भूमिका
14 अप्रैल 2026 को डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती पूरे देश में अभूतपूर्व उत्साह और जनभागीदारी के साथ मनाई गई। गांव से लेकर महानगरों तक, नीले झंडों, रैलियों, शोभायात्राओं और सांस्कृतिक आयोजनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह केवल एक जयंती नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समानता और आत्मसम्मान का जनपर्व है। लेकिन इस विराट जनउत्सव के सामने जब मुख्यधारा मीडिया का आईना रखा गया, तो उसमें एक अजीब सन्नाटा दिखाई दिया—मानो 85% आबादी की आवाज़ को 15 अप्रैल 2026 के मुख्य धारा के अखबारों ने जानबूझकर 5% की खबरों में सीमित कर दिया गया हो।

यह स्थिति केवल उपेक्षा नहीं, बल्कि एक गहरी खामोशी (मौन) का संकेत देती है, जो बहुजन समाज की चेतना को दबाने का प्रयास प्रतीत होती है। मीडिया का यह नैरेटिव (कथानक) अब सवालों के घेरे में है और इसके पीछे की मंशा पर गंभीर बहस जरूरी हो गई है।

  1. बहुजन उत्सव बनाम मीडिया की चुप्पी

देशभर में करोड़ों लोगों की भागीदारी के बावजूद, राष्ट्रीय अखबारों और टीवी चैनलों ने इन आयोजनों को या तो नजरअंदाज किया या प्रतीकात्मक रूप में सीमित कर दिया। यह केवल चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित खामोशी (मौन) का संकेत है, जो बहुजन चेतना को दबाने का प्रयास प्रतीत होती है। मीडिया की यह एजेंडा (पूर्वनिर्धारित दिशा) आधारित प्रवृत्ति अब स्पष्ट रूप से उजागर हो रही है। यदि समय रहते यह दृष्टिकोण नहीं बदला, तो बहुजन समाज स्वयं अपनी आवाज़ को और तेज करेगा और इस उपेक्षा का जवाब भी देगा।

  1. “खबर” की परिभाषा कौन तय करता है?

मीडिया का मूल दायित्व है—समाज की हर आवाज़ को सामने लाना। लेकिन जब खबरों का चयन सत्ता, पूंजी और वर्ग विशेष के नजरिए से होने लगे, तो पत्रकारिता “जनता की आवाज़” से हटकर “एजेंडा” बन जाती है। सवाल यह है कि क्या बहुजन समाज की ऐतिहासिक रैलियां खबर नहीं थीं, या उन्हें खबर बनने से रोका गया? यह स्थिति एक सुनियोजित चयन (पक्षपातपूर्ण चयन) को दर्शाती है, जहां कुछ आवाज़ों को प्राथमिकता दी जाती है और बाकी को दबा दिया जाता है। मीडिया की यह फिल्टर (छंटाई प्रक्रिया) आधारित कार्यप्रणाली अब निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर रही है और लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती दे रही है।

  1. पूंजी और मीडिया का गठजोड़

आज का मुख्यधारा मीडिया बड़े कॉरपोरेट घरानों के प्रभाव में है। विज्ञापन आधारित मॉडल ने पत्रकारिता को बाजार के अधीन कर दिया है। बहुजन समाज, जो आर्थिक रूप से कमजोर है, वह विज्ञापन का बड़ा स्रोत नहीं बन पाता—इसलिए उसकी खबरें भी “कम महत्वपूर्ण” मान ली जाती हैं। यह स्थिति एक प्रकार की मजबूरी (आर्थिक दबाव) नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रुझान (झुकाव) को दर्शाती है, जहां पूंजी के आधार पर खबरों की प्राथमिकता तय होती है। इस पूरी व्यवस्था का इम्पैक्ट (प्रभाव) सीधे लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ रहा है और सूचना तंत्र को मार्केट (बाजार) के नियंत्रण में ले जा रहा है।

  1. प्रतिनिधित्व का संकट

विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि मीडिया संस्थानों के शीर्ष पदों पर बहुजन समाज का प्रतिनिधित्व नगण्य है। जब निर्णय लेने वाली कुर्सियों पर विविधता नहीं होगी, तो खबरों में भी विविधता नहीं आएगी। “जो कहानी सुनाता है, वही इतिहास लिखता है”—और आज कहानी सुनाने वाले एक सीमित वर्ग से आते हैं। यह स्थिति एक गहरी नाइंसाफी (अन्याय) को दर्शाती है, जहां बहुजन समाज की आवाज़ को पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता। मीडिया का यह स्ट्रक्चर (ढांचा) अब एकतरफा दिखाई देता है, जो लोकतंत्र के समावेशी स्वरूप पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

  1. बहुजन आंदोलन को “भीड़” बनाना

मुख्यधारा मीडिया अक्सर बहुजन रैलियों को एक “भीड़” के रूप में प्रस्तुत करता है, न कि एक जागरूक सामाजिक आंदोलन के रूप में। इससे उनकी वैचारिक ताकत को कमतर करके दिखाया जाता है। यह केवल भाषा का खेल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित तस्वीर (प्रस्तुति) गढ़ने की कोशिश है, जो बहुजन चेतना को कमजोर दिखाती है। ऐसी प्रस्तुति एक प्रकार की हिक़ारत (तुच्छ समझना) को दर्शाती है, जिसमें आंदोलन की गंभीरता को नजरअंदाज किया जाता है। इस प्रक्रिया का इम्पैक्ट (प्रभाव) यह होता है कि समाज के सामने वास्तविक मुद्दे धुंधले पड़ जाते हैं और संघर्ष की असली भावना दब जाती है।

  1. एजेंडा सेटिंग और जन-चेतना

मीडिया केवल खबर नहीं दिखाता, बल्कि यह भी तय करता है कि समाज क्या सोचे। जब अंबेडकर के विचार—समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व—मुख्यधारा से गायब कर दिए जाते हैं, तो यह केवल उपेक्षा नहीं, बल्कि यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश है। यह एक प्रकार की सोच (विचारधारा) को थोपने का प्रयास बन जाता है, जिसमें जनता की वास्तविक आवाज़ को दबाया जाता है। मीडिया का यह नैरेटिव (कथानक) निर्माण अब स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण दिखाई देता है, जो जन-चेतना को सीमित करने और सामाजिक बदलाव की गति को रोकने का माध्यम बन सकता है।

  1. “मनुवादी मानसिकता” का आरोप—कितना सच?

जब बार-बार बहुजन समाज की बड़ी घटनाओं को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मीडिया एक खास सामाजिक संरचना को बनाए रखने में अनजाने या जानबूझकर भूमिका निभा रहा है। यह आरोप केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि अनुभवजन्य भी है। लगातार उपेक्षा की यह प्रवृत्ति एक गहरी धारणा (सोच) को जन्म देती है, जिसमें बहुजन समाज खुद को हाशिए पर महसूस करता है। मीडिया का यह एप्रोच (दृष्टिकोण) अब संदेह के घेरे में है और इसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

  1. सोशल मीडिया: नई आवाज़, नया मंच

मुख्यधारा की चुप्पी के बीच सोशल मीडिया ने बहुजन समाज को एक नया मंच दिया है। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इन आयोजनों की व्यापक कवरेज देखने को मिली। यह इस बात का संकेत है कि अब “आवाज दबाने” का दौर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। यह उभरता हुआ माध्यम बहुजन समाज के लिए एक सहारा (आधार) बनकर सामने आया है, जहां वे अपनी बात निर्भीकता से रख पा रहे हैं। सोशल मीडिया की यह रीच (पहुंच) पारंपरिक मीडिया की सीमाओं को तोड़ते हुए एक नए लोकतांत्रिक संवाद को जन्म दे रही है।

  1. लोकतंत्र की असली कसौटी?

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि सूचना की समानता से भी चलता है। यदि 85% समाज की गतिविधियां मीडिया में जगह नहीं पातीं, तो यह केवल मीडिया की विफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र की भी कमजोरी है। यह स्थिति एक गहरी चूक (असफलता) को दर्शाती है, जहां जनमत के बड़े हिस्से को अनदेखा किया जा रहा है। मीडिया का यह फंक्शन (कार्य) यदि निष्पक्ष नहीं रहेगा, तो लोकतंत्र का संतुलन भी प्रभावित होगा और जनता का विश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जाएगा।

  1. लानत या आत्ममंथन?

यह समय केवल आलोचना करने का नहीं, बल्कि मीडिया से जवाब मांगने का है। क्या वे अपने दायित्व से भटक गए हैं? क्या उन्हें अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए? यदि मीडिया जनता की आवाज़ नहीं बन सकता, तो उसे “चौथा स्तंभ” कहने का क्या औचित्य रह जाता है? यह स्थिति एक गहरी शर्मिंदगी (लज्जा) का विषय है, जहां अपने कर्तव्यों से विमुखता साफ दिखाई देती है। अब जरूरी है कि मीडिया अपने रोल (भूमिका) को समझे और निष्पक्षता के मूल सिद्धांतों की ओर लौटे, अन्यथा जनता स्वयं वैकल्पिक रास्ते तलाश लेगी।

समापन
14 अप्रैल 2026 का दिन केवल एक जयंती नहीं, बल्कि एक आईना था—जिसने समाज की ताकत और मीडिया की सीमाओं दोनों को उजागर कर दिया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”—आज यह संघर्ष केवल सामाजिक नहीं, बल्कि वैचारिक और मीडिया के स्तर पर भी है। यदि मुख्यधारा मीडिया अपनी भूमिका नहीं निभाता, तो यह एक गहरी चेतावनी (संदेश) है कि जनता अब चुप नहीं रहेगी। मीडिया का यह फोकस (केंद्र) यदि जनहित से भटका रहा, तो इतिहास यह जरूर दर्ज करेगा कि जब 85% लोग सड़कों पर थे, तब कैमरे कहीं और व्यस्त थे।

शेर:
जो सच था वो बहुजन की आवाज़ में गूंजता रहा,
मगर मीडिया का आईना खामोशियों में ही सिमटता रहा।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966

स्रोत व संदर्भ:
समकालीन समाचार विश्लेषण, बहुजन समाज के आयोजनों पर मुख्यधारा मीडिया की उपेक्षा और सामाजिक विमर्श पर आधारित।

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