मैं बहुजन वंचित समाज के उस छोटे-से परिवार में पैदा हुआ था, जहाँ गरीबी तो थी, लेकिन सपनों की कोई कमी नहीं थी।”राजस्थान के पश्चिमी भाग में स्थित, लूणी नदी के अंचल से जुड़ा छोटा-सा शहर बिलाड़ा सटे एक छोटे गांव में, जहाँ जैन समाज की अच्छी-खासी आबादी है और जिसकी अपनी विशिष्ट पहचान है, वहीं मेरा जन्म हुआ। यही मेरी जन्मभूमि है।”

स्कूल और कॉलेज में मेरे अधिकांश सहपाठी जैन समाज तथा व्यवसायी वर्ग से थे। उनके साथ रहकर और उनके बारे में सुनते-सुनते मेरी समझ, मेरा व्यवहार और खान-पान भी काफी हद तक उनसे मेल खाने लगा था। मेरे पिता ने मेरा नाम भी उसी सांस्कृतिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए ऋषभ मेहता रखा था।

मेरे पिता सरकारी विद्यालय में अंग्रेज़ी के वरिष्ठ अध्यापक थे। वे अक्सर कहा करते थे-
“बेटा, समाज तुम्हारी जाति देखेगा, लेकिन तुम्हें अपनी योग्यता से उन्हें उत्तर देना है।”

मैं उनकी इकलौती संतान था। उन्होंने मुझे गाँव के सरकारी विद्यालय की बजाय अंग्रेज़ी माध्यम के विद्यालय में पढ़ाया। पिताजी अंग्रेज़ी की ट्यूशन भी पढ़ाते थे, इसलिए अन्य विषयों के शिक्षकों के माध्यम से भी मुझे जैन समाज के बच्चों के साथ मुफ्त में पढ़ने और घुलने-मिलने का अवसर मिला। कई लोगों ने ताना मारा—
“इतना खर्च किसलिए? आखिर जाना तो वहीं है, जहाँ उसकी जाति उसे ले जाएगी।”
लेकिन पिता केवल मुस्कुरा देते थे।

बचपन से ही पढ़ाई मेरा सबसे बड़ा साथी थी। कॉलेज तक मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जब भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी का समय आया तो पिता ने मेरे हाथ से आरक्षण वाले कॉलम पर टिक लगाने से रोक दिया। उन्होंने कहा,
“तुम्हें अपने अधिकार से शर्म नहीं करनी चाहिए, लेकिन इस व्यवस्था की मानसिकता को भी समझो। यदि सामान्य वर्ग से सफल हो जाओगे तो तुम्हारी योग्यता पर सवाल कम उठेंगे।”

मैंने सामान्य वर्ग से परीक्षा दी और अच्छे स्थान पर चयनित हो गया। मेरा उपनाम “मेहता” था, जिससे कोई मेरी जाति का अनुमान नहीं लगा सकता था।

देहरादून की प्रशिक्षण अकादमी में पहली बार मुझे लगा कि शायद नया भारत सचमुच बदल रहा है। वहीं मेरी मुलाकात निधि से हुई। वह जैन परिवार से थी और इंदौर मध्य प्रदेश की रहने वाली थी वह—तेज़-तर्रार, आत्मविश्वासी और आधुनिक विचारों वाली। हमारी पहली मुलाकात पुस्तकालय में हुई थी। वह डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की एक पुस्तक ढूँढ़ रही थी और वह पुस्तक मेरे हाथ में थी। मैंने मुस्कुराकर वह पुस्तक उसे दे दी। उसने कहा—
“थैंक यू, मिस्टर मेहता।”
उसी दिन से हमारी बातचीत शुरू हुई।

प्रशिक्षण के दौरान मसूरी की पहाड़ियों पर होने वाली ट्रैकिंग, बारिश में भीगते हुए चाय की छोटी-सी दुकान और देर रात तक भविष्य के सपने बुनना हमारी आदत बन गया। एक दिन तेज़ बारिश हो रही थी। हम दोनों अकादमी की पुरानी खिड़की के पास खड़े थे। उसने कहा—
“काश, हमारी ज़िंदगी भी इस बारिश की तरह साफ़ और सुंदर रहे।”

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“अगर साथ तुम रहो, तो हर मौसम अच्छा लगेगा।”

शायद वहीं से प्रेम ने जन्म लिया था।

प्रशिक्षण समाप्त हुआ। अलग-अलग राज्यों में पोस्टिंग मिली, लेकिन दूरी हमारे रिश्ते को कमज़ोर नहीं कर सकी। कुछ वर्षों बाद हमने कोर्ट मैरिज कर ली जिसे बाद में परिवार में भी मान्यता प्रदान कर दी थी। उन्होंने मेरा जन्म स्थान के बारे में बातचीत की जो राजस्थान के पश्चिम में छोटा शहर बिलाड़ा जैन समाज के कारण व्यवसायिक जगत में अपना स्थान रखता था। इसलिए उन्होंने ज्यादा पूछताछ नहीं की।बातचीत के दौरान निधि ने मुझसे कुछ गोत्रों के बारे में पूछा था, जैसे मेरी माँ का गोत्र, ननिहाल और दादी का गोत्र। मैंने उसे कासलीवाल, मेहता और पारख जैसे वे गोत्र बताए, जो पश्चिमी राजस्थान के अनेक जैन परिवारों में प्रचलित हैं और संयोगवश हमारे परिवार से भी मेल खाते थे। मुझे लगा कि मैंने जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई जीत ली है—एक बहुजन युवक, जिसने अपनी मेहनत से ऊँचा मुकाम पाया और अपना प्रेम भी पा लिया।

लेकिन इंसान का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि सफलता के बाद समाज बदल जाता है।

एक दिन हम दोनों समाचार देख रहे थे। चर्चा बहुजन समाज, आरक्षण और सामाजिक न्याय पर चल रही थी। मैंने कहा-
“आज भी गाँवों में लोग जाति के कारण अपमान झेलते हैं। यह केवल कानून का नहीं, मानसिकता का प्रश्न है।”

निधि अचानक बोली—
“लेकिन सच तो यह है कि आरक्षण से कम योग्य लोग भी आगे आ जाते हैं। हम लोग मेहनत करके यहाँ पहुँचे हैं, वे लोग हमारे बराबर कैसे हो सकते हैं? प्रशासन के मामलों में वे हमारा क्या मुकाबला करेंगे?”

उसकी बात सुनकर मेरे भीतर वर्षों से दबा हुआ दर्द जाग उठा। मैंने शांत स्वर में कहा-
“अगर मैं कहूँ कि मैं भी उसी समाज से हूँ, जिसे तुम ‘वे लोग’ कह रही हो?”

वह कुछ क्षण मुझे देखती रही। फिर जैसे उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसने अविश्वास से पूछा—
“क्या… तुम मज़ाक कर रहे हो?”

मैंने पहली बार अपनी जाति, अपने बचपन के अपमान और पिता की सलाह के पीछे छिपा हुआ सच उसे बता दिया।

उस दिन हमारे बीच केवल बहस नहीं हुई थी, बल्कि एक भ्रम टूट गया था। वह आधुनिकता की बातें करती थी, लेकिन उसके भीतर सदियों पुरानी दीवारें खड़ी थीं। कुछ महीनों तक उसने कोशिश की, लेकिन वह उस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर सकी।

मुझे मालूम था कि हमारे घर का वातावरण ऐसा था कि हम पूर्णतः शाकाहारी थे और लहसुन-प्याज तक नहीं खाते थे। आसपास के जैन परिवारों के कारण जैन संत हमारे घर का बना हुआ भोजन भी स्वीकार कर लेते थे। उन संतों में मुझे कभी जातिवाद दिखाई नहीं दिया। मेरे दादाजी अलखनामी संत थे जो बाबा रामदेव के भक्त थे जिनके पगलिया पूजा जाते हैं और जैन धर्म में भी भगवान महावीर के पैरों निशान ही पहचान होते हैं जो कुछ-कुछ सामानता लिए हुए होता है।लेकिन समाज की कुछ संकीर्ण धारणाएँ धीरे-धीरे जैन समाज के एक हिस्से में भी घर कर गई थीं। निधि ने अपने परिवार और सामाजिक परिवेश में जो देखा और सीखा था, उसी मानसिकता के प्रभाव में आखिरकार उसने मुझसे तलाक़ ले लिया। अदालत में उसने केवल इतना कहा—

“हमारे विचार नहीं मिलते।”

तलाक़ के बाद मैं पहली बार सचमुच अकेला हो गया। बारिश अब भी होती थी, लेकिन उसके साथ बिताए हुए पल मेरे सीने पर पत्थर बनकर गिरते थे। मेरे फ़ोन में उसकी तस्वीरें थीं। अकादमी की वह खिड़की थी, जहाँ उसने मेरे साथ भविष्य देखा था। मैं घंटों अपने गाँव के पुराने घर की खिड़की पर बैठा रहता। बाहर बारिश होती और मुझे लगता, जैसे आसमान भी मेरे साथ रो रहा है।

इसी बीच मेरी पोस्टिंग के दौरान एक प्रभावशाली मंत्री, जो संयोगवश जैन समाज से ही था, से भ्रष्टाचार के एक मामले में मेरा टकराव हो गया। मैंने एक अवैध परियोजना पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। उसने मुझे जातिसूचक शब्द तो नहीं कहे, लेकिन उसकी आँखों में वही घृणा थी, जिसे मैं बचपन से पहचानता आया था। कुछ ही दिनों में मेरे विरुद्ध जाँच बैठा दी गई। मुझे निलंबित कर दिया गया और व्यवस्था की जंग में मैं अपनी जाति की वजह से हार चुका था क्योंकि जांच के पैनल में बहुमत जैन समाज के अधिकारियों का था जिनके मन में एक जैन लड़की से शादी करना मेरी सबसे बड़ी हिमाकत मानी गई,बाद में मेरी सेवा भी समाप्त हो गई। उस वक्त पता नहीं क्या मन: स्थिति थी कि मैंने न तो अपील की और न ही विरोध किया, मैं किंकर्तव्यविमूढ़ मन: स्थिति के कारण चुप रह गया।

निलंबन के वे दिन मेरी ज़िंदगी के सबसे कठिन और सबसे लंबे दिन थे। मैं बिलाड़ा से सटे अपने गाँव के पुराने घर लौट आया था। वही मिट्टी की खुशबू, वही आँगन में बिखरी धूप और वही कमरे की पुरानी खिड़की, जहाँ बैठकर मैं बचपन में भविष्य के सपने देखा करता था। अब उसी खिड़की पर बैठकर मैं अपना अतीत गिना करता था।

बाहर हल्की बारिश होती और मुझे लगता, जैसे हर बूँद में उसकी आवाज़ घुली हुई है। देहरादून की पहाड़ियाँ, अकादमी का पुस्तकालय, बारिश में भीगते हुए उसके साथ पी गई चाय—सब कुछ आँखों के सामने तैरने लगता। जिस स्त्री को मैंने अपनी दुनिया समझा था, वह अब किसी और दुनिया की राह चुन चुकी थी। कई बार मैं अपने आप से पूछता—
“क्या मेरा प्रेम कम था, या मेरी जाति उससे बड़ी थी?”
लेकिन हर बार उत्तर केवल ख़ामोशी देती।

मेरे मोबाइल में आज भी उसकी तस्वीरें थीं, पुराने संदेश थे और वे अधूरे सपने थे, जिन्हें हम दोनों ने मिलकर बुना था। एक समय था जब बारिश मुझे बहुत अच्छी लगती थी, क्योंकि उसके साथ बिताए हुए पल याद आते थे। अब बारिश केवल मौसम नहीं रह गई थी; ऐसा लगता था जैसे आसमान भी मेरी तरह किसी बिछड़े हुए अपने को याद करके रो रहा हो।

कभी-कभी हवा उस खिड़की के पुराने परदों को हिलाती तो भ्रम होता कि उसने फिर से मेरे कंधे पर हाथ रखा है। मैं घंटों उस सूनी सड़क को देखता रहता, जैसे अभी वह लौट आएगी। लेकिन धीरे-धीरे समझ आने लगा कि कुछ लोग जीवन में साथ चलने नहीं, बल्कि हमें जीवन का सबसे कठिन सबक सिखाने आते हैं।

उन दिनों मैंने लिखना शुरू किया। दर्द शब्दों में उतरने लगा। प्रकृति मेरी साथी बन गई। भीगे पेड़, मिट्टी की सौंधी महक और बारिश की बूँदें मुझे समझाने लगीं कि हर पतझड़ के बाद नया वसंत आता है।

एक दिन खिड़की से देखा तो सूखी टहनी पर एक नया पत्ता उग आया था। मेरे भीतर से आवाज़ आई—

“हर सूखी टहनी में नया जीवन छिपा होता है, बस समय आने पर वह स्वयं को प्रकट करता है।”

उस दिन मैंने मोबाइल बंद किया, उसकी तस्वीरों को आख़िरी बार देखा और मन ही मन कहा—

“मैं तुम्हें आज भी याद करता हूँ, लेकिन अब मैं खुद को खोना नहीं चाहता।”

कुछ समय बाद मुझे एक नई नौकरी का अवसर मिला। वह बहुत बड़ा पद नहीं था, लेकिन उसने मुझे फिर से चलना सिखा दिया। दर्द अब भी था, यादें भी थीं, पर वे अब बोझ नहीं थीं; वे मेरी सबसे बड़ी शिक्षक बन चुकी थीं। तभी मुझे बाबा साहब अंबेडकर का वह विचार याद आया कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका आत्मसम्मान है। मैंने उसी आत्मसम्मान को आधार बनाकर आगे चलने का निर्णय लिया और शायद वहीं से मेरी दूसरी ज़िंदगी शुरू हुई।

उन्हीं दिनों मैंने फिर से बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के लेख पढ़ने शुरू किए। गौतम बुद्ध का धम्म, महात्मा ज्योतिबा फुले का संघर्ष और पेरियार की निर्भीकता मेरे लिए सहारा बन गए। मुझे समझ आया कि व्यक्तिगत अपमान केवल मेरा नहीं है; यह उस पूरे समाज का अनुभव है जिसने सदियों तक भेदभाव सहा है। अगर मैं टूट गया, तो मेरे जैसे कितने युवाओं का विश्वास टूट जाएगा।

मैंने सरकारी नौकरी की दौड़ से स्वयं को अलग कर अपनी संचित पूँजी, अनुभव और ज्ञान के बल पर परामर्श एवं तकनीकी सेवाओं का एक संस्थान स्थापित किया। आरंभ में लोगों ने उपहास किया और मेरी सफलता पर संदेह जताया, किंतु सत्यनिष्ठा, कठोर परिश्रम, दूरदर्शिता और निष्कलंक आचरण ने धीरे-धीरे उस छोटे-से प्रयास को एक प्रतिष्ठित संस्थान में बदल दिया। कुछ ही वर्षों में उसका नाम केवल आसपास के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान में सम्मान और विश्वास का पर्याय बन गया। इस संस्थान ने सैकड़ों युवाओं को रोजगार और आत्मसम्मान दिया तथा मेरे समाज के गौरव को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाकर प्रेरणा का स्रोत बना दिया।

आज भी जब बारिश होती है तो मैं अपनी खिड़की के पास बैठ जाता हूँ। निधि की याद आती है। देहरादून की वह पहाड़ी, वह पुस्तकालय, वह मुस्कान—सब कुछ याद आता है। लेकिन अब उन यादों में शिकायत नहीं है। उसने मुझे यह सिखा दिया कि प्रेम केवल शब्दों से नहीं, विचारों से भी होता है। जिस प्रेम में मनुष्य की बराबरी के लिए जगह न हो, वह केवल आकर्षण होता है।

मैंने जीवन से एक बात सीखी है—छुआछूत केवल गाँव की गलियों में नहीं रहती, वह बड़े-बड़े दफ़्तरों, आलीशान घरों और ऊँची नौकरियों के भीतर भी साँस लेती है। आज़ादी के उन्यासी वर्ष बाद भी जाति का ज़हर कई शिक्षित चेहरों के पीछे छिपा हुआ है। लेकिन उसी भारत में बाबा साहब के विचार भी जीवित हैं, जो हर टूटे हुए मनुष्य से कहते हैं-

“शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।”

समय ने जैसे एक अनपेक्षित मोड़ ले लिया था। एक दिन संयोगवश मेरी पूर्व पत्नी निधि जैन किसी पारिवारिक विवाह समारोह में बिलाड़ा आई। वहाँ उसने मेरे द्वारा स्थापित उस विशाल संस्थान को देखा, जिसका नाम अब पूरे राजस्थान में सम्मान के साथ लिया जाता था। उसकी आँखों में आश्चर्य, पश्चाताप और एक अनकही पीड़ा साफ़ झलक रही थी। शायद वह उस निर्णय को याद कर रही थी, जब जातिगत पूर्वाग्रहों और सामाजिक दबावों के कारण उसने मुझसे तलाक़ ले लिया था। जीवन के अनुभवों ने अब उसके विचार बदल दिए थे। उसे समझ आ चुका था कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति नहीं, बल्कि उसका चरित्र, संघर्ष और कर्म होते हैं। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समय की लूणी नदी हमारे बीच से इतना पानी बहा ले गई थी कि लौटकर उसी किनारे पर खड़ा होना अब संभव नहीं था।

सच कहूँ, अब जब बारिश होती है, तो मुझे लगता है—आसमान रो नहीं रहा… वह उन सूखी टहनियों पर नए पत्ते उगा रहा है, जिन्होंने कभी स्वयं को टूट चुका समझ लिया था।

एक नई शुरुआत थी। उसकी यादें आज भी मेरे साथ थीं, लेकिन अब वे केवल दर्द नहीं थीं, बल्कि एक सीख बन चुकी थीं।

आज खिड़की के बाहर देखा,
तो पेड़ की सूखी टहनी पर एक नया पत्ता उग आया था।

दिल ने धीरे से कहा—

“हर सूखी टहनी में
नया जीवन छिपा होता है,
बस वक्त आने पर
वह स्वयं को प्रकट करता है।”

ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही होती है—
जहाँ हम टूटने के बाद
फिर से खुद को तलाशते हैं,
और जब उम्मीद का पहला पत्ता उगता है,
तो हर दर्द पीछे छूट जाता है।

मैंने गहरी साँस ली और मुस्कुराते हुए कहा—

“ज़िंदगी खत्म नहीं हुई है… हर याद का अपना एक वक़्त होता है, और अपना एक अंत भी।”

जीवन ने आखिरकार मेरे संघर्षों को एक सुंदर मंज़िल दी। समय के साथ मेरा विवाह अपने ही समाज की एक संस्कारी, संवेदनशील और संघर्षशील युवती से हुआ, जिसने हर मोड़ पर मेरा साथ निभाया। हमारा घर केवल चार दीवारों का नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान और प्रेम का एक आदर्श परिवार बन गया। ईश्वर ने हमें दो प्यारे बच्चों का आशीर्वाद दिया, जिनकी आँखों में वही चमक और हृदय में वही जज़्बा है, जो कभी मेरे भीतर था। वे आज अथक परिश्रम और अनुशासन के साथ पढ़ाई कर रहे हैं तथा प्रशासनिक अधिकारी बनकर समाज की सेवा करने का सपना देख रहे हैं। उन्हें देखकर लगता है कि मेरी हार नहीं, बल्कि मेरे संघर्षों की सबसे बड़ी जीत मेरी अगली पीढ़ी है।

मेरी ज़िंदगी की रफ़्तार बस थोड़ी देर के लिए रुक-सी गई थी।
क्योंकि समय कभी खाली नहीं रहता… वह धीरे-धीरे हर घाव को भरना जानता है।

हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात।
9829 230 966

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *