शिक्षा, नवाचार और सतत विकास के अग्रदूत, सोनम वांगचुक

“शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मस्तिष्क को केवल सूचनाओं से भरना नहीं, बल्कि मनुष्य को अपने परिवेश की व्यावहारिक समस्याओं के समाधान खोजने के योग्य बनाना है।

प्रस्तावना विषम भूगोल से वैश्विक पटल तक
जब हम भारत के शीर्ष पर स्थित लद्दाख की बात करते हैं, तो मानस पटल पर बर्फ से ढके पहाड़ और एक दुर्गम भौगोलिक परिवेश की छवि उभरती है।

इसी कठोर प्राकृतिक परिवेश के बीच से एक ऐसी शख्सियत का उदय हुआ, जिसने यह साबित कर दिया कि यदि इच्छाशक्ति सुदृढ़ हो और सोच मौलिक हो, तो प्रकृति की सबसे बड़ी चुनौतियों को भी विकास के अवसरों में बदला जा सकता है। वह नाम है—सोनम वांगचुक।

सोनम वांगचुक केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं है; वे अपने आप में एक जीवंत विचार, एक व्यावहारिक संस्था और आधुनिक युग के कर्मयोगी हैं।

एक मैकेनिकल इंजीनियर, प्रखर शिक्षाविद्, असाधारण वैज्ञानिक और संवेदनशील सामाजिक अन्वेषक के रूप में उनका संपूर्ण जीवनवृत्त इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि स्थानीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय कैसे मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

शिक्षा क्षेत्र के अधिकारियों, शिक्षकों, नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों के लिए उनका जीवन एक ऐसा मार्गदर्शक है, जो व्यवस्थागत सुधारों और सामुदायिक सहभागिता की नई राह दिखाता है।

  1. जन्म, पारिवारिक पृष्ठभूमि और बचपन का परिवेश
    सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के लेह जिले में सिंधु नदी के किनारे बसे ‘उलेतोकपो’ नामक एक बेहद छोटे और दुर्गम गांव में हुआ था।

लद्दाखी परंपराओं के अनुसार बचपन में उनके पारिवारिक परिवेश का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा।

माता-पिता का संबल
उनके पिता सोनम वांग्याल लद्दाख के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और सम्मानित राजनेता थे, जिन्होंने बाद में राज्य सरकार में मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दीं।

उनकी माता छेरिंग वांगमो एक विदुषी गृहणी थीं। यद्यपि पिता राजनीतिक कार्यों के कारण अक्सर घर से दूर रहते थे, परंतु माता ने वांगचुक के भीतर प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम, संवेदनशीलता और जुझारूपन के संस्कार रोपे।

प्रकृति की पाठशाला
उलेतोकपो गांव में उस समय कोई औपचारिक स्कूल नहीं था।

आधुनिक दृष्टिकोण से इसे एक अभाव माना जा सकता है, लेकिन वांगचुक के लिए यह एक वरदान साबित हुआ।

उनका शुरुआती बचपन किताबों के बोझ से दूर, खेतों में काम करते हुए, फसलों को उगते हुए देखते हुए, मवेशियों को चराते हुए और प्रकृति की सूक्ष्म गतिविधियों को समझते हुए बीता।

यह उनके जीवन की वह पहली पाठशाला थी जिसने उन्हें व्यावहारिक तौर पर आत्मनिर्भर और खोजी प्रवृत्ति का बनाया।

  1. शिक्षा यात्रा, बाधाओं से संघर्ष और भाषाई द्वंद्व
    सोनम वांगचुक की औपचारिक शिक्षा की शुरुआत किसी सामान्य बच्चे की तरह सुगम नहीं थी।

उनका शैक्षणिक सफर यह समझने के लिए एक आदर्श उदाहरण है कि भाषा और पाठ्यक्रम का बाल मनोविज्ञान पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है।

मातृभाषा का प्रभाव और प्राथमिक शिक्षा
9 वर्ष की आयु तक वांगचुक ने किसी स्कूल का मुंह नहीं देखा था।

उनकी माता ही उनकी पहली शिक्षिका थीं।

उन्होंने वांगचुक को उनकी मातृभाषा ‘लद्दाखी’ में बुनियादी साक्षरता, अंकगणित और लद्दाख की समृद्ध सांस्कृतिक कहानियों से अवगत कराया।

इस अनौपचारिक शिक्षा का लाभ यह हुआ कि वांगचुक का मस्तिष्क रटने की प्रवृत्ति से मुक्त रहा और उनकी सोचने की क्षमता का स्वाभाविक विकास हुआ।

भाषाई आघात और दृढ़ संकल्प
जब वे 9 वर्ष के हुए, तब उनके पिता की राजनीतिक व्यस्तताएं श्रीनगर में बढ़ गईं।

उनका दाखिला श्रीनगर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में कराया गया।

यह वांगचुक के जीवन का पहला बड़ा सांस्कृतिक और भाषाई आघात था।

स्कूल में शिक्षा का माध्यम उर्दू और अंग्रेजी था, जबकि वांगचुक केवल लद्दाखी जानते थे।

कक्षा में जब शिक्षक उर्दू या अंग्रेजी में पढ़ाते, तो बालक सोनम को कुछ समझ नहीं आता था।

उन्हें सहपाठियों और शिक्षकों द्वारा ‘कमजोर छात्र’ समझा जाने लगा।

भाषा न आने के कारण उन्हें अक्सर कक्षा में पीछे बैठना पड़ता था।

एक दिन, इस भाषाई अलगाव और अपमान से तंग आकर 9 वर्षीय बालक ने एक अत्यंत साहसिक कदम उठाया।

वे बिना किसी को बताए स्कूल से निकल गए और सीधे दिल्ली जाने वाली बस में सवार हो गए।

वे दिल्ली पहुंचे और वहां अपने अधिकारों के लिए प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क किया।

इस घटना ने उनके भीतर के अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प को बचपन में ही रेखांकित कर दिया था।

दिल्ली में शिक्षा और उच्च शिक्षा की ओर कदम
दिल्ली आने के बाद, उनका दाखिला ‘विशेष केंद्रीय विद्यालय’ में हुआ।

यहाँ के सहायक वातावरण में उन्होंने तेजी से हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं पर पकड़ बनाई।

वांगचुक ने माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा में अपनी कुशाग्रता का परिचय दिया।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग (B.Tech.)
स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात, विज्ञान और मशीनों की व्यावहारिक कार्यप्रणाली में गहरी रुचि होने के कारण, उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT), श्रीनगर में प्रवेश लिया।

वर्ष 1987 में उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

मिट्टी की वास्तुकला का अध्ययन फ्रांस,बी.टेक. करने के बाद वे पारंपरिक कॉरपोरेट नौकरियों की दौड़ में शामिल नहीं हुए।

वे लद्दाख की पारंपरिक निर्माण शैली को वैज्ञानिक आधार देना चाहते थे।

इसके लिए उन्होंने फ्रांस के प्रसिद्ध ‘क्रेटर स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर’ से मिट्टी की वास्तुकला का विशेष अध्ययन किया, जिसने उनके आगामी निर्माण कार्यों की नींव रखी।

  1. शैक्षणिक क्रांति: ‘सेकमोल की स्थापना
    वर्ष 1988 में जब सोनम वांगचुक अपनी इंजीनियरिंग पूरी कर लद्दाख लौटे, तो उन्होंने एक भयावह सामाजिक सच का सामना किया।

लद्दाख में कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा में बैठने वाले 95% छात्र अनुत्तीर्ण हो जाते थे।

वांगचुक ने जब इसकी गहराई से पड़ताल की, तो पाया कि दोष बच्चों की बुद्धिमत्ता का नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था का था।

लद्दाख के बच्चों को जो पाठ्यपुस्तकें पढ़ाई जा रही थीं, वे दिल्ली या अन्य मैदानी इलाकों के विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई थीं।

उदाहरण के लिए, लद्दाख के बच्चों को किताबों में ‘जहाज’, ‘समुद्र’ और ‘नारियल के पेड़’ के बारे में पढ़ाया जा रहा था, जबकि उन्होंने अपने पूरे जीवन में केवल ‘याक’, ‘बर्फबारी’ और ‘ग्लेशियर’ देखे थे।

साथ ही, परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी या उर्दू था, जो उनकी मातृभाषा नहीं थी।

इस व्यवस्थागत विसंगति को दूर करने के लिए सोनम वांगचुक ने वर्ष 1988 में अपने भाई-बहनों और स्थानीय युवाओं के साथ मिलकर SECMOL (Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh) की स्थापना की।

सेकमोल का त्रिसूत्र
(बौद्धिक व तार्किक विकास)
रटने के बजाय सोचने और प्रश्न करने की क्षमता का विकास।

व्यावहारिक व तकनीकी कौशल
हाथों से काम करने का सम्मान और
तकनीकी दक्षता।

करुणा व सामाजिक भावना
समाज और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता।

वैकल्पिक सेकमोल परिसर
लेह से लगभग 25 किलोमीटर दूर पोफे नामक स्थान पर वांगचुक ने सेकमोल के ‘वैकल्पिक परिसर’ की स्थापना की।

यह परिसर दुनिया का अपने आप में एकमात्र ऐसा संस्थान है, जहां उन बच्चों को प्राथमिकता दी जाती है जो पारंपरिक बोर्ड परीक्षाओं में असफल हो चुके हैं।

वांगचुक का मानना है कि जो बच्चा फेल हुआ है, वह अयोग्य नहीं है, बल्कि वह इस रटंत प्रणाली के अनुकूल नहीं है।

सेकमोल परिसर में शिक्षा का एक बिल्कुल अलग स्वरूप देखने को मिलता है

व्यावहारिक अधिगम
यहाँ कोई पारंपरिक ब्लैकबोर्ड कक्षाएं नहीं होतीं।

छात्र स्वयं सुबह उठकर गायों का दूध निकालते हैं, सौर ऊर्जा प्रणालियों का रखरखाव करते हैं और परिसर का प्रबंधन संभालते हैं।

छात्रों की अपनी सरकार
इस परिसर का संचालन पूरी तरह लोकतांत्रिक तरीके से छात्रों द्वारा चुनी गई एक ‘छात्र सरकार’ करती है। इसमें एक मुख्यमंत्री और विभिन्न विभागों के मंत्री होते हैं, जो परिसर की आंतरिक व्यवस्था, भोजन और अनुशासन की देखरेख करते हैं।

व्यावहारिक उद्यमिता
यहाँ छात्रों को थ्योरी रटाने के बजाय यह सिखाया जाता है कि कैसे सौर ऊर्जा से गर्म रहने वाले घर बनाए जाएं, कैसे शून्य बजट में जैविक खेती की जाए और कैसे स्थानीय संसाधनों से रोजगार सृजित किया जाए।

  1. ‘ऑपरेशन न्यू होप’ सरकारी तंत्र और जन-भागीदारी का ऐतिहासिक समन्वय

एक शिक्षा अधिकारी और शिक्षक के दृष्टिकोण से सोनम वांगचुक का सबसे महान और प्रासंगिक कार्य ‘ऑपरेशन न्यू होप’ है।

वर्ष 1994 में शुरू किया गया यह अभियान इस बात का अनुपम उदाहरण है कि बिना किसी टकराव के, प्रशासनिक सहयोग और जन-भागीदारी के माध्यम से कैसे एक पूरी व्यवस्था को बदला जा सकता है।

वांगचुक जानते थे कि केवल एक वैकल्पिक स्कूल चलाने से पूरे लद्दाख का भला नहीं होगा; इसके लिए सरकारी स्कूलों की दशा और दिशा बदलनी होगी।

उन्होंने तात्कालिक सरकार, शिक्षा विभाग, स्थानीय ग्राम समुदायों और गैर-सरकारी संगठनों को एक मंच पर लाने का अभूतपूर्व प्रयास किया।

रणनीति और क्रियान्वयन
पाठ्यक्रम का स्थानीयकरण
वांगचुक और उनकी टीम ने शिक्षा विभाग के सहयोग से लद्दाख के बच्चों के लिए स्थानीय भाषा और उनके परिवेश के अनुकूल प्राथमिक पाठ्यपुस्तकें तैयार कीं।

शिक्षकों का सघन प्रशिक्षण
उन्होंने शिक्षकों को पारंपरिक दंडात्मक और रटंत प्रणाली से मुक्त कर गतिविधि-आधारित शिक्षण और बाल-केंद्रित शिक्षा का विशेष प्रशिक्षण दिया।

ग्राम शिक्षा समितियों (VECs) का गठन

प्रत्येक सरकारी स्कूल की निगरानी और सहयोग के लिए ग्रामीणों की एक समिति बनाई गई।

इससे स्कूलों के प्रति समाज की जवाबदेही और अपनत्व की भावना जाग्रत हुई।

क्रांतिकारी परिणाम
इस त्रिकोणीय समन्वय
(सरकार + समाज + नवाचार)
का परिणाम चमत्कारी रहा।

वर्ष 1996 में लद्दाख का मैट्रिक (10वीं) का उत्तीर्ण प्रतिशत जो महज 5% था, वह वर्ष 2005 तक बढ़कर 50% से अधिक हो गया और अगले दशक में यह आंकड़ा 75% से 80% तक पहुंच गया।

यह ऐतिहासिक सफलता सिद्ध करती है कि जब प्रशासनिक तंत्र को समाज का रचनात्मक सहयोग मिलता है, तो सरकारी विद्यालयों की कायापलट होना निश्चित है।

  1. वैज्ञानिक नवाचार, ‘आइस स्तूप’ (कृत्रिम हिमनद) का आविष्कार
    लद्दाख एक ‘शीत मरुस्थल’ है। यहाँ सालाना वर्षा न के बराबर होती है और जीवन पूरी तरह ग्लेशियरों से पिघलने वाले पानी पर निर्भर है।

जलवायु परिवर्तन के कारण
लद्दाख के प्राकृतिक ग्लेशियर बहुत तेजी से सिकुड़ रहे हैं।

इसके कारण लद्दाख के किसानों के सामने एक गंभीर संकट खड़ा हो गया। अप्रैल और मई के महीनों में, जब किसानों को मटर और जौ की फसलों की बुआई के लिए पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती थी, तब ठंड के कारण ऊंचे पहाड़ों पर ग्लेशियर पिघलते नहीं थे।

वहीं दूसरी ओर, जून-जुलाई में तेज गर्मी से ग्लेशियर पिघलते थे और पानी बहकर व्यर्थ चला जाता था।

विचार की उत्पत्ति
एक दिन सोनम वांगचुक लेह में एक पुल के नीचे से गुजर रहे थे।

उन्होंने देखा कि मई के महीने में भी उस पुल के नीचे, जो कि काफी कम ऊंचाई पर था, बर्फ का एक टुकड़ा पिघला नहीं था क्योंकि वह पुल की छाया में था।

वांगचुक के वैज्ञानिक दिमाग ने तुरंत इस बात को पकड़ लिया—यदि बर्फ को सीधी धूप से बचाया जा सके, तो उसे कम ऊंचाई पर भी लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

तकनीक और कार्यप्रणाली
वर्ष 2013-2014 में वांगचुक ने इस समस्या का एक बेहद सरल, सस्ता और प्रभावी समाधान खोजा, जिसे उन्होंने ‘आइस स्तूप’ नाम दिया।

यह पूरी तरह गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर काम करता है, जिसमें किसी बिजली या पंप की आवश्यकता नहीं होती

गुरुत्वाकर्षण बल का उपयोग
ऊंचे पहाड़ों पर स्थित पानी के स्रोत से पाइपलाइन के जरिए पानी को नीचे घाटी या गांव तक लाया जाता है। ऊंचाई के अंतर के कारण पानी में
प्राकृतिक दबाव बनता है।

फव्वारा प्रणाली
इस दबाव के कारण पानी एक खड़े पाइप से फव्वारे के रूप में हवा में छूटता है। सर्दियों की रातों में जब तापमान -20°C तक होता है, तो हवा में छूटी पानी की बूंदें तुरंत जम जाती हैं।

शंकुाकार संरचना
यह जमी हुई बर्फ धीरे-धीरे एक ऊंचे स्तूप या शंकु का आकार ले लेती है।

ज्यामिति के नियम के अनुसार, एक शंकु का सतह क्षेत्र उसके आयतन की तुलना में न्यूनतम होता है।

इसका मतलब है कि धूप के संपर्क में कम से कम बर्फ आती है, जिससे वह बहुत धीमी गति से पिघलती है।

सर्दियों में जो पानी बेकार बह जाता था, उसे इस स्तूप के रूप में जमा लिया जाता है।

मार्च-अप्रैल की भीषण गर्मी में जब पानी की कमी होती है, तो यह आइस स्तूप धीरे-धीरे पिघलना शुरू करता है और खेतों तक सिंचाई के लिए पानी पहुँचता है।

इस अद्भुत आविष्कार के लिए उन्हें वर्ष 2016 में प्रतिष्ठित ‘रोलेक्स अवार्ड्स फॉर एंटरप्राइज’ से सम्मानित किया गया।

  1. ईको-फ्रेंडली वास्तुकला, सौर तापित मिट्टी के घर
    लद्दाख की सर्दियां इतनी भीषण होती हैं कि तापमान -20°C से भी नीचे गिर जाता है।

पारंपरिक रूप से घरों को गर्म रखने के लिए टनों लकड़ी, कोयला या डीजल जलाया जाता है, जिससे न केवल पर्यावरण प्रदूषित होता है, बल्कि यह बेहद खर्चीला भी है।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग और मिट्टी की वास्तुकला के अपने ज्ञान का उपयोग करते हुए वांगचुक ने ‘पैसिव सोलर हीटेड मड हाउसेज’ की तकनीक विकसित की।

निर्माण सामग्री
ये घर पूरी तरह स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मिट्टी, भूसे, लकड़ी और पत्थरों से बनाए जाते हैं।

वैज्ञानिक सिद्धांत
इन घरों की दीवारों को दोहरा बनाया जाता है,जिसके बीच में हवा या इंसुलेशन सामग्री भरी होती है।

घर का मुख्य हिस्सा और बड़ी खिड़कियां पूरी तरह दक्षिण दिशा की ओर रखी जाती हैं, ताकि सर्दियों में दिनभर की धूप घर के भीतर प्रवेश कर सके।

परिणाम
दिन के समय दीवारें सूरज की गर्मी को सोख लेती हैं और रात के समय जब बाहर का तापमान -15°C होता है, तब ये दीवारें अंदर धीरे-धीरे गर्मी छोड़ती हैं, जिससे घर के अंदर का तापमान बिना किसी हीटर या अंगीठी के +15°C से +18°C तक बना रहता है।

भारतीय सेना के लिए योगदान
लद्दाख की सीमाओं पर तैनात भारतीय सेना के जवानों को कड़कड़ाती ठंड में जिन लोहे के कंटेनरों या तंबुओं में रहना पड़ता था, उन्हें गर्म रखने के लिए लाखों लीटर केरोसिन जलाना पड़ता था।

सोनम वांगचुक ने सेना के लिए विशेष ‘पोर्टेबल सोलर-हीटेड मिलिट्री टेंट्स’ डिजाइन किए।
के
ये टेंट पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल हैं, इन्हें आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है और ये शून्य कार्बन उत्सर्जन के साथ जवानों को अत्यधिक ठंड में सुरक्षित रखते हैं।

  1. व्यापक सामाजिक प्रभाव और ‘थ्री इडियट्स’
    आम जनमानस में सोनम वांगचुक की पहचान तब और व्यापक हो गई जब वर्ष 2009 में बॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म ‘3 इडियट्स’ आई।

इस फिल्म में अभिनेता आमिर खान द्वारा निभाया गया ‘फुंसुख वांगडू’ का मुख्य किरदार काफी हद तक सोनम वांगचुक के वास्तविक जीवन, उनकी विचारधारा और उनके आविष्कारों से प्रेरित था।

फिल्म का प्रसिद्ध संवाद—”कामयाबी के पीछे मत भागो, काबिल बनो, कामयाबी झक मारकर पीछे आएगी”—वास्तव में वांगचुक के जीवन दर्शन को ही दर्शाता है।

इस फिल्म ने देश के करोड़ों युवाओं को सोचने पर मजबूर किया कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य डिग्रियों का संग्रह करना नहीं, बल्कि समाज की समस्याओं को हल करना है।

  1. सम्मान और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार
    सोनम वांगचुक के नि:स्वार्थ, मौलिक और युगांतरकारी कार्यों को वैश्विक स्तर पर मान्यता मिली है।
    उन्हें प्राप्त कुछ प्रमुख सम्मान इस प्रकार हैं

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार (2018)
इसे ‘एशिया का नोबेल पुरस्कार’ कहा जाता है। शिक्षा और सामुदायिक विकास में अभूतपूर्व योगदान हेतु उन्हें इससे नवाजा गया।

रोलेक्स अवार्ड्स फॉर एंटरप्राइज (2016)

‘आइस स्तूप’ के अद्वितीय आविष्कार और जल प्रबंधन हेतु वैश्विक सम्मान।

ग्लोबल अवार्ड फॉर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर (2017)
पर्यावरण-अनुकूल भवनों के निर्माण के लिए।

मानद डी.लिट (D.Litt. – 2021)
सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी द्वारा उनके शैक्षणिक कार्यों के सम्मान में।

  1. शिक्षाविदों और समाज के लिए प्रेरणादायी संदेश
    सोनम वांगचुक की समग्र यात्रा से हमारे शिक्षक समुदाय, प्रशासनिक अधिकारियों और नीति-निर्माताओं को अत्यंत महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं

समस्या ही समाधान की जननी है
वांगचुक ने लद्दाख के भूगोल या संसाधनों की कमी पर कभी विलाप नहीं किया।

उन्होंने शून्य संसाधनों के बीच से ‘आइस स्तूप’ और ‘सोलर मड हाउस’ जैसे व्यावहारिक समाधान निकाले।

सहयोग से ही सुधार संभव है
‘ऑपरेशन न्यू होप’ यह सिखाता है कि व्यवस्था से टकराने के बजाय यदि सरकारी मशीनरी, स्थानीय समुदाय और विशेषज्ञों को एक सकारात्मक उद्देश्य के लिए जोड़ा जाए, तो किसी भी सरकारी स्कूल का स्तर विश्वस्तरीय बनाया जा सकता है।

कौशल-आधारित शिक्षा की आवश्यकता

हमारी वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति भी आज उसी ‘व्यावहारिक और कौशल-आधारित शिक्षा’ की बात कर रही है, जिसे सोनम वांगचुक दशकों पूर्व धरातल पर उतार चुके थे।

उपसंहार
सोनम वांगचुक आधुनिक भारत के एक ऐसे युगपुरुष हैं, जिन्होंने विज्ञान को प्रयोगशालाओं से बाहर निकालकर खेतों, खलिहानों और आम आदमी के जीवन तक पहुँचाया है।

उनका जीवन हमें सिखाता है कि कर्तव्यपरायणता केवल सिद्धांतों में नहीं, बल्कि अपने समाज की समस्याओं को पूरी ईमानदारी से हल करने में है।

वे देश के हर उस शिक्षक, अधिकारी और नागरिक के लिए प्रेरणापुंज हैं जो व्यवस्था के भीतर रहकर सकारात्मक और रचनात्मक बदलाव लाना चाहते हैं।

आइए, हम सब भी उनके जीवन से प्रेरणा लें; अपनी सोच को मौलिक बनाएं, अपने परिवेश के प्रति संवेदनशील हों और अपने-अपने कार्यक्षेत्र में नवाचार और निष्पक्षता के साथ राष्ट्र के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दें।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर, राजस्थान
94622-60179

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