिक्षा ने दमित वर्गों में आत्मसम्मान का संचार किया।
फुले ने बल दिया कि तर्कसंगत और वैज्ञानिक शिक्षा ही सामाजिक मुक्ति का एकमात्र राजमार्ग है।
अध्याय 16
बहुजन एकता, जागरण और एक नए समतामूलक समाज का संकल्प
पुस्तक का निष्कर्ष
एक संगठित आह्वान है।
धुंडीराव का अज्ञान समाप्त होता है और वे संकल्प लेते हैं।
फुले का स्पष्ट संदेश है कि शूद्रों, अति-शूद्रों और श्रमिकों को जातिगत विभाजनों से ऊपर उठकर संगठित होना होगा।
शिक्षा, स्वावलंबन और समता पर आधारित सत्यशोधक समाज का निर्माण ही वास्तविक लक्ष्य है।
- ‘गुलामगिरी’ के केंद्रीय वैचारिक स्तंभ
वैचारिक आयाम
रूढ़िवादी/पुरोहितवादी मान्यता
‘गुलामगिरी’ का क्रांतिकारी सत्यशोधक विमर्श
सृष्टि और वर्ण
ईश्वर के विभिन्न अंगों से चार वर्णों की उत्पत्ति हुई।
सभी मनुष्य ‘निर्मिक’ की समान संतान हैं; वर्ण व्यवस्था पूर्णतः मानव-निर्मित शोषणकारी तंत्र है।
अवतार परंपरा
मत्स्य, कच्छ, वराह, नृसिंह, वामन आदि धर्म-रक्षक अवतार हैं।
ये आक्रांताओं द्वारा मूलनिवासियों की भूमि व संपदा पर कब्जे तथा नरसंहार के ऐतिहासिक रूपक हैं।
राजा बलि
बलि एक अहंकारी ‘असुर’ और दानव राजा था जिसे पाताल भेजा गया।
बलि एक महान, न्यायप्रिय, समतावादी और लोक-कल्याणकारी जननायक एवं भूमिपुत्र थे।
पराधीनता का कारण
पूर्व जन्म के संचित कर्म
और दैवीय प्रारब्ध।
विद्या और ज्ञान से जानबूझकर वंचित रखकर थोपी गई राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक गुलामी।
मुक्ति का मार्ग
तीर्थ, व्रत, अंधानुकरण और पुरोहितों की पूजा।
तर्क, आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा, संगठन, स्वाभिमान और सामाजिक समता का संघर्ष।
- समकालीन बहुजन समाज के लिए ‘गुलामगिरी’ की प्रासंगिकता
डेढ़ सदी बीत जाने के बाद भी ‘गुलामगिरी’ का वैचारिक संदेश अत्यंत सामयिक है
सांस्कृतिक व मानसिक गुलामी के आधुनिक स्वरूप से संघर्ष:
आज भी अंधविश्वास और कर्मकांडों के माध्यम से बहुजन युवाओं की वैज्ञानिक सोच को दबाने का प्रयास किया जाता है।
फुले की दृष्टि बताती है कि मानसिक मुक्ति के बिना सामाजिक और राजनीतिक अधिकार सुरक्षित नहीं रह सकते।
शिक्षा के व्यवसायीकरण के विरुद्ध वैचारिक रक्षा-पंक्ति:
फुले ने 1882 में हंटर कमीशन के समक्ष जिस अनिवार्य व मुफ्त प्राथमिक शिक्षा की मांग की थी, उसकी प्रेरणा ‘गुलामगिरी’ में थी।
वर्तमान में जब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को महंगा किया जा रहा है, फुले का शिक्षा-दर्शन संघर्ष का मार्ग दिखाता है।
शूद्र और अति-शूद्र (OBC, SC, ST) की अटूट एकजुटता: फुले ने स्पष्ट माना था कि श्रमजीवी जातियां एक ही मूलवृक्ष की शाखाएं हैं।
जातियों और उपजातियों में बंटने के स्थान पर सामूहिक बहुजन चेतना का निर्माण समय की अनिवार्य मांग है।
सच्चा राष्ट्रवाद और जनकल्याण:
फुले के लिए राष्ट्र का अर्थ केवल भौगोलिक सीमाएं नहीं, बल्कि उसमें निवास करने वाले करोड़ों किसान, मजदूर और वंचित नागरिक हैं।
- उपसंहार
संकल्प और भावी दिशा
‘गुलामगिरी’ केवल इतिहास का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि भविष्य की सामाजिक मुक्ति का घोषणापत्र है।
यह पुस्तक हमें यह आत्मबोध कराती है कि:
“हम गुलाम नहीं, हम इस धरती के मूल मालिक और निर्माता हैं।
हक और अधिकार याचना से नहीं, अपितु अध्ययन, चिंतन, संगठन और निर्भीक संघर्ष से प्राप्त किए जाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘गुलामगिरी’ के प्रत्येक विचार को बस्तियों, गांवों और जन-जन तक पहुँचाया जाए ताकि एक प्रबुद्ध, तार्किक, न्यायपूर्ण और समतामूलक भारत का निर्माण हो सके।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर- 94622-60179

