
हमारे कुछ साथी आज थाईलैंड की यात्रा पर हैं। वे वहाँ बौद्ध कालीन ज्ञान, संस्कृति और विरासत का अध्ययन करने के साथ-साथ अपने मित्रों और परिवारजनों के साथ जीवन के कुछ सुखद और आनंदमय क्षणों का अनुभव कर रहे है।




थाईलैंड और उन तमाम देशों की आज दिखाई देने वाली भव्यता, समृद्धि और विकास को देखकर मन में एक विचार सहज ही आता है—इस विकास,भव्यता व समृद्धि की नींव कहीं न कहीं हमारे उन्हीं पुरखों ने रखी थी, जो सदियों पहले नंगे पैरों, सीमित साधनों और असीमित कठिनाइयों व संकटों का सामना करते हुए भारत की धरती से बुद्ध के ज्ञान, करुणा, विज्ञान और मानवतावादी चिंतन का संदेश लेकर सुदूर इन दूर देशों तक पहुँचे थे।




उनके पास न आधुनिक साधन थे, न सुविधाएँ और न ही सुरक्षित यात्राओं के साधन। उनके पास यदि कुछ था तो वह था—बुद्ध का ज्ञान और उसे मानवता तक पहुँचाने का अटूट संकल्प।
आज जब हम उन्हीं भूभागों पर आधुनिक विकास और समृद्धि को देखते हैं, तो यह केवल वर्तमान की उपलब्धि नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही ज्ञान और संस्कृति की उस यात्रा की भी एक कड़ी दिखाई देती है जिसके मूल में हमारे पुरखों का जीवन छिपा है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आज बुद्ध का वही ज्ञान और विज्ञान पुनः भारत की मूल भूमि सबसे उसके मूलनिवासी समाज तक पहुँच रहा है।
जिस ज्ञान को लेकर हमारे पूर्वज कभी नंगे पैरों और अनंत कष्टों को सहते हुए उन देशों तक पहुँचे थे, उसी ज्ञान की पुनर्स्मृति और पुनर्जागरण के साथ आज उनके वंशज उसी दिशा में पुष्पक विमान से पहुँच रहे हैं।
समय का यह परिवर्तन चक्र केवल यात्रा के साधन का परिवर्तन नहीं है बल्कि यह इतिहास के एक पूरे चक्र के पुनः पूर्ण होने का प्रतीक है।
कल हमारे पुरखे ज्ञान लेकर गए थे जो अभी तक उसी धरती में ही समाये हुए हैं,आज उनके वंशज ज्ञान की विरासत और अपने पुरखों के समर्पण को देख कर लौट रहे हैं।
नंगे पैरों से पुष्पक विमान तक की यह यात्रा केवल यात्रा नहीं, बल्कि हमारे इतिहास, हमारी विरासत और हमारे आत्मसम्मान की यात्रा है। जय भीम नमों बुद्धाय!
दीपाराम मेघवाल बाड़मेर ने जानकारी दी।

