वंचित समाज में जन्म लेने वाला बच्चा दुनिया को उसी नज़र से देखता है, जिसमें बचपन की मासूमियत से पहले अभाव की कठोर सच्चाई होती है। उसके जीवन की शुरुआत ही एक गहरी मज़लूमियत (पीड़ित अवस्था) से होती है, जहाँ उसे अपने अधिकारों से पहले संघर्ष का पाठ पढ़ना पड़ता है। उसके लिए जीवन कोई उत्सव नहीं, बल्कि एक लंबा स्ट्रगल (संघर्ष) होता है, जो उसकी उम्र से कहीं पहले शुरू हो जाता है। यह वह बचपन है, जो खिलौनों से नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों से खेलता है।
जब समाज के अन्य बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, तब यह बच्चा अपने घर की आर्थिक स्थिति को समझने लगता है। उसकी आँखों में सपनों की जगह एक अनकही हसरत (अधूरी इच्छा) पलती रहती है। वह समझ जाता है कि उसका चाइल्डहुड (बचपन) दूसरों जैसा नहीं है। उसके हाथों में किताबों की जगह कभी राशन का थैला होता है, तो कभी मेहनत की मजदूरी।
यह बच्चा जब स्कूल जाने की उम्र में होता है, तब उसे अक्सर घर की जिम्मेदारियों में उलझा दिया जाता है। उसके भीतर सीखने की एक गहरी तिश्नगी (प्यास) होती है, लेकिन एजुकेशन (शिक्षा) उसके लिए एक सपना बनकर रह जाती है। गरीबी और सामाजिक भेदभाव उसकी राह में दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। वह समझौता करना सीख जाता है, उस उम्र में जब उसे जिद करना चाहिए था।
उसका बचपन खेल के मैदानों में नहीं, बल्कि जीवन की कठिनाइयों में बीतता है। उसकी साँसों में एक स्थायी घुटन (दबाव) होती है, क्योंकि वह अपनी इच्छाओं को दबाकर जीना सीख चुका होता है। उसके लिए जीवन कोई आसान गेम (खेल) नहीं, बल्कि हर दिन की परीक्षा है, जिसमें हार-जीत का कोई स्पष्ट परिणाम नहीं होता।
समाज का रवैया उसके प्रति अक्सर कठोर और असंवेदनशील होता है। उसे हर कदम पर तौहीन (अपमान) झेलनी पड़ती है, जिससे उसका आत्मसम्मान आहत होता है। ऐसी सोसाइटी (समाज) में जहाँ समानता की बातें तो होती हैं, लेकिन व्यवहार में भेदभाव दिखता है, वहाँ उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे टूटता जाता है।
उसके परिवार की स्थिति भी उसके संघर्ष को और गहरा कर देती है। माता-पिता की आँखों में एक गहरी बेबसी (लाचारी) झलकती है, क्योंकि वे अपने बच्चे को वह जीवन नहीं दे पाते, जिसका वह हकदार है। उनके लिए फैमिली (परिवार) केवल रिश्तों का नाम नहीं, बल्कि हर दिन जीवित रहने की जद्दोजहद है। यह संघर्ष पीढ़ियों से चला आ रहा होता है।
समय के साथ वह बच्चा बड़ा तो हो जाता है, लेकिन उसके भीतर का बचपन कहीं खो जाता है। उसकी रूह में एक स्थायी खामोशी (सन्नाटा) बस जाती है, जिसे वह कभी शब्द नहीं दे पाता। बाहरी दुनिया उसे एक सक्सेस (सफलता) की मिसाल मान सकती है, लेकिन भीतर वह हमेशा अधूरा ही रहता है।
उसकी जिंदगी में रिश्तों का भी एक अलग ही अर्थ होता है। वह हर रिश्ते में एक अनजानी दूरी (फासला) महसूस करता है। उसके लिए रिलेशनशिप (संबंध) भावनाओं से ज्यादा जिम्मेदारियों का बोझ बन जाते हैं। वह दूसरों के लिए मजबूत दिखाई देता है, लेकिन भीतर से वह आज भी उसी बचपन को तलाश रहा होता है, जो कभी उसे मिला ही नहीं।
जब वह अपनी जिंदगी को पीछे मुड़कर देखता है, तो उसे अपने भीतर एक गहरी कसक (पीड़ा) महसूस होती है। उसकी जिंदगी एक कठिन जर्नी (यात्रा) बन जाती है, जहाँ हर मोड़ पर संघर्ष ही उसका साथी रहा है। वह समझता है कि उसने जीवन जिया कम, और सहा ज्यादा है।
यह कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की है, जिनका बचपन कभी आया ही नहीं। उनके जीवन में उम्मीद (आशा) की एक किरण जरूर होती है, लेकिन वह भी संघर्षों के बीच दब जाती है। उनकी लाइफ (जीवन) हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि असली विकास तभी संभव है, जब समाज के हर वर्ग को समान अवसर, सम्मान और संवेदनशीलता मिले—वरना संस्कारों का यह अकाल पूरी मानवता को भीतर से खत्म कर देगा।
शेर :
जिसे खेलना था धूप में, वो बोझ उठाता रह गया,
वंचित था वो इतना कि उसका बचपन ही सोता रह गया।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी ,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
स्रोत/संदर्भ :
वंचित समाज के जीवन, अभाव, बाल श्रम, सामाजिक असमानता और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित मौलिक रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रयास।
