
कांड मामले में अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के बाद दलित समाज में गहरी निराशा और पीड़ा देखने को मिल रही है। अनेक सामाजिक संगठनों और लोगों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि यदि इस मामले में सभी आरोपी बरी हो गए, तो जिन लोगों की जान गई, उनकी हत्या आखिर किसने की?यह प्रश्न केवल एक मुकदमे का नहीं, बल्कि न्याय मिलने की उम्मीद, व्यवस्था पर भरोसे और पीड़ित परिवारों के दर्द से जुड़ा हुआ है। वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करने वाले परिवारों के लिए यह फैसला भावनात्मक रूप से अत्यंत कठिन माना जा रहा है।हालाँकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि न्यायालय अपने निर्णय उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों और कानून के आधार पर देता है। यदि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर पाता, तो अदालत कानून के अनुसार आरोपियों को बरी कर सकती है। इसका अर्थ यह नहीं होता कि घटना नहीं हुई, बल्कि यह कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध नहीं हो सका।फिर भी समाज के मन में उठ रहे सवालों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यदि गंभीर अपराध के बावजूद दोष सिद्ध नहीं हो पाया, तो यह जांच, साक्ष्य संग्रह, गवाहों की सुरक्षा और अभियोजन की प्रभावशीलता पर भी विचार करने का विषय है। ऐसी परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि संबंधित संस्थाएँ आत्ममंथन करें और भविष्य में न्याय प्रक्रिया को अधिक मजबूत बनाने के उपाय करें।लोकतंत्र में न्यायपालिका का सम्मान सर्वोपरि है, लेकिन न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी पक्ष को न्यायिक निर्णय पर असहमति है, तो कानून अपील सहित अन्य वैधानिक उपायों का अधिकार देता है।डांगावास कांड का यह फैसला केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की चुनौतियों पर गंभीर विमर्श का अवसर भी है। पीड़ित परिवारों की पीड़ा और समाज की भावनाओं को समझते हुए आवश्यक है कि न्याय की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रभावी बनी रहे, ताकि भविष्य में किसी भी पीड़ित को यह प्रश्न न पूछना पड़े—”यदि आरोपी बरी हैं, तो हत्याएँ किसने की?”

धर्मपाल चंदेल सम्पादक जागो हुक्मरान न्यूज नेटवर्क
