मेरी सहेलियों को विरासत में सम्मान मिला, मुझे संघर्ष — और यही मेरी सबसे बड़ी पूँजी बन गया!
आज मैं अपनी पुरानी डायरी लेकर बैठी हूँ। उसके पीले पड़ चुके पन्नों में सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी लड़की का जीवन कैद है जिसने बचपन से ही समझ लिया था कि इस दुनिया में सबको बराबर आसमान नहीं मिलता। लोग कहते हैं कि इंसान अपनी सोच से अपनी दुनिया बदल सकता है। मैं भी इस बात को मानती हूँ, लेकिन एक बहुजन वंचित स्त्री होने के नाते मैंने यह भी सीखा है कि केवल सोच बदल लेने से समाज की सदियों पुरानी दीवारें नहीं टूटतीं। कुछ लोगों को जन्म के साथ ही पहचान, सम्मान, जमीन और रिश्तों की सुरक्षा विरासत में मिल जाती है, जबकि कुछ लोग अपने हिस्से का सम्मान भी उम्र भर कमाते रहते हैं। मेरी सहेलियाँ, जो तथाकथित ऊँची जातियों में पैदा हुई थीं, उनके लिए दुनिया कहीं अधिक आसान थी। उनके घरों में बेटियों को सपने देखने की छूट थी, जबकि हमारे घरों में पहले रोटी और फिर जिम्मेदारियों की बात होती थी। शायद इसी अंतर ने मुझे समय से पहले बड़ा कर दिया।
मुझे आज भी अपना स्कूल याद है। हम सब एक ही कक्षा में बैठते थे, एक जैसी किताबें पढ़ते थे, एक ही ब्लैकबोर्ड को देखते थे, लेकिन हमारे लिए दुनिया अलग-अलग थी। मेरी सहेलियाँ छुट्टी के बाद अपने पिता के साथ बाज़ार जाती थीं, नई किताबें खरीदती थीं और भविष्य के सपने बुनती थीं। मैं घर लौटकर माँ के साथ काम में लग जाती थी। कई बार किसी ने सीधे कुछ नहीं कहा, लेकिन व्यवहार बता देता था कि मैं कौन हूँ और मेरी जगह कहाँ तय कर दी गई है। तब समझ नहीं आता था कि मेरी गलती क्या है। क्या मेरा अपराध केवल इतना था कि मैंने एक बहुजन परिवार में जन्म लिया? धीरे-धीरे मैंने जाना कि इस समाज में इंसान की पहचान उसके गुणों से पहले उसकी जात और उसकी आर्थिक स्थिति से की जाती है। यही वह पहला घाव था जिसने मेरे भीतर प्रश्न पैदा किए और शायद यही मेरी लेखनी का जन्म भी था।
आज सुबह जब मेरी आँख खुली तो न जाने क्यों मन बहुत बेचैन था। ऐसा लगा जैसे आज का दिन भी बाकी दिनों की तरह मुझे कोई नया दुख देने वाला है। मन बार-बार कह रहा था कि आज कुछ अच्छा नहीं होगा। मैं उठी, घर के काम में लगी, पूजा करने गई तो दिया बुझ गया। पानी का गिलास हाथ से छूट गया, एक पुरानी तस्वीर गिरकर टूट गई। छोटी-छोटी घटनाएँ थीं, लेकिन मेरे भीतर बैठा डर उन्हें अशुभ संकेत मानने लगा। शायद ऐसा इसलिए था क्योंकि जीवन ने मुझे बहुत कम अच्छे संयोग दिए थे। जो इंसान बार-बार ठोकर खाता है, वह हर नए रास्ते पर गिरने की आशंका लेकर चलता है। मुझे लगने लगा कि सचमुच आज का दिन खराब है और शायद मेरी किस्मत भी ऐसी ही है।
लेकिन उसी बेचैनी के बीच मुझे एक पुरानी बात याद आई। किसी ने कहा था कि अगर इंसान लगातार नकारात्मक सोचता है तो वह अपने चारों ओर भी वैसा ही वातावरण बना लेता है। मैंने सोचा कि अगर दुख अपने आप आ सकता है तो क्या मैं खुशी को खुद बुलाने की कोशिश नहीं कर सकती? मैंने अपने पसंदीदा गाने लगाए, अकेले ही थोड़ी देर नाची, पुरानी तस्वीरें देखीं और खुद से मुस्कुराकर बात करने लगी। यह सब करते हुए अचानक महसूस हुआ कि मेरा मन हल्का होने लगा है। दुख पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था, लेकिन उसे देखने का मेरा नजरिया बदल गया था। तब पहली बार समझ में आया कि सकारात्मक सोच कोई जादू नहीं है, बल्कि संघर्षों के बीच अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखने का नाम है। हालांकि मैं यह भी जानती हूँ कि एक बहुजन स्त्री के लिए केवल सकारात्मक सोच काफी नहीं होती; उसे समाज की असमानताओं से भी हर दिन लड़ना पड़ता है।
कुछ समय पहले मेरे एक शिक्षक ने मुझसे कहा था कि अगर तुम्हारे भीतर लिखने की चाह है तो उसे दुनिया से मत छिपाओ। उन्होंने कहा, सोशल मीडिया पर लिखो, अपने अनुभव साझा करो, यह मत सोचो कि कितने लोग पढ़ेंगे या कितने लोग तुम्हें पसंद करेंगे। पहले मैं अपनी कॉपी में ही लिखा करती थी। मेरी कविताएँ, मेरे आँसू और मेरे सवाल उसी के पन्नों तक सीमित रहते थे। लेकिन जब मैंने उन्हें लोगों के सामने रखना शुरू किया, तब मुझे एहसास हुआ कि सच्चा लेखन किताबों से नहीं, जीवन से पैदा होता है। कॉपी-पेस्ट से शब्द मिल सकते हैं, लेकिन भावनाएँ नहीं। जिसने अपमान सहा हो, वही अपमान का दर्द लिख सकता है। जिसने भूख देखी हो, वही रोटी का मूल्य समझ सकता है। जिसने जाति के कारण अवसर खोए हों, वही बराबरी की कीमत जान सकता है।
धीरे-धीरे मैंने इस दुनिया की एक और सच्चाई समझी। दुनिया के सामने अपनी अच्छाई पूरी तरह खोल देना हमेशा समझदारी नहीं होती। अच्छा होना अलग बात है, लेकिन हर किसी को यह बता देना कि आप कितने अच्छे हैं, कई बार आपके खिलाफ चला जाता है। लोग कुछ समय तक आपकी सादगी की तारीफ करते हैं, लेकिन जब उन्हें आपका इस्तेमाल करने का अवसर मिलता है तो वही लोग सबसे पहले बदल जाते हैं। मैंने अपने जीवन में कई बार देखा कि गरीब की ईमानदारी को लोग उसकी मजबूरी समझ लेते हैं और अमीर की छोटी-सी मदद को महानता का नाम दे देते हैं। तब मुझे समझ आया कि इस समाज में अच्छाई की कीमत भी अक्सर इंसान की हैसियत देखकर तय की जाती है।
अगर कोई मुझे बुरा कह देता है तो अब मैं पहले की तरह टूटती नहीं हूँ। मैंने सीख लिया है कि दुनिया की हर राय सच नहीं होती। लोग अक्सर आपकी अच्छाई नहीं, आपकी स्थिति देखते हैं। अगर आप गरीब हैं तो आपकी मेहनत भी साधारण लगती है, और अगर आप संपन्न हैं तो आपकी छोटी-सी बात भी लोगों को असाधारण दिखाई देती है। एक बहुजन स्त्री होने के कारण मैंने यह भेदभाव कई रूपों में देखा है। लेकिन अब मैंने तय कर लिया है कि मैं दूसरों की नजरों से खुद को नहीं मापूँगी। मेरी कीमत मेरे अनुभव तय करेंगे, मेरे संघर्ष तय करेंगे और मेरी कलम तय करेगी।
यह लेखिका केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों को शब्द नहीं देती, बल्कि बहुजन और वंचित समाज की उन अनगिनत महिलाओं की आवाज़ बनकर उभरती है जिन्हें सदियों तक बोलने और लिखने का अवसर नहीं मिला। संघर्ष, सामाजिक विषमता और जातिगत अपमान को उसने अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी लेखनी की शक्ति बनाया है। उसकी रचनाओं में बनावट नहीं, जीवन की सच्चाई है; इसलिए उसके शब्द सीधे पाठकों के हृदय तक पहुँचते हैं।
निरंतर अध्ययन, संवेदनशील दृष्टि और सामाजिक सरोकारों के कारण उसकी कविताएँ, संस्मरण, लेख और आत्मकथात्मक रचनाएँ प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, साहित्यिक पत्रिकाओं तथा विभिन्न सामाजिक मंचों पर प्रकाशित होने लगीं। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि बहुजन समाज की उन बेटियों के लिए प्रेरणा है जो अभावों के बावजूद अपने सपनों को जीवित रखे हुए हैं।
एक दलित लेखिका के रूप में उसकी पहचान यह सिद्ध करती है कि कलम जाति और गरीबी की दीवारों से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। उसके शब्द आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, स्वाभिमान और सामाजिक परिवर्तन का दस्तावेज़ बनते जा रहे हैं।
आज मेरी डायरी के पन्ने केवल मेरे अकेलेपन और संघर्ष के साक्षी नहीं रहे, वे असंख्य बहुजन और वंचित बेटियों की आवाज़ बन चुके हैं। कभी जो शब्द मेरी कॉपी के बंद पन्नों में कैद रहते थे, आज वे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, साहित्यिक पत्रिकाओं और सामाजिक मंचों के माध्यम से दूर-दूर तक पहुँच रहे हैं। यह मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस पूरे समाज की जीत है जिसे सदियों तक बोलने और लिखने का अवसर नहीं दिया गया।
मैं अब अपनी कहानी इसलिए लिखती हूँ कि कोई बहुजन बेटी इसे पढ़कर अपने सपनों से समझौता न करे। उसे यह विश्वास मिले कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, प्रतिभा और संघर्ष मिलकर इतिहास बदल सकते हैं। मुझे विरासत में वैभव नहीं मिला, लेकिन संघर्ष मिला; और उसी संघर्ष ने मेरी कलम को पहचान, सम्मान और एक नई दिशा दी। शायद यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है कि मैंने अपने शब्दों से अपने अस्तित्व को स्वयं गढ़ लिया।
शेर :
विरासत में उन्हें महलों की ऊँची दीवारें मिल गईं,
हमें संघर्ष मिला, उसी से अपनी पहचान मिल गई।

हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड
डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिकऔर सामाजिक चिंतक। (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर, गुजरात। 98292 30966
स्रोत एवं संदर्भ :
लेखिका के आत्मानुभव, बहुजन वंचित स्त्री जीवन-संघर्ष, सामाजिक विषमता, जातिगत भेदभाव, मनोवैज्ञानिक अनुभव और समकालीन यथार्थ पर आधारित।
