सरकारी स्कूल कमजोर और निजी शिक्षा मजबूत हुई तो क्या भारत में शिक्षा अमीरों की जागीर बन जाएगी?
भूमिका
शिक्षा किसी भी समाज की समता (समानता) और भविष्य की आधारशिला है, लेकिन भारत में अब इसके बढ़ते कमर्शियलाइज़ेशन (व्यावसायीकरण) ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। निजी विद्यालयों में बड़े निवेशकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बढ़ती दिलचस्पी ने शिक्षा को कारोबार (व्यापार) की दिशा में धकेलने की आशंका पैदा की है। केकेआर और ब्लैकस्टोन जैसी वैश्विक निवेश कंपनियां भारतीय स्कूल क्षेत्र में पूंजी लगा रही हैं, जबकि विभिन्न स्कूल-चेन का विस्तार तेजी से हो रहा है। दूसरी ओर सीबीएसई से निजी संस्थानों की संबद्धता और नियमों में बदलाव को लेकर भी बहस तेज है। सरकार इसे बेहतर प्रबंधन, आधुनिक सुविधाओं और निजी भागीदारी के अवसर के रूप में देख सकती है, जबकि आलोचकों को डर है कि इससे फीस बढ़ेगी और गरीब तथा ग्रामीण बच्चों की पहुंच घटेगी। प्रौद्योगिकी (तकनीकी साधन) और इनोवेशन (नवाचार) उपयोगी हैं, पर इंसाफ (न्याय) तभी होगा जब शिक्षा मुनाफे से ऊपर सामाजिक दायित्व बनी रहे।
1–निजी स्कूलों में बढ़ती पूंजी ने शिक्षा के स्वरूप पर नया सवाल खड़ा किया है।
दायित्व (जिम्मेदारी) अब केवल विद्यालय संचालकों का नहीं, सरकार का भी है।
केकेआर और ब्लैकस्टोन जैसी वैश्विक निवेश कंपनियों की भारतीय शिक्षा क्षेत्र में रुचि बढ़ी है।लाइटहाउस लर्निंग जैसे समूहों में बड़े निवेश से स्कूल श्रृंखलाओं का विस्तार हुआ है।इससे बेहतर भवन, प्रशिक्षण और आधुनिक सुविधाएं मिलने की संभावना भी है।लेकिन इन्वेस्टमेंट (निवेश) का उद्देश्य अंततः आर्थिक लाभ से जुड़ा होता है।
यहीं से शिक्षा को सेवा या बाजार मानने की बहस पैदा होती है।
यदि विद्यालयों का विस्तार शुल्क बढ़ाकर किया गया तो साधारण परिवार प्रभावित होंगे।
बड़े शहरों में यह बदलाव तेजी से दिखाई दे सकता है।
ऐसे में मआश (अर्थव्यवस्था) से जुड़े हित शिक्षा पर हावी न हों।निजी पूंजी उपयोगी हो सकती है, लेकिन सामाजिक नियंत्रण आवश्यक रहेगा।डिजिटल-हब (तकनीकी केंद्र) शिक्षा को बाजार नहीं, अवसर का माध्यम बनाए!
2–निजी स्कूलों का विस्तार केवल नए विद्यालय खोलने तक सीमित नहीं है।
विवेक (सोचने की क्षमता) यह पूछने को मजबूर करता है कि नियंत्रण किसके पास रहेगा।निवेश फर्में स्थापित स्कूल श्रृंखलाओं में हिस्सेदारी लेकर उनका विस्तार कर रही हैं।ब्लैकस्टोन का जयश्री पेरीवाल इंटरनेशनल स्कूल से जुड़ा निवेश इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है।
केदार कैपिटल का के-12 टेक्नो सर्विसेज से संबंध भी इसी व्यापक तस्वीर का हिस्सा है।रेगुलेशन (नियमन) कमजोर हुआ तो व्यावसायिक हित प्रभावशाली बन सकते हैं।विद्यालयों की संख्या बढ़ना अपने आप में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी नहीं है।
शिक्षक, पाठ्यक्रम, शुल्क, सुरक्षा और विद्यार्थियों की गरिमा भी उतनी ही जरूरी है।ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी पूंजी पहुंचने की संभावना अभी सीमित है।निगरानी (देखरेख) मजबूत रहेगी तभी अभिभावकों का भरोसा कायम रहेगा।
कंपनियों को सुविधा और प्रबंधन का अवसर मिले, नीति निर्धारण का अधिकार नहीं।सिटी-लर्निंग (शहरी सीखने की पद्धति) को गांवों पर बिना तैयारी नहीं थोपा जा सकता।
3–सीबीएसई से निजी विद्यालयों की संबद्धता और नियमों में संभावित बदलाव भी महत्वपूर्ण हैं।
मर्यादा (सीमा) इसलिए जरूरी है कि निजी भागीदारी सार्वजनिक हित से बाहर न जाए।
यदि कंपनियों को विद्यालय संचालन से जुड़े अधिक अवसर मिलते हैं तो पारदर्शिता जरूरी होगी।
सरकार का तर्क बेहतर प्रबंधन, आधुनिक संसाधन और गुणवत्ता सुधार हो सकता है।
लेकिन शुल्क तथा प्रवेश प्रक्रिया पर प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अकाउंटेबिलिटी (जवाबदेही) के बिना कोई भी नियामक व्यवस्था अधूरी रहेगी।
सरकारी संस्थाओं को नियमित निरीक्षण और शिकायत निवारण मजबूत करना होगा।
केवल कागजीअनुपालन से विद्यालयों की वास्तविक स्थिति नहीं सुधरेगी।कम आय वाले परिवारों के बच्चों के लिए अवसर सुरक्षित रखना होगा।
रियायत (छूट) और सहायता की व्यवस्था कमजोर वर्गों तक पहुंचनी चाहिए।
नीति का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि बच्चे को क्या क्या मिला ।हाइपरलोकल (स्थानीय स्तर पर केंद्रित) व्यवस्था क्षेत्रीय जरूरतों को बेहतर समझ सकती है।
4। इस परिवर्तन का सबसे बड़ा असर सरकारी विद्यालयों और सामान्य परिवारों पर पड़ सकता है।
प्रगति (उन्नति) तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के अंतिम बच्चे तक पहुंचे।
यदि सरकारी विद्यालय कमजोर और निजी संस्थान महंगे होते गए तो दूरी बढ़ेगी।
गरीब परिवार फीस, किताब, परिवहन और अन्य खर्चों से दबाव में आ सकते हैं।
ग्रामीण विद्यार्थियों को शिक्षक, प्रयोगशाला और डिजिटल संसाधनों की कमी झेलनी पड़ सकती है।
टेक्नोलॉजी (तकनीकी साधन) इन मूल कमियों का अकेला समाधान नहीं हो सकती।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिक्षक, संवाद और प्राथमिक सीखने का विकल्प नहीं है।
सरकार को सार्वजनिक विद्यालयों में निवेश बढ़ाने के साथ निजी क्षेत्र को नियंत्रित करना होगा।
विपक्ष की आशंका है कि निजीकरण से सामाजिक और आर्थिक असमानता बढ़ सकती है।
बच्चों की बराबरी (समानता) किसी भी शिक्षा नीति की पहली कसौटी होनी चाहिए।
शिक्षा को लाभ कमाने का क्षेत्र बनने से रोकना सामूहिक जिम्मेदारी है।
अर्बन-फ्लेक्स (शहर केंद्रित सुविधा) जैसी अवधारणाएं तभी उपयोगी हैं जब सबको अवसर मिले।
5। नई शिक्षा नीति को धरातल पर प्रभावी बनाने के लिए पत्रकार अनिल त्यागी का सुझाव है कि इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिले के जिलाधीश अथवा कलेक्टर को दी जानी चाहिए। कलेक्टर जिले की प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख होता है और शिक्षा विभाग सहित विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर सकता है। यदि नई शिक्षा नीति के लक्ष्यों, विद्यालयों की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता, विद्यार्थियों की उपस्थिति और संसाधनों की निगरानी की जिम्मेदारी भी जिला प्रशासन को मिले, तो जवाबदेही स्पष्ट होगी। नियमित समीक्षा और समयबद्ध कार्रवाई से नीतिगत घोषणाएं कागजों तक सीमित न रहकर विद्यालयों और विद्यार्थियों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला सकती हैं।
समापन
शिक्षा को आधुनिक बनाने के लिए निजी निवेश, नई तकनीक और बेहतर प्रबंधन का स्वागत किया जा सकता है, लेकिन न्याय (उचित अधिकार) की कीमत पर नहीं। केकेआर, ब्लैकस्टोन और अन्य बड़े निवेशकों की बढ़ती भागीदारी यह संकेत देती है कि भारतीय स्कूली शिक्षा अब बड़े आर्थिक हितों का क्षेत्र भी बन रही है। ऐसे समय में सरकार का दायित्व और बढ़ जाता है कि सीबीएसई से संबद्धता, शुल्क, गुणवत्ता, सुरक्षा और कंपनियों की भूमिका पर कठोर नियमन बनाए रखे। निजी विद्यालय मजबूत हों, लेकिन सरकारी विद्यालय कमजोर न पड़ें। इंसाफ (न्याय) तभी होगा जब गरीब और संपन्न, गांव और शहर, सभी बच्चों को समान अवसर मिले। शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रॉफिट (लाभ) पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसा समाज बनाना है जिसमें ज्ञान किसी की आर्थिक हैसियत का बंधक न बने।
शेर
“जहाँ किताबों पर भी बाजार की कीमत लिखी जाने लगे, वहाँ शिक्षा नहीं, सपनों की नीलामी होने लगती है।”

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक. 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाडोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)
स्रोत एवं संदर्भ:
बुशरा खानम फहद और पत्रकार अनिल त्यागी के मध्य चर्चा से प्रेरित एवं केकेआर, ब्लैकस्टोन व शिक्षा निवेश संबंधी इकोनॉमिक टाइम्स, सीबीएसई तथा शिक्षा मंत्रालय के उपलब्ध संदर्भ।

