भूमिका
जब विरासत में अभाव मिले, तब बहुजन युवा मोहब्बत और सम्मान कैसे खोजे,बहुजन और वंचित समाज का नवयुवक जब इस दुनिया में जन्म लेता है, तब वह केवल एक नया जीवन लेकर नहीं आता, बल्कि अपने पूर्वजों के संघर्ष, अपमान, अभाव और सामाजिक असमानता की लंबी विरासत भी अपने साथ लेकर आता है। कुछ लोगों को जन्म के साथ जमीन-जायदाद, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक सुरक्षा और मजबूत संबंधों का सहारा मिलता है, जबकि बहुजन समाज का बड़ा वर्ग आज भी इन सुविधाओं से वंचित है। ऐसे में जब यह युवा अपने चारों ओर प्रेम, विवाह और खुशहाल रिश्तों की कहानियाँ देखता है, तो उसके मन में एक टीस उठती है—क्या सचमुच मेरी किस्मत में मोहब्बत लिखी ही नहीं गई?
- विरासत में संघर्ष, संपत्ति नहीं !
भारत में अधिकांश बहुजन और वंचित परिवारों के पास पीढ़ियों से संचित संपत्ति का अभाव रहा है। सदियों तक सामाजिक और आर्थिक अवसरों से दूर रखे जाने के कारण वे वह पूंजी नहीं जुटा सके जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दे सके। परिणामस्वरूप नवयुवक जब जीवन की शुरुआत करता है तो उसके पास सपनों से अधिक जिम्मेदारियाँ होती हैं। उसे पढ़ाई के साथ काम करना पड़ता है, परिवार की आर्थिक मदद करनी पड़ती है और भविष्य की चिंता भी करनी पड़ती है। ऐसे हालात में प्रेम उसके लिए एक सुंदर कल्पना तो बन सकता है, लेकिन प्राथमिकता नहीं।
- सम्मान की भूख और आत्मसम्मान की लड़ाई ।
मनुष्य के जीवन में सम्मान की आवश्यकता भोजन जितनी ही महत्वपूर्ण होती है। बहुजन और वंचित समाज का युवा अक्सर यह अनुभव करता है कि उसकी योग्यता से पहले उसकी सामाजिक पहचान को देखा जाता है। कई बार उसे अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए दूसरों से कहीं अधिक मेहनत करनी पड़ती है। वह सम्मान पाने के लिए लगातार संघर्ष करता है। जब समाज किसी व्यक्ति को बराबरी का दर्जा देने में हिचकिचाता है, तब उसके भीतर हीन भावना और असुरक्षा जन्म ले सकती है। ऐसी परिस्थितियों में प्रेम की आकांक्षा भी सम्मान की तलाश के पीछे छूट जाती है।
निराशा में ऐसा नौजवान यदि मोहब्बत के बारे में सोचता है तो क्या लोग उसे अफलातून नहीं कहेंगे?
- प्रेम और सामाजिक यथार्थ का टकराव .
प्रेम को अक्सर दिलों का मिलन कहा जाता है, लेकिन भारतीय समाज में यह केवल दो व्यक्तियों का विषय नहीं रह जाता। जाति, वर्ग, आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा प्रेम के रास्ते में खड़ी हो जाती हैं। बहुजन समाज के अनेक युवाओं ने अनुभव किया है कि प्रेम संबंधों में सबसे पहले उनकी जातीय पहचान पर प्रश्न उठाया जाता है। कई रिश्ते शुरुआत से पहले ही समाप्त हो जाते हैं। यह अनुभव उनके मन में यह धारणा पैदा करता है कि शायद प्रेम केवल उन लोगों के लिए है जिन्हें समाज पहले से स्वीकार कर चुका है। ऐसी कल्पना करके ही पहले ही अपने आप को असफल मान लेना बहुजन और वंचित समाज के नवयुवक की नियति बन चुकी है।
- अस्वीकृति का गहरा घाव !
किसी व्यक्ति को एक बार ठुकराया जाना दुख देता है, लेकिन बार-बार अस्वीकार किया जाना उसके आत्मविश्वास को तोड़ सकता है। जब बहुजन समाज का नवयुवक प्रेम में असफल होता है, तो उसे केवल व्यक्तिगत निराशा नहीं मिलती, बल्कि उसे यह एहसास भी कराया जाता है कि उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। यह स्थिति उसके मन में गहरी पीड़ा उत्पन्न करती है। वह सोचने लगता है कि शायद उसमें कोई कमी है, जबकि वास्तविकता यह होती है कि समस्या उसके भीतर नहीं, बल्कि समाज के पूर्वाग्रहों में होती है। जब सामाजिक श्रेष्ठता को झूंठी शान जहां समाज स्वीकार कर लेता हो वहां मोहब्बत की कल्पना करना भी दुश्वार हो जाता है।
- दूसरों की खुशियाँ और अपनी खाली झोली !
जब वह अपने आसपास लोगों को प्रेम में सफल होते, विवाह करते और सुखी जीवन जीते देखता है, तब उसके मन का खालीपन और बढ़ जाता है। वह मुस्कुराते चेहरों के पीछे अपनी उदासी छिपाने की कोशिश करता है। बाहर से वह सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर कहीं एक अधूरी इच्छा लगातार उसे कचोटती रहती है। उसे लगता है कि दुनिया की सबसे सुंदर अनुभूति शायद उससे छीन ली गई है। यह भावना धीरे-धीरे अकेलेपन में बदल सकती है और व्यक्ति को भावनात्मक रूप से कमजोर बना सकती है। यही कमजोरी इस समाज के नवयुग को मोहब्बत नाम से डर लगने लग जाता है।
- वह गहरी आह जो दिल से निकलती है!
इन्हीं क्षणों में कभी-कभी दिल के किसी कोने से एक गहरी आह निकलती है—“हे ईश्वर, जब तू हर किसी के हिस्से में मोहब्बत की लकीरें खींच रहा था, तब क्या मेरे भाग्य की स्याही खत्म हो गई थी? क्या मेरी किस्मत का पन्ना कोरा ही रह गया?” यह प्रश्न केवल प्रेम में असफल होने का नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में संघर्ष करने वाले व्यक्ति की वेदना का प्रश्न है। उसे लगता है कि शायद खुशियाँ, प्रेम और अपनापन दूसरों के हिस्से में लिखे गए हैं और उसके हिस्से में केवल संघर्ष ही संघर्ष है। इस समाज का नौजवान जो अभी जीवन की फिलासफी को अच्छी तरह से समझने में असफल रहता है तो फिर अपने हार मानकर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझता है।
- नफरत और भेदभाव के बीच प्रेम की तलाश ?
जिस व्यक्ति ने बचपन से सामाजिक भेदभाव, उपेक्षा और नफरत देखी हो, उसके लिए प्रेम पर विश्वास बनाए रखना कठिन होता है। समाज उसे बार-बार यह एहसास कराता है कि वह दूसरों से अलग है। ऐसे माहौल में प्रेम की कल्पना करना भी साहस का काम बन जाता है। वह अपने मन की भावनाओं को व्यक्त करने से डरता है, क्योंकि उसे अस्वीकार किए जाने का भय सताता है। उसके लिए प्रेम केवल भावनात्मक अनुभव नहीं, बल्कि सामाजिक जोखिम भी बन जाता है। जन सम्मान की जिंदगी जीना दूर की कोड़ी हो वहां मोहब्बत के बारे में सोचना दीवानेपन की इंतहा हो जाती है।
- ईश्वर की कहानी का दूसरा पक्ष ।
लेकिन जीवन का एक दूसरा सत्य भी है। हर अधूरी चाहत अन्याय नहीं होती। कई बार हम जिसे अपनी मंजिल समझते हैं, वह केवल एक पड़ाव होता है। संभव है कि जो प्रेम हमारे हिस्से में नहीं आया, उसके पीछे कोई ऐसी परिस्थिति रही हो जिसे हम उस समय समझ नहीं पाए। जीवन की हर घटना का अर्थ तुरंत समझ में नहीं आता। समय बीतने के बाद कई बार हमें एहसास होता है कि कुछ दरवाजे बंद होना भी हमारे हित में था। इसलिए अधूरे प्रेम को जीवन की अंतिम हार नहीं माना जा सकता। इसके लिए थोड़े धैर्य और इंतजार महत्वपूर्ण हथियार बन जाते हैं।
- प्रेम केवल एक व्यक्ति नहीं होता ।
ईश्वर ने प्रेम को केवल स्त्री-पुरुष संबंध तक सीमित नहीं रखा है। माता-पिता का त्याग, भाई-बहनों का साथ, मित्रों की निष्ठा और बच्चों की मुस्कान भी प्रेम के ही रूप हैं। बहुजन और वंचित समाज का युवा जब अपने जीवन को ध्यान से देखता है, तो उसे महसूस होता है कि संघर्षों के बीच भी कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के उसका साथ दिया। यही लोग उसकी ताकत बनते हैं। यही संबंध उसे टूटने नहीं देते और उसे जीवन की कठिन राहों पर आगे बढ़ने का साहस प्रदान करते हैं। जब बहुजन और वंचित समाज का नवयुवक इस एहसास को अंगीकार कर लेता है तो फिर किसी भी तरह की मोहब्बत उसके सामने बौनी हो जाती है।
- आत्मप्रेम और उम्मीद की नई शुरुआत ।
कभी-कभी ईश्वर बाहरी प्रेम को रोककर हमें स्वयं से प्रेम करना सिखाता है। बहुजन और वंचित समाज के नवयुवक के लिए यह सीख बहुत महत्वपूर्ण है। जब वह अपने संघर्षों, उपलब्धियों और अस्तित्व का सम्मान करना सीखता है, तब उसके भीतर एक नई रोशनी जन्म लेती है। वह समझता है कि उसका मूल्य किसी दूसरे व्यक्ति की स्वीकृति से निर्धारित नहीं होता। आत्मसम्मान और आत्मविश्वास ही वह आधार हैं जिन पर भविष्य की हर सफलता खड़ी होती है। जो स्वयं को स्वीकार कर लेता है, वह जीवन से हारता नहीं। इसके पश्चात मोहब्बत बेमानी ही नहीं होती बल्कि मोहब्बत का विकल्प जैसे इनाम में मिल गया हो ऐसा महसूस होता है।
- महापुरुषों की विरासत : बहुजन नवयुवक की सबसे बड़ी मोहब्बत ।
बहुजन और वंचित समाज के नवयुवक को यदि विरासत में विशाल जमीन-जायदाद नहीं मिली, तो उसे उससे कहीं अधिक मूल्यवान धरोहर मिली है—डॉ. भीमराव अंबेडकर, महात्मा ज्योतिराव फुले और पेरियार ई.वी. रामासामी जैसे महापुरुषों के विचार तथा भारत का संविधान। यह ऐसी बौद्धिक और नैतिक संपत्ति है जिसका कोई मुकाबला नहीं। जो युवा संविधान के समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय के मूल्यों से प्रेम करता है, वह स्वयं को कभी अकेला नहीं पाता। इन महापुरुषों की विचारधारा उसके आत्मविश्वास, स्वाभिमान और संघर्ष की शक्ति बन जाती है। ऐसी मोहब्बत जीवन की हर हार को जीत में बदलने का सामर्थ्य रखती है। शारीरिक मोहब्बत जमाने के मुताबिक ढल जाती है लेकिन ऐसी मोहब्बत जो जमाना गुजरता जाता है और भी गहरी होती जाती है जिसका कोई मुकाबला नहीं होता।
समापन
यह कहना गलत होगा कि बहुजन और वंचित समाज के नवयुवक की किस्मत में मोहब्बत लिखी ही नहीं है। सच यह है कि उसके हिस्से में संघर्ष अधिक आए हैं और अवसर कम। उसे विरासत में जमीन-जायदाद से अधिक अभाव, प्रतिष्ठा से अधिक संघर्ष और सुरक्षा से अधिक असुरक्षा मिली है। फिर भी प्रेम, आशा और संवेदना किसी विशेष वर्ग की जागीर नहीं हैं। इतिहास बताता है कि सबसे अधिक दर्द सहने वाले लोग ही सबसे गहरा प्रेम करना जानते हैं। ऐसे नवयुवक अपने देश, हमारे संविधान, हमारे महापुरुषों से मोहब्बत कर सकते हैं।इसलिए निराशा के क्षणों में भी विश्वास बनाए रखना चाहिए कि जिसने प्रेम की रचना की है, वह किसी न किसी रूप में हमारे हिस्से का सुकून भी अवश्य सौंपेगा।
शेर :
मोहब्बत की राह में सदियों के फ़ासले भी हार जाते हैं,
जो खुद से और अपने वजूद से प्यार करें, वो कभी नहीं हारते हैं।

संकलनकर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी
कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। (अजमेर) हाल मुकाम, जामनगर ,गुजरात । 9829 230 966
स्रोत एवं संदर्भ :
बहुजन नवयुवकों के प्रेम, सामाजिक असमानता, जातिगत बाधाओं, आत्मसम्मान, डॉ. अंबेडकरवादी चिंतन तथा जीवनानुभवों पर आधारित।
