लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति): सोहन लाल सिंगारिया
- मुख्य संदर्भ और वैचारिक भूमिका
इस विस्तृत आलेख का मुख्य संदर्भ उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के बदौसा थाने के भीतर घटित वह अत्यंत वीभत्स, अमानवीय और कानून व्यवस्था को तार-तार करने वाली घटना है, जिसने आधुनिक भारतीय समाज की चेतना को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है।
एक 19 वर्षीय बालिग युवती (शिवानी) द्वारा अपनी स्वतंत्र चेतना और संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए एक 20 वर्षीय दलित युवक (ललित वर्मा) से कानूनी और पारंपरिक विवाह करने की परिणति ‘ऑनर किलिंग’ (सम्मान के नाम पर हत्या) के रूप में हुई।
सबसे क्रूर सत्य यह है कि यह हत्या किसी सुनसान चौराहे या अंधेरी गली में नहीं, बल्कि राज्य के विधिक और प्रशासनिक संरक्षण के सबसे बड़े प्रतीक—एक पुलिस थाने के भीतर—साक्षात् पुलिस अधिकारियों की भौतिक उपस्थिति में की गई।
यह आलेख इस विशिष्ट घटना को एक सामाजिक रोग सूचक (Symptom) मानते हुए भारत में व्याप्त जन्म-आधारित वर्ण व जाति व्यवस्था, पितृसत्तात्मक सामंती मानसिकता, प्रशासनिक तंत्र की आंतरिक जातिवादी सड़ांध और देश की विधिक व न्यायिक व्यवस्था की कथनी और करनी के बीच की गहरी खाई का एक अत्यंत परिष्कृत, तार्किक और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
इसका मूल उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग—चाहे वह शोषित-वंचित (SC, ST, OBC व अल्पसंख्यक) बहुजन समाज हो या सामान्य श्रेणी के प्रबुद्ध नागरिक—सभी के सामूहिक विवेक को जगाना और एक समतामूलक, जातिविहीन समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करना है।
- बांदा की विभीषिका आधुनिकता के मुखौटे पर मध्यकालीन सामंती प्रहार
जब हम डिजिटल इंडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक मंचों पर ‘लोकतंत्र की जननी’ होने का दंभ भरते हैं, ठीक उसी समय बांदा की यह घटना हमारे इस तथाकथित आधुनिक मुखौटे को क्रूरता से नोच फेंकती है।
सन्दर्भ
न्यूज़ 24 की विस्तृत और प्रामाणिक रिपोर्ट के अनुसार, शिवानी और ललित के बीच पिछले 4 वर्षों से प्रेम संबंध था।
दोनों पूरी तरह बालिग थे, कानून की नजर में समझदार थे, और भारत के संप्रभु नागरिक थे।
उन्होंने उप-पंजीयक (रजिस्ट्रार) कार्यालय में अपनी शादी का कानूनी पंजीकरण भी करा लिया था।
परंतु, इस देश की सदियों पुरानी मानसिक रुग्णता देखिए कि युवक का केवल ‘दलित’ होना उस लड़की के पिता के झूठे सामाजिक अहंकार और खोखली प्रतिष्ठा को स्वीकार नहीं हुआ।
जब मध्य प्रदेश से बरामदगी के बाद दोनों को बदौसा थाने लाया गया और काउंसलिंग के नाम पर उन्हें परिजनों के साथ एक कक्ष में भेजा गया, तो पिता सत्यकुमार ने अपनी ही उंगली पकड़कर चलना सीखने वाली 19 वर्षीय बेटी पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर उसे पुलिस अधिकारियों के सामने ही लहूलुहान कर मार डाला।
यह जघन्य कृत्य केवल एक नवविवाहिता की भौतिक हत्या नहीं है।
यह साक्षात् हत्या है भारत के विधिक तंत्र की, देश के पुलिस प्रशासन के इकबाल की, और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रचित भारत के संविधान के सबसे पवित्र हिस्से यानी भाग-3 के अंतर्गत आने वाले अनुpच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) की।
जब इस देश में दो बालिग नागरिकों की वैधानिक स्वतंत्रता और उनका नजीवन पुलिस के पहरे में, सरकारी कैमरों और संगीनों के साए में भी सुरक्षित नहीं है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारा सामाजिक ढांचा आज भी मध्यकालीन कबीलाई क्रूरता के दौर में जी रहा है, जहाँ प्रेम करना एक ऐसा अक्षम्य अपराध है जिसकी सजा केवल और केवल मृत्यु है।
- संवैधानिक और कानूनी विरोधाभास एक राष्ट्र, दो विपरीत धरातल
भारतीय राज्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह एक साथ दो समानांतर और विपरीत धरातलों पर जीवन जीती है।
एक तरफ भारत का संविधान और देश की सर्वोच्च अदालत अंतर्जातीय विवाह को राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता का मुख्य सूत्र मानती है।
केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें (जैसे राजस्थान की ‘डॉ. सविता बेन अंबेडकर अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन योजना’)
अंतर्जातीय विवाह करने वाले जोड़ों को सामाजिक समरसता के संवर्धन के लिए ₹5,00,000 से लेकर ₹10,00,000 तक की वित्तीय सहायता और पारितोषिक प्रदान करती हैं।
इन नीतियों का मूल दर्शन यही है कि रोटी और बेटी के संबंधों के माध्यम से समाज से जातिगत दूरियां मिटें और एक समतामूलक, वर्गहीन व जातिविहीन समाज का उदय हो।
परंतु जब हम इस विधिक व्यवस्था को जमीनी धरातल पर क्रियान्वित होते देखते हैं, तो हकीकत इसके बिल्कुल उलट और भयावह नजर आती है।
सरकारें योजनाएं तो बनाती हैं, कागजों पर बड़े-बड़े बजट आवंटित किए जाते हैं, लेकिन उन युवाओं को धरातल पर जो सामाजिक तिरस्कार, आर्थिक बहिष्कार, मानसिक उत्पीड़न और अंततः ‘ऑनर किलिंग’ का शिकार होना पड़ता है, उसकी रोकथाम के लिए हमारे पास कोई संवेदनशील और तत्पर सुरक्षा ढांचा उपलब्ध नहीं है।
प्रोत्साहन राशि की फाइलें बाबूशाही और लालफीताशाही के दफ्तरों में धूल फांकती रहती हैं, जबकि दूसरी तरफ समाज के स्वयंभू ठेकेदार, जातिवादी संगठन और अंधता के शिकार क्रूर परिजन उन युवाओं के खून के प्यासे हो जाते हैं।
हाल ही के वर्षों में भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक और प्रगतिशील निर्णयों के माध्यम से यह बार-बार स्पष्ट किया है कि कोई भी बालिग महिला या पुरुष बिना शादी किए भी अपनी पूर्ण स्वेच्छा से ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (Live-in Relationship) में रहने के लिए स्वतंत्र हैं।
देश की सर्वोच्च अदालत ने यह स्पष्ट माना है कि दो बालिगों को अपना जीवनसाथी चुनने और अपनी देह व जीवन पर संप्रभु निर्णय लेने का पूरा अधिकार है, और इसमें माता-पिता, समाज या तथाकथित खाप पंचायतें किसी भी प्रकार का बलपूर्वक हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।
इतना ही नहीं, एक अन्य अत्यंत संवेदनशील और दूरगामी फैसले में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यहाँ तक प्रतिपादित किया है, कि कोई भी{बालिग लड़की, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित, अपनी मर्जी से वेश्यावृत्ति (Sex Work) का पेशा अपनाने के लिए स्वतंत्र है।
न्यायालय ने पुलिस प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे किसी भी सेक्स वर्कर को इस आधार पर प्रताड़ित या गिरफ्तार नहीं कर सकते क्योंकि अपनी मर्जी से देह का व्यापार करना उनका व्यक्तिगत विधिक अधिकार है (यदि उसमें कोई जबरदस्ती या तस्करी शामिल न हो)।
अब यहाँ एक बहुत ही गंभीर, तीखा और तार्किक सामाजिक प्रश्न खड़ा होता है: क्या कोई भी बालिग स्त्री या पुरुष किसी के साथ शारीरिक या यौन संबंध स्थापित करने से पूर्व उसकी जाति, वर्ण, गोत्र या कुल पूछता है? निश्चित रूप से नहीं!
जब देह के व्यापार, लिव-इन रिलेशनशिप और अनौपचारिक संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों में हमारा कानून और देश की सर्वोच्च अदालत इतनी उदारता, स्वतंत्रता और विधिक संरक्षण प्रदान करती है, तो फिर जब देश के दो जिम्मेदार, पढ़े-लिखे बालिग नागरिक भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत अपनी पूर्ण स्वेच्छा से, एक पवित्र, कानूनी और सामाजिक बंधन में बंधकर अंतर्जातीय विवाह करते हैं, तो तथाकथित समाज और रूढ़िवादी परिवारों पर ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ता है?
वे पुलिस के साए में भी अपनों के ही खून से हाथ रंगने को आतुर क्यों हो जाते हैं?
जब लिव-इन रिलेशनशिप पर न्यायालय इतनी सुरक्षात्मक दृष्टि रख सकता है, तो अंतर्जातीय विवाह करने वाले दंपतियों की सुरक्षा के लिए एक देशव्यापी, कड़ा, गैर-जमानती और अचूक विशेष कानून या दिशा-निर्देश क्यों लागू नहीं किया जाता?
क्यों सरकारें इन निर्दोष और प्रेम करने वाले जोड़ों को उनके हाल पर, भेड़ियों के समान सामाजिक तत्वों के सामने मरने के लिए छोड़ देती हैं?
यह विधिक तंत्र की कथनी और करनी के बीच की वह खाई है, जिसे पाटे बिना हम एक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना नहीं कर सकते।
- शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018) सर्वोच्च न्यायालय के अचूक और कड़े दिशा-निर्देश
जब कार्यपालिका और विधायिका समाज की रूढ़ियों के सामने मूकदर्शक बन जाती हैं, तब न्यायपालिका को आगे आकर समाज का मार्गदर्शन करना पड़ता है। ‘ऑनर किलिंग’ और अंतर्जातीय जोड़ों पर होने वाले अत्याचारों के संदर्भ में देश के सर्वोच्च न्यायालय का शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ और अन्य (2018) का निर्णय एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।
इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘ऑनर किलिंग’ को क्रूरता का निकृष्टतम रूप मानते हुए केंद्र और राज्य सरकारों के लिए त्रिस्तरीय सुरक्षा चक्र—निवारक (Preventive), उपचारात्मक (Remedial) और दंडात्मक (Punitive) उपायों की एक विस्तृत और अनिवार्य गाइडलाइन जारी की थी।
सुप्रीम कोर्ट के उन ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का विस्तृत और बिंदुवार विश्लेषण निम्न प्रकार है
A. निवारक उपाय (Preventive Measures) – अपराध होने से रोकना
खाप पंचायतों पर नजर
राज्य सरकारों को उन जिलों और क्षेत्रों की पहचान करने का निर्देश दिया गया जहाँ खाप पंचायतें सक्रिय हैं या जहाँ पिछले 5 वर्षों में अंतर्जातीय या अंतर्धार्मिक विवाहों के कारण हिंसा या सामाजिक बहिष्कार की घटनाएं हुई हैं।
धारा 144 का प्रयोग
यदि पुलिस या जिला प्रशासन को भनक भी लगती है कि कोई खाप पंचायत या जातिगत संगठन किसी अंतर्जातीय जोड़े के विवाह के विरोध में कोई बैठक या पंचायत बुलाने जा रहा है, तो संबंधित क्षेत्र के सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (SDM) या पुलिस उपाधीक्षक (DSP) को तुरंत धारा 144 लागू करके ऐसी बैठकों को प्रतिबंधित करना होगा।
संवेदीकरण (Sensitization)
गृह मंत्रालयों के माध्यम से पुलिस अधिकारियों को लगातार यह प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वे अंतर्जातीय विवाह करने वाले जोड़ों को प्रताड़ित न करें, बल्कि उन्हें सुरक्षा प्रदान करें।
B. उपचारात्मक उपाय (Remedial Measures) – संकट के समय सहायता
सुरक्षित गृह (Safe Houses) की स्थापना
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रत्येक जिले के मुख्यालय पर राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित ‘सेफ हाउसेस’ की स्थापना की जाए।
जब भी कोई अंतर्जातीय जोड़ा सुरक्षा की मांग करे, उसे तुरंत बिना किसी शुल्क के इन सेफ हाउसेस में रखा जाए, जहाँ उनकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस की होगी।
स्पेशल सेल (Special Cells) का गठन
प्रत्येक जिले में एक विशेष सेल का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें जिला पुलिस अधीक्षक (SP), जिला समाज कल्याण अधिकारी और एक विधिक विशेषज्ञ शामिल हों।
यह सेल संकट में फंसे जोड़ों की शिकायतों को सुनने के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहेगी।
त्वरित हेल्पलाइन
राज्यों को एक 24 घंटे चालू रहने वाली टोल-फ्री हेल्पलाइन सेवा शुरू करनी होगी, जिसके माध्यम से पीड़ित दंपति तुरंत पुलिस सहायता प्राप्त कर सकें।
C. दंडात्मक उपाय (Punitive Measures) – अपराधियों और लापरवाहों को दण्ड
लापरवाह अधिकारियों पर त्वरित कार्रवाई
यदि कोई पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक अधिकारी किसी अंतर्जातीय जोड़े द्वारा सुरक्षा मांगे जाने पर लापरवाही बरतता है, या खाप पंचायत की बैठक को रोकने में असफल रहता है, तो इसे उसकी ‘जानबूझकर की गई कोताही’ (Misfeasance) माना जाएगा।
ऐसे अधिकारी के खिलाफ तुरंत विभागीय जांच शुरू की जाएगी और उसे सेवा से निलंबित या बर्खास्त किया जा सकता है।
फास्ट ट्रैक कोर्ट
सम्मान के नाम पर की जाने वाली हिंसा या ‘ऑनर किलिंग’ से जुड़े सभी मुकदमों की सुनवाई विशेष रूप से गठित फास्ट ट्रैक अदालतों में होनी चाहिए।
इन मामलों का ट्रायल दैनिक आधार पर होना चाहिए और मुकदमा दर्ज होने के अधिकतम 6 महीने के भीतर फैसला सुनाया जाना अनिवार्य है।
यदि बांदा जिले के बदौसा थाने के पुलिसकर्मियों और अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय के इस ‘शक्ति वाहिनी’ निर्णय की गाइडलाइंस का अक्षरसः पालन किया होता,
शिवानी के पिता की उचित सुरक्षा चेकिंग की होती,
और काउंसलिंग के नाम पर उन्हें अकेले कमरे में भेजने के बजाय सुरक्षा घेरे में रखा होता,
तो आज शिवानी जीवित होती।
यह घटना स्पष्ट रूप से सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना (Contempt of Court) और प्रशासनिक विफलता का साक्षात प्रमाण है।
- जाति व्यवस्था के उन्मूलन पर बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के ऐतिहासिक विचारों का विश्लेषण
जब हम भारत में जातिवाद और ‘ऑनर किलिंग’ के मूल कारणों की पड़ताल करते हैं, तो हमें भारत के महानतम समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री और विधिक मनीषी बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के कालजयी विचारों की शरण में जाना होगा।
बाबा साहब ने अपनी विश्वप्रसिद्ध और ऐतिहासिक कृति ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ जाति प्रथा का उच्छेद, 1936)
में इस बात का अत्यंत वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण किया है कि भारत से जातिवाद को केवल सतही सुधारों से खत्म नहीं किया जा सकता।
इसके लिए सामाजिक संरचना की जड़ों पर प्रहार करना होगा
A. अंतर्जातीय विवाह
जाति तोड़ने का वास्तविक और एकमात्र उपाय
बाबा साहब का दृढ़ मत था कि महात्मा गांधी या अन्य सुधारकों द्वारा सुझाए गए उपाय, जैसे—सह-भोज (विभिन्न जातियों का साथ बैठकर भोजन करना), जातिवाद को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
उन्होंने लिखा था:
“जातिवाद को नष्ट करने का वास्तविक उपाय अंतर्जातीय विवाह है।
रक्त का संलयन (Fusion of blood)
ही एकमात्र ऐसा साधन है जिससे अपनेपन और भाईचारे की वह भावना पैदा हो सकती है, जो जातिवाद को समाप्त करने के लिए आवश्यक है
जब तक समाज में अंतरजातीय विवाह एक आम बात नहीं बन जाती, तब तक जाति की भावना को समूल नष्ट नहीं किया जा सकता।
बाबा साहब के अनुसार, जाति व्यवस्था वास्तव में कोई भौतिक दीवार नहीं है जिसे डायनामाइट लगाकर उड़ाया जा सके।
यह एक ‘मानसिक अवस्था’ है,
एक दैवीय धारणा है जो धार्मिक विश्वासों पर टिकी हुई है।
इसलिए, जब दो अलग-अलग जातियों के लोग विवाह के बंधन में बंधते हैं, तो वे न केवल दो परिवारों को जोड़ते हैं, बल्कि वे उस शुद्धता और अपवित्रता (Purity and Pollution) के उस मिथक को भी तोड़ देते हैं जिसके बल पर जाति व्यवस्था जीवित रहती है।
यही कारण है कि रूढ़िवादी और सामंती ताकतें अंतर्जातीय विवाहों से सबसे ज्यादा डरती हैं और हिंसक हो उठती हैं, क्योंकि ये विवाह सीधे तौर पर उनके सदियों पुराने वर्चस्व को चुनौती देते हैं।
B. ‘श्रम का विभाजन’ नहीं, बल्कि ‘श्रमिकों का विभाजन’
अक्सर जातिवाद के समर्थक इसके पीछे यह तर्क देते हैं कि यह तो केवल ‘श्रम का विभाजन’ है, जो समाज के सुचारू संचालन के लिए आवश्यक है।
बाबा साहब ने इस तर्क की धंज्जियां उड़ाते हुए कहा था कि जाति व्यवस्था केवल श्रम का विभाजन नहीं करती, बल्कि यह ‘श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन’ करती है।
यह एक श्रमिक को दूसरे श्रमिक से नीचा और श्रेष्ठ मानती है, और मनुष्य की व्यक्तिगत रुचि, क्षमता और प्रतिभा को नजरअंदाज कर उसे उसके जन्म के आधार पर एक निश्चित पेशे से बांध देती है।
जब कोई युवा इस थोपे गए विभाजन को तोड़कर अपनी पसंद से किसी अन्य जाति के व्यक्ति से प्रेम या विवाह करता है, तो वह वास्तव में इस अमानवीय सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह कर रहा होता है।
C. शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों की वैचारिक समीक्षा
बाबा साहब ने ‘एनीहिलेशन ऑफ कास्ट’ में इस बात पर विशेष बल दिया था कि लोग जातिवाद का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि वे इसे अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं।
उनके अनुसार, जब तक उन शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणों की प्रामाणिकता और उनके अमानवीय उपदेशों को बौद्धिक रूप से खारिज नहीं किया जाएगा जो ऊंच-नीच, असमानता और जातिगत श्रेष्ठता का उपदेश देते हैं, तब तक आम आदमी के दिमाग से जातिवाद का भूत नहीं उतरेगा।
उन्होंने समाज को ‘शास्त्रों के शासन’ से मुक्त होकर ‘तर्क और विज्ञान के शासन’ की ओर बढ़ने का आह्वान किया था।
- अदृश्य पहलू और अनकहे सच
जिन्हें मुख्यधारा का विमर्श दबा देता है
‘ऑनर किलिंग’ और अंतर्जातीय विवाहों के संदर्भ में कई ऐसे कड़वे सच और सामाजिक पहलू हैं,
जिन पर अक्सर देश की मुख्यधारा
की मीडिया,
अकादमिक जगत
और नीति-निर्माता
बात करने से कतराते हैं।
इन अनकहे तत्वों का विश्लेषण करना इस लेख की पूर्णता के लिए अत्यंत आवश्यक है
A. पितृसत्ता और जातिवाद का आत्मघाती गठबंधन
‘ऑनर के नाम पर हत्या’ को केवल जातिगत नफरत के चश्मे से नहीं देखा जा सकता;
यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का भी सबसे वीभत्स चेहरा है।
इस सामंती मानसिकता में महिला को स्वतंत्र मनुष्य नहीं, बल्कि परिवार और जाति की ‘संपत्ति’ तथा ‘इज्जत का प्रतीक’ माना जाता है।
एक पुरुष की ‘इज्जत’ महिला की पसंद और उसके आचरण पर निर्भर कर दी जाती है।
जब कोई लड़की किसी अन्य जाति (विशेषकर अपने से नीची मानी जाने वाली जाति) के लड़के को चुनती है,
तो पुरुष प्रधान समाज को लगता है कि उसकी ‘संपत्ति’ और उसकी ‘सत्ता’ पर से… नियंत्रण खत्म हो गया है।
बांदा की घटना में,
पिता सत्य कुमार ने अपनी बेटी को यह समझाने का प्रयास किया कि “इस शादी से समाज में मेरी बदनामी हो रही है, तुम ललित को तलाक दे दो।
जब बेटी ने अपनी संप्रभुता की घोषणा की कि “ललित ही मेरा पति है, उसी के साथ मेरा जीना-मरना है,” तो पिता का सामंती अहंकार तड़प उठा।
उसने अपनी ही बेटी को मारना स्वीकार किया, लेकिन एक दलित युवक के सामने अपने झूठे अहंकार को झुकना स्वीकार नहीं किया।
B. हाईपरगैमी और हाइपोगैमी का सामाजिक मनोविज्ञान
भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही
अनुलोम विवाह
(उच्च जाति के पुरुष का निम्न जाति की महिला से विवाह)
को किसी तरह बर्दाश्त कर लिया जाता रहा है, क्योंकि इससे पुरुष का वर्चस्व बना रहता है।
लेकिन
प्रतिलोम विवाह
(उच्च जाति की महिला का निम्न जाति के पुरुष से विवाह)
को समाज सबसे बड़ा पाप और अपराध मानता है।
बांदा की घटना
प्रतिलोम विवाह
का ही उदाहरण थी,
जहाँ एक गैर-दलित लड़की ने एक दलित लड़के को अपना जीवनसाथी चुना था।
यह उच्च जाति के झूठे दंभ पर सीधे चोट थी, जिसके कारण समाज और परिवार हिंसक हो उठे।
C. पुलिस और प्रशासनिक तंत्र का आंतरिक जातिवाद
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि पुलिस थानों में बैठे लोग केवल कानून के रक्षक हैं और वे निष्पक्ष होते हैं।
लेकिन सच यह है कि खाकी वर्दी के भीतर भी वही समाज रहता है जो जातिवाद के जहर से प्रदूषित है।
कई मामलों में देखा गया है कि जब कोई अंतर्जातीय जोड़ा सुरक्षा के लिए थाने पहुंचता है, तो पुलिसकर्मी स्वयं अपनी जातिगत प्राथमिकताओं के आधार पर लड़की के माता-पिता को गुप्त सूचना दे देते हैं, या जोड़े को डरा-धमकाकर वापस भेजने का प्रयास करते हैं।
बांदा थाने के भीतर हत्यारे पिता का चाकू लेकर बेखौफ घुस जाना
और पुलिस का तमाशबीन बने रहना,
इसी प्रशासनिक सड़ांध और आंतरिक जातिवादी सहानुभूति की ओर इशारा करता है।
- वैश्विक परिदृश्य और विदेशों से सीख
एक विहंगम वैचारिक विश्लेषण
विश्व के विभिन्न देशों में ऐतिहासिक रूप से नस्लीय,
सांस्कृतिक और
सामाजिक हिंसा से निपटने के लिए
विशिष्ट कानूनी ढांचे और प्रशासनिक प्रणालियाँ तैयार की गई हैं।
भारत में जातिवाद और ‘ऑनर किलिंग’ की समस्या को समूल नष्ट करने के लिए इन अंतर्राष्ट्रीय मॉडलों का अध्ययन और समावेशन अत्यंत प्रासंगिक है।
A. यूनाइटेड किंगडम (UK) का मॉडल
समस्या का स्वरूप
यहाँ प्रवासियों और कुछ रूढ़िवादी समुदायों में सांस्कृतिक हिंसा और जबरन विवाह (Forced Marriage) की चुनौतियाँ थीं।
वैधानिक नीति/मॉडल ब्रिटेन ने इसके लिए Assistance and Interventions Unit और Forced Marriage Unit (FMU) जैसी विशिष्ट पुलिस व प्रशासनिक विंग स्थापित की।
भारत के लिए सीख
भारत सरकार को भी अंतर-जाति और अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले दंपतियों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय स्तर पर 24 घंटे सक्रिय रहने वाले विशेष सुरक्षा बल की स्थापना करनी चाहिए।
B. संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) का मॉडल
समस्या का स्वरूप: अमेरिका लंबे समय तक नस्लीय भेदभाव (Racism) और नागरिक अधिकारों के हनन की गंभीर समस्याओं से जूझता रहा।
वैधानिक नीति/मॉडल
अमेरिका ने Civil Rights Act (1964) पारित किया और इसके साथ ही फेडरल हेट क्राइम
(नफरत जनित अपराध)
कानूनों को लागू किया।
भारत के लिए सीख
भारत में भी जातिगत श्रेष्ठता का दंभ भरने,
सामाजिक बहिष्कार करने
या अंतर्जातीय जोड़ों
को प्रताड़ित करने की घटनाओं को ‘हेट क्राइम’ की श्रेणी में शामिल कर सीधे गैर-जमानती धाराओं के तहत दण्डित किया जाना चाहिए।
C. यूरोपीय संघ (EU) का मॉडल
समस्या का स्वरूप
वर्गभेद,
सामाजिक अलगाव
और प्रवासियों में रूढ़िवादी कबीलाई न्याय की समानांतर व्यवस्था।
वैधानिक नीति/मॉडल
यूरोपीय संघ ने Victims’ Rights Directive
(पीड़ितों के अधिकारों का चार्टर)
लागू किया।
इसके अंतर्गत गवाहों और पीड़ितों के लिए पूर्ण विधिक, वित्तीय और आवासीय संरक्षण (Witness Protection) की गारंटी दी गई है।
भारत के लिए सीख:
भारत में ऑनर किलिंग के मामलों में मुख्य गवाहों (जैसे पीड़ित लड़का या लड़की के मित्र और सहयोगी) को राज्य द्वारा पूर्ण विधिक और आवासीय संरक्षण दिया जाना अनिवार्य किया जाए।
- समाधान का मार्ग सरकार और राज्य सरकारों के अनिवार्य प्रशासनिक कदम
बांदा जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए केवल कागजी कानून बनाना काफी नहीं है।
इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर एक समन्वित, बहु-आयामी और कठोर प्रशासनिक रणनीति लागू करनी होगी
A. जिला स्तर पर ‘फास्ट रिस्पांस फोर्स’ का गठन
प्रत्येक जिले के पुलिस अधीक्षक के सीधे नियंत्रण में एक ‘अंतर्जातीय दंपति सुरक्षा बल’ (Inter-caste Couples Protection Force) का गठन हो।
इस बल का काम केवल इन जोड़ों को चौबीसों घंटे सुरक्षा प्रदान करना और उनके रहने के लिए सुरक्षित स्थानों (Safe Houses) का प्रबंधन करना होना चाहिए।
B. जवाबदेही का सिद्धांत (Principle of Accountability) लागू हो
जिस प्रकार किसी क्षेत्र में सांप्रदायिक दंगा होने पर वहाँ के थाना प्रभारी (SHO) और जिला मजिस्ट्रेट की जवाबदेही तय की जाती है,
ठीक उसी प्रकार यदि किसी भी थाने के अधिकार क्षेत्र में या पुलिस की उपस्थिति में ‘ऑनर किलिंग’ या अंतर्जातीय जोड़े पर हमला होता है, तो संबंधित थाना प्रभारी को तुरंत प्रभाव से बर्खास्त (Dismissed from Service) किया जाए।
जिले के पुलिस अधीक्षक के खिलाफ अनिवार्य सेवा समीक्षा और दंडात्मक प्रविष्टि (Adverse Entry) दर्ज की जाए।
थानों के भीतर बिना सघन सुरक्षा चेकिंग और मेटल डिटेक्टर के किसी भी बाहरी व्यक्ति
(चाहे वह लड़की का पिता ही क्यों न हो)
के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध हो।
C. व्यापक सामाजिक-विधिक जागरूकता अभियान
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और राज्य के जनसंपर्क विभागों के माध्यम से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर होर्डिंग्स, विज्ञापनों और रेडियो/टीव्ही संदेशों के जरिए यह प्रचारित किया जाना चाहिए कि
बालिगों को विवाह की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है।
अंतर्जातीय विवाह करने वालों को प्रताड़ित करने वालों की संपत्ति कुर्क की जा सकती है और उन्हें आजीवन जेल हो सकती है।
सरकारों द्वारा दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि की प्रक्रिया को पूर्णत
ऑनलाइन,
पारदर्शी
और बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधे दंपती के बैंक खाते में स्थानांतरित (DBT) किया जाना चाहिए।
- बहुजन समाज के लिए चेतना, आत्मनिर्भरता और आवश्यक सावधानियां
भारत देश की मूल निवासी जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा, जो SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदायों
(सामूहिक रूप से बहुजन समाज)
से आता है, आज भी सामाजिक और वैधानिक रूप से सबसे अधिक असुरक्षित है।
बांदा की घटना में पीड़ित युवक दलित समाज से था।
बहुजन समाज के युवाओं, विचारकों और आम नागरिकों को इस सामंती व्यवस्था के खिलाफ अपनी लड़ाई को और अधिक वैज्ञानिक, कानूनी और सचेत बनाना होगा।
इसके लिए निम्नलिखित कदम और सावधानियां उठाना अत्यंत अपरिहार्य है
A. विधिक और संवैधानिक चेतना का प्रसार
बहुजन समाज के प्रत्येक घर में बाबा साहब डॉ. अंबेडकर की जीवनी और भारत के संविधान की एक प्रति होनी चाहिए।
युवाओं को यह स्पष्ट पता होना चाहिए कि कानून उनके साथ है।
यदि कोई स्थानीय पुलिस अधिकारी उनकी शिकायत दर्ज नहीं करता है,
तो वे सीधे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत सीधे मजिस्ट्रेट के पास जा सकते हैं,
या राष्ट्रीय अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग (NCSC/NCST) और
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
B. संकटकालीन परिस्थितियों के लिए व्यावहारिक और कड़े सुरक्षा उपाय
यदि बहुजन समाज का कोई युवा अंतर्जातीय विवाह करता है, तो उसे भावुकता और अति-आत्मविश्वास से बचते हुए निम्नलिखित कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करना चाहिए
सीधे थानों में जाने से बचें
विवाह करने के तुरंत बाद कभी भी सीधे स्थानीय थाने या लड़की के गांव/घर के पास न जाएं।
सबसे पहले किसी सुरक्षित, अनजान और बड़े शहर में जाएं और वहाँ के उच्च न्यायालय (High Court) में अपने वकीलों के माध्यम से ‘जान-माल की सुरक्षा’ (Protection of Life and Liberty) की रिट याचिका दायर करें।
जब तक हाई कोर्ट का सुरक्षा आदेश प्राप्त न हो जाए, तब तक किसी भी पुलिसकर्मी या परिजन के सामने प्रकट न हों।
डिजिटल दस्तावेजीकरण
(Digital Documentation)
विवाह के सभी प्रामाणिक दस्तावेज,
रजिस्ट्रार का प्रमाण पत्र,
दोनों के आयु प्रमाण पत्र
(10वीं की मार्कशीट या जन्म प्रमाण पत्र)
और विवाह की स्पष्ट तस्वीरें
Google Drive,
DigiLocker
और अपने कम से कम 5 विश्वसनीय मित्रों के पास डिजिटल रूप में सुरक्षित रखें।
विवाह से पूर्व और विवाह के बाद दोनों अपनी मर्जी की बात कहते हुए एक छोटा सा वीडियो रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया
और जिला कलेक्टर/SP की आधिकारिक ईमेल आईडी पर भेज दें,
ताकि कोई उनके खिलाफ ‘अपहरण’ का झूठा मुकदमा दर्ज न करा सके।
भावुकता का पूर्ण त्याग
इतिहास गवाह है कि
ऑनर किलिंग के 90% मामलों में
परिजनों ने पहले फोन पर रोकर, भावुक होकर माफी मांगने का नाटक किया और कहा कि “हम तुम्हारी शादी स्वीकार करते हैं, एक बार घर आ जाओ।
और जैसे ही जोड़ा घर पहुंचा, उनकी हत्या कर दी गई।
युवाओं को समझना होगा कि सदियों पुरानी जातिगत नफरत और झूठी प्रतिष्ठा की बीमारी दो दिनों के आंसुओं से ठीक नहीं होती।
जब तक विधिक रूप से सुरक्षा सुनिश्चित न हो, परिजनों की बातों में न आएं।
C. सामाजिक सुरक्षा तंत्र और आर्थिक स्वावलंबन का निर्माण
बहुजन समाज के प्रबुद्ध और सक्षम नागरिकों
(अधिकारियों, वकीलों, डॉक्टरों और व्यापारियों)
को आगे आकर प्रत्येक राज्य और जिले में ‘संवैधानिक विवाह सहायता केंद्र’ और ‘निजी सेफ हाउसेस’ का निर्माण करना चाहिए,
जहाँ ऐसे संकटग्रस्त जोड़ों को मुफ्त विधिक सहायता, भोजन और रहने का स्थान मिल सके।
युवाओं को विवाह करने से पहले आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने का प्रयास करना चाहिए।
जब युवा अपने पैरों पर खड़े होंगे, तो समाज के ठेकेदारों के आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार के हथियारों का उन पर कोई असर नहीं होगा।
- निष्कर्ष
सामूहिक विवेक की जागृति का अंतिम आह्वान
यह विस्तृत और वैचारिक लेख किसी राजनीतिक दल के विरोध,
तात्कालिक आक्रोश या किसी सामाजिक वर्ग की निंदा के लिए नहीं लिखा गया है।
यह लेख, लेखक द्वारा देश के हर उस
आम से आम और
खास से खास व्यक्ति
चाहे वह देश की संसद में बैठा नीति-निर्माता हो,
माननीय न्यायालय का माननीय न्यायाधीश हो,
जिले का प्रशासनिक अधिकारी हो,
या किसी सुदूर गांव का आम नागरिक हो
सभी के सोए हुए विवेक को झकझोरने,
जगाने
और उन्हें आईना दिखाने का एक पवित्र और अत्यंत प्रभावशाली विमर्श है।
हमें अपनी आंखें खोलकर यह कड़वा सच स्वीकार करना होगा कि जातिवाद का यह दानव किसी एक जाति या समुदाय का दुश्मन नहीं है
यह संपूर्ण मानवता का,
हमारे देश के लोकतंत्र का
और भारत की अखंडता का सबसे बड़ा शत्रु है।
बांदा के पुलिस थाने के भीतर लहूलुहान होकर दम तोड़ने वाली शिवानी की आखिरी चीखें और उसके शरीर से बहने वाला खून आज भारत माता के आंचल पर एक ऐसा गहरा दाग है, जिसे हम तब तक नहीं धो सकते जब तक कि हम जाति व्यवस्था की इस इमारत को ढहा नहीं देते।
यदि हम आज भी 21वीं सदी के इस दौर में,
विज्ञान और तकनीक के इस युग में,
सिर्फ जन्म की संकीर्णता के कारण
अपने ही बच्चों की जान लेने को ‘सम्मान’ (Honor) कहते हैं,
तो हमें खुद को मनुष्य कहने का भी कोई अधिकार नहीं है।
अब खोखले आश्वासनों,
कागजी घोषणाओं
और राजनीतिक रोटियां सेकने का समय समाप्त हो चुका है।
अब समय आ गया है कि देश की संसद ‘शक्ति वाहिनी’ के दिशानिर्देशों को एक अत्यंत कठोर, गैर-जमानती और राष्ट्रव्यापी केंद्रीय कानून का रूप दे, न्यायपालिका अपनी गाइडलाइंस का उल्लंघन करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजे, और हमारा समाज बाबा साहब डॉ. अंबेडकर के ‘जाति उन्मूलन’ के सपने को धरातल पर सच करने के लिए आगे आए।
आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करें जहाँ प्रेम करना अपराध न हो, जहाँ किसी बेटी का सुहाग उसकी जाति देखकर न उजाड़ा जाए, और जहाँ हमारा संविधान थानों के भीतर लहूलुहान होने के बजाय देश के हर नागरिक के जीवन और सम्मान की अचूक ढाल बनकर खड़ा रहे।
सामान्य अस्वीकरण
यह लेख विशुद्ध रूप से सामाजिक-आर्थिक, विधिक, शैक्षणिक और संवैधानिक जागरूकता के पावन एवं मानवीय उद्देश्य से संकलित और प्रस्तुत किया गया है।
इस लेख का मूल उद्देश्य किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग, सामाजिक वर्ग या व्यक्तिगत मान्यताओं की भावनाओं को आहत करना, ठेस पहुंचाना या समाज में वैमनस्य फैलाना कतई नहीं है।
इसका एकमात्र पवित्र ध्येय देश में घटित समसामयिक और प्रामाणिक सामाजिक घटनाओं
(जैसे बांदा, उत्तर प्रदेश की ऑनर किलिंग घटना)
के आलोक में भारतीय संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा,
कानून के शासन की सर्वोच्चता,
सामाजिक समरसता, आपसी भाईचारे और लैंगिक व सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना है।
लेख में प्रस्तुत किए गए समस्त विचार और विश्लेषण लोक-कल्याण,
मानवाधिकारों के संरक्षण,
विधिक सुधारों और राष्ट्र की प्रगति के प्रति पूर्णत और निष्पक्ष रूप से समर्पित हैं।

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर राजस्थान
