भूमिका

भारत आज आर्थिक, तकनीकी और सामरिक शक्ति के रूप में आगे बढ़ रहा है।
आत्ममंथन (स्वयं के विचारों की गहरी पड़ताल) अब समय की मांग है।सदानंद धूमे का द वॉल स्ट्रीट जर्नल लेख बताया गया है कि
36 देशों के सर्वेक्षण में भारत को सकारात्मक नजर से देखने वालों का मध्यक 45 प्रतिशत और नकारात्मक नजर रखने वालों का 41 प्रतिशत पाया गया। तीन वर्ष पहले 23 देशों के सर्वेक्षण में सकारात्मक और नकारात्मक धारणाओं के बीच अंतर अधिक था। 2008 में भारत की सकारात्मक छवि दो तिहाई प्रतिशत थी जो गिरकर 41% रह गई है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की उपलब्धियां लगातार दिखाई देती हैं।लेकिन अमेरिका सहित कई देशों में भारत की सकारात्मक धारणा घटी है।
इमेज (छवि) केवल उपलब्धियों से नहीं, व्यवहार से बनती है।
प्रदूषण, अव्यवस्था, असमानता और कमजोर नागरिक सुविधाएं चिंता बढ़ाती हैं।सोशल मीडिया इन कमियों को पूरी दुनिया तक पहुंचाता है।
इसलिए आर्थिक शक्ति के साथ सामाजिक सुधार भी जरूरी है।
भारत को अपनी कमियों से आंखें नहीं चुरानी चाहिए।
सच्ची प्रतिष्ठा नागरिक जीवन बेहतर बनाने से ही प्राप्त होगी।
स्मार्टसिटी (तकनीक आधारित आधुनिक शहर) जैसी योजनाएं तभी सफल होंगी।
जब उनका लाभ सामान्य नागरिक तक वास्तविक रूप में पहुंचे।दुनिया में सम्मान पाने के लिए आत्मविश्वास के साथ सुधार आवश्यक है।
भारत के सामने यह सवाल (प्रश्न) अब गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

  1. उपलब्धियों और वास्तविकता के बीच बढ़ता अंतर

भारत ने बीते वर्षों में आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
प्रतिष्ठा (सम्मान) किसी राष्ट्र को केवल आंकड़ों से नहीं मिलती।विकास की चमक तभी सार्थक है जब उसका असर जनजीवन पर दिखाई दे।बड़े शहरों में यातायात, प्रदूषण और कचरे की समस्या अब भी गंभीर है।
कई स्थानों पर सार्वजनिक सुविधाएं आबादी की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं।
ग्लोबल (वैश्विक) मंच पर इन कमियों की तस्वीर तेजी से पहुंचती है।मोबाइल कैमरा और इंटरनेट ने सूचना को तत्काल प्रसारित करना आसान बनाया।किसी सड़क की गंदगी या व्यवस्था की कमजोरी कुछ ही क्षणों में सामने आ जाती है।विदेशी नागरिक ऐसी सामग्री देखकर पूरे देश के बारे में राय बना सकते हैं।
इससे भारत की सकारात्मक उपलब्धियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।इस चुनौती को छिपाने के बजाय सुधार की दिशा में ठोस प्रयास होने चाहिए।अर्बनाइजेशन (शहरीकरण) के साथ नागरिक सुविधाओं का विस्तार अनिवार्य है।
बेहतर परिवहन, स्वच्छ वातावरण और सुव्यवस्थित सार्वजनिक सेवाएं प्राथमिकता बननी चाहिए।ऐसा होने पर भारत की वैश्विक पहचान अधिक मजबूत और विश्वसनीय बनेगी।
यह रवैया (व्यवहार) देश की वास्तविक ताकत को दुनिया के सामने रख सकता है।

  1. सोशल मीडिया ने बदल दी देश की तस्वीर

आज किसी देश की पहचान केवल सरकारी प्रचार या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों से निर्धारित नहीं होती।
दृष्टिकोण (देखने का तरीका) अब इंटरनेट पर दिखाई देने वाली सामग्री से भी बनता है।भारत की किसी सड़क, रेलवे स्टेशन या बाजार का वीडियो अचानक विश्वभर में पहुंच सकता है।
एक ओर अंतरिक्ष अभियान और तकनीकी उपलब्धियां लोगों को प्रभावित करती हैं।दूसरी ओर गंदगी, भीड़, प्रदूषण और अव्यवस्था वाली तस्वीरें चर्चा में आ जाती हैं।डिजिटल (इंटरनेट आधारित) माध्यम ने हर नागरिक को सूचना प्रसार का अवसर दिया है।
इस व्यवस्था को रोकना संभव भी नहीं और उचित भी नहीं होगा।जरूरत इस बात की है कि वास्तविक परिस्थितियों को बेहतर बनाया जाए।
तब इंटरनेट पर भारत की सकारात्मक तस्वीर स्वतः अधिक दिखाई देगी।नकारात्मक सामग्री का जवाब प्रचार से नहीं, बेहतर काम से दिया जा सकता है।सरकार और समाज दोनों को इस परिवर्तन की गंभीरता समझनी होगी।
अर्बनस्पेस (शहरी क्षेत्र) की गुणवत्ता सीधे देश की पहचान से जुड़ गई है।
स्वच्छ सड़कें, सुरक्षित परिवहन और सुंदर सार्वजनिक स्थान विदेशियों पर अच्छा प्रभाव डालेंगे।
इससे भारतीय उपलब्धियों की चर्चा भी अधिक सकारात्मक संदर्भ में होगी।हर तस्वीर (छवि) के पीछे दिखाई देने वाली वास्तविकता को समझना जरूरी है।

  1. सामाजिक सद्भाव भी अंतरराष्ट्रीय पहचान का आधार

किसी देश की पहचान केवल उसकी अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता से नहीं बनती।
दायित्व (जिम्मेदारी) यह भी है कि प्रत्येक नागरिक को सम्मान और सुरक्षा मिले।
धार्मिक तनाव, सामाजिक संघर्ष तथा भेदभाव की खबरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से फैलती हैं।
ऐसी घटनाएं देश की आर्थिक उपलब्धियों पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर सकती हैं।
विदेशी समाज भारत को उसके सामाजिक व्यवहार के आधार पर भी परखता है।
इन्फ्लुएंस (प्रभाव) केवल राजनीति से नहीं, सामाजिक वातावरण से भी बनता है।लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें हिंसा और घृणा में बदलना नुकसानदायक है।विविधता भारत की विशेषता है और इसे शक्ति में बदलना चाहिए।आपसी सम्मान तथा संवाद का वातावरण देश के प्रति विश्वास बढ़ा सकता है।सामाजिक शांति निवेश, पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए भी अनुकूल वातावरण बनाती है।
इसलिए सार्वजनिक जीवन में संयम और सहिष्णुता को महत्व देना आवश्यक है।
लाइवबिलिटी (रहने योग्य स्थिति) केवल मकानों और सड़कों से तय नहीं होती।
मानवीय संबंध, सुरक्षा और सम्मान भी जीवन की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
भारत यदि इन क्षेत्रों में आगे बढ़ेगा तो उसकी स्वीकार्यता मजबूत होगी।हर किरदार (भूमिका) को जिम्मेदारी से निभाना इस परिवर्तन की पहली शर्त है।

  1. आर्थिक शक्ति के साथ नागरिक सुविधाएं जरूरी

भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और यह देश के लिए बड़ी उपलब्धि है।
प्रगति (उन्नति) का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब सामान्य नागरिक लाभान्वित होगा।महंगे निर्माण और बड़े निवेश के साथ बुनियादी सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है।
साफ पानी, अच्छी सड़कें, विश्वसनीय परिवहन और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं जीवन आसान बनाती हैं।
शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाना भी राष्ट्रीय विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचा) मजबूत होगा तो आर्थिक क्षमता अधिक स्थायी बनेगी।
महानगरों की समस्याओं का समाधान छोटे और मध्यम शहरों के विकास से भी जुड़ा है।
योजनाओं की घोषणा से अधिक जरूरी उनका जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन है।
नागरिकों को सुविधाएं मिलेंगी तो देश के प्रति विश्वास भी मजबूत होगा।यही विश्वास विदेशी आगंतुकों और निवेशकों के अनुभव को भी प्रभावित करेगा।भारत की वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों के जीवन स्तर में दिखाई देनी चाहिए।मोबिलिटी (आवागमन की सुविधा) बेहतर होने से रोजगार और अवसरों तक पहुंच बढ़ती है।
संतुलित विकास से महानगरों पर बढ़ता दबाव भी कम किया जा सकता है।ऐसी व्यवस्था भारत की आधुनिकता को वास्तविक जीवन में बदल सकती है।
इस दिशा में उम्मीद (आशा) को ठोस कार्ययोजना का आधार बनाना होगा।

  1. आलोचना से नाराज नहीं, सुधार के लिए तैयार होना होगा

सदानंद धूमे का वॉल स्ट्रीट जनरल में आर्टिकल भारत के लिए केवल आलोचना नहीं बल्कि चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है।संवेदना (अनुभूति) के साथ देश की कमियों को समझना आवश्यक है।
किसी भी राष्ट्र की आलोचना को तुरंत अपमान मान लेना उचित नहीं।
यदि किसी समस्या की ओर ध्यान दिलाया जाता है तो उसका परीक्षण होना चाहिए।
जो बातें सही हैं, उन्हें स्वीकार करके सुधार की शुरुआत की जा सकती है।परसेप्शन (धारणा) बदलने का सबसे प्रभावी माध्यम वास्तविक परिवर्तन ही है।सरकारें प्रचार से कुछ समय के लिए धारणा बदल सकती हैं।लेकिन लंबे समय तक केवल प्रचार किसी कमजोरी को छिपा नहीं सकता।
साफ शहर, बेहतर संस्थाएं और सम्मानजनक नागरिक व्यवहार स्वयं सकारात्मक संदेश बन जाते हैं।दुनिया भारत को उसके वास्तविक कार्यों से ही अंततः परखेगी।इसलिए आलोचना से बचने के बजाय उसे सुधार का अवसर बनाना चाहिए।
अर्बनप्लानिंग (शहरी नियोजन) में नागरिक जरूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।योजनाओं का उद्देश्य केवल सुंदर दृश्य बनाना नहीं, बेहतर जीवन उपलब्ध कराना होना चाहिए।
जब भारत भीतर से मजबूत होगा तो बाहर उसकी स्वीकार्यता भी बढ़ेगी।यही आईना (दर्पण) हमें अपनी कमियों और संभावनाओं दोनों का एहसास कराता है।

समापन

भारत के सामने आज दुनिया की बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्ति बनने का अवसर है।समन्वय (मेल-जोल) विकास और मानवीय मूल्यों के बीच आवश्यक है।
देश ने अनेक क्षेत्रों में जो उपलब्धियां हासिल की हैं, उन्हें नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन उपलब्धियों के साथ कमजोरियों को स्वीकार करना भी परिपक्व राष्ट्र की पहचान है।
स्वच्छता, नागरिक सुविधाएं, सामाजिक सद्भाव और बेहतर सार्वजनिक व्यवस्था पर ध्यान देना होगा।
पब्लिक (जनसामान्य) जीवन की गुणवत्ता ही किसी राष्ट्र की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करती है।
दुनिया में सम्मान केवल भाषणों और प्रचार से स्थायी नहीं होता।वह नागरिकों के अनुभव, व्यवहार और संस्थाओं की विश्वसनीयता से अर्जित होता है।
भारत को आलोचना से घबराने के बजाय उससे सीखने की जरूरत है।यदि कमियों को दूर किया गया तो नकारात्मक धारणाएं स्वतः कमजोर होंगी।
आर्थिक शक्ति और मानवीय विकास साथ चलेंगे तो भारत की स्थिति और मजबूत होगी।मेट्रोपॉलिटन (महानगरीय) भारत को अब सुविधाओं के साथ संवेदनशीलता भी दिखानी होगी।
यही रास्ता देश को केवल शक्तिशाली नहीं, बल्कि सम्मानित राष्ट्र बनाएगा।दुनिया की नजर में भारत की बेहतर पहचान आखिरकार भारत के अपने काम से बनेगी।
इसलिए आज सबसे बड़ी एहसास (अनुभूति) यही होनी चाहिए कि सुधार ही वास्तविक उत्तर है।

शेर
ऊंची इमारतों से मुल्क की तस्वीर नहीं बनती,
लोगों के बेहतर जीवन से ही दुनिया में तकदीर बनती।


संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक. 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाडोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)

स्रोत और संदर्भ:

सददानंद धूमे का द वॉल स्ट्रीट जर्नल लेख से प्रेरित एवं; भारत की वैश्विक छवि, अमेरिकी धारणा, सामाजिक व्यवस्था और नागरिक सुविधाएं।

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