जब समाज में मूल्यों की नींव कमजोर होने लगती है, तब बाहरी समृद्धि भी अपना अर्थ खो देती है। आज चारों ओर विकास और प्रोग्रेस (उन्नति) की बातें होती हैं, लेकिन भीतर कहीं न कहीं एक खलिश (पीड़ा) बनी रहती है। यह वही स्थिति है जब मनुष्य अपने मूल से कटने लगता है। भौतिक उपलब्धियों के बावजूद यदि आत्मिक संतुलन न हो, तो जीवन अधूरा ही प्रतीत होता है। यही अधूरापन धीरे-धीरे समाज के सामूहिक चरित्र को प्रभावित करता है और एक अदृश्य पतन की शुरुआत हो जाती है।

परिवार वह स्थान है जहाँ व्यक्ति अपने जीवन के प्रथम संस्कार ग्रहण करता है। यहाँ अदब (सम्मान) और अनुशासन की नींव रखी जाती है। लेकिन आज की फैमिली (परिवार) संरचना में संवाद की कमी ने इन मूल्यों को कमजोर कर दिया है। माता-पिता की व्यस्तता और बच्चों की आभासी दुनिया में लिप्तता ने संबंधों को सतही बना दिया है। जब परिवार में ही संस्कारों का अभाव हो जाए, तो समाज में नैतिकता की अपेक्षा करना व्यर्थ हो जाता है।

रिश्तों की असली पहचान मोहब्बत (प्रेम) और विश्वास से होती है। लेकिन आज रिलेशनशिप (संबंध) एक औपचारिकता बनते जा रहे हैं। लोग साथ तो रहते हैं, लेकिन दिलों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। यह दूरी केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक विघटन का कारण भी बन रही है। जब रिश्तों में सच्चाई और अपनापन खत्म हो जाता है, तब व्यक्ति अकेलेपन की ओर बढ़ता है और समाज संवेदनहीन बन जाता है।

हमारे समाज में बुजुर्गों को ज्ञान और अनुभव का भंडार माना गया है। लेकिन आज वे तन्हाई (अकेलापन) का जीवन जीने को विवश हैं। आधुनिक सोसाइटी (समाज) में उनकी उपेक्षा एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। जिन हाथों ने हमें चलना सिखाया, आज वही हाथ सहारे के लिए तरस रहे हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक गिरावट का प्रमाण है।

संस्कार व्यक्ति की आत्मा से जुड़े होते हैं। जब मनुष्य अपनी रूह (आत्मा) से जुड़ा रहता है, तब वह सही मार्ग पर चलता है। लेकिन आज की बदलती लाइफस्टाइल (जीवनशैली) में यह जुड़ाव कमजोर हो रहा है। भौतिक सुखों की अधिकता ने मनुष्य को भीतर से खाली कर दिया है। परिणामस्वरूप, नैतिक मूल्यों का ह्रास तेजी से हो रहा है और जीवन केवल उपभोग का साधन बनकर रह गया है।

शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण करना भी है। यदि शिक्षा में तहजीब (शिष्टाचार) का समावेश न हो, तो वह अधूरी रह जाती है। आज की एजुकेशन (शिक्षा) प्रणाली में प्रतिस्पर्धा तो है, लेकिन संस्कारों की कमी स्पष्ट दिखाई देती है। विद्यार्थी अंकों की दौड़ में लगे हैं, लेकिन जीवन के मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। यही कारण है कि शिक्षित होते हुए भी समाज में संवेदनशीलता घट रही है।

तकनीक और मीडिया ने हमारे जीवन को सरल जरूर बनाया है, लेकिन इसके प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहले कहानियाँ और अनुभव इबरत (सीख) देते थे, जबकि आज का कंटेंट (सामग्री) अक्सर सतही होता जा रहा है। यह बदलाव नई पीढ़ी के सोचने और समझने के तरीके को प्रभावित कर रहा है। जब मनोरंजन का स्तर गिरता है, तो समाज के विचार भी कमजोर पड़ने लगते हैं।
जब व्यक्ति के भीतर गैरत (स्वाभिमान) और जिम्मेदारी का भाव समाप्त हो जाता है, तब वह अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में रिस्पॉन्सिबिलिटी (जिम्मेदारी) का बोध कम होता जा रहा है। हर कोई अपने हित के बारे में सोच रहा है, जिससे सामूहिक भावना कमजोर पड़ रही है। यह प्रवृत्ति समाज को विघटन की ओर ले जाती है।

संस्कारों का महत्व केवल आदर्शों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की कठिन परिस्थितियों में मार्गदर्शन भी करते हैं। यदि व्यक्ति में सब्र (धैर्य) और सहनशीलता हो, तो वह हर चैलेंज (चुनौती) का सामना कर सकता है। लेकिन आज के समय में अधीरता और जल्दबाजी ने इन गुणों को पीछे छोड़ दिया है। यही कारण है कि छोटी-छोटी समस्याएँ भी बड़े संकट का रूप ले लेती हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर झाँकें और यह समझें कि हम क्या खो रहे हैं। यदि हमने समय रहते अपने संस्कारों को पुनर्जीवित नहीं किया, तो समाज केवल एक ढांचा बनकर रह जाएगा। अख़लाक़ (नैतिकता) और अवेयरनेस (जागरूकता) को अपनाकर ही हम एक बेहतर भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। यही वह मार्ग है जो हमें पुनः मानवता की ओर ले जाएगा।

शेर :
संस्कार बुझे तो रौशनी इंसानियत की भी बुझ जाती है,
वरना खाली पेट भी दुनिया में मोहब्बत बच जाती है।

संकलन कर्ता
हगामी लाल मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 230966

स्रोत/संदर्भ :
समाज, परिवार, नैतिकता और मानवता पर आधारित चिंतन से प्रेरित मौलिक अभिव्यक्ति, जो संस्कारों के महत्व को दर्शाती है।

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