
एक तरफ 21वीं सदी के भारत में यह दावा किया जाता है,कि समाज से जातिवाद समाप्त हो चुका है, हर नागरिक को बराबरी का दर्जा मिल चुका है और संवैधानिक समरसता पूरी तरह स्थापित हो गई है।
वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत इन दावों पर करारा तमाचा जड़ती नजर आती है।
मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले (सेंधवा के जामली स्थित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय) से सामने आई हालिया घटना ने हर संवेदनशील और जागरूक नागरिक के दिल को झकझोर कर रख दिया है।
अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, जब विद्यालय में अध्ययनरत 150 से अधिक छात्र-छात्राओं को प्रशासनिक प्रताड़ना, जातिगत अपमान और बदहाल व्यवस्थाओं के खिलाफ कड़कती धूप में नेशनल हाईवे पर 62 किलोमीटर दूर कलेक्ट्रेट की ओर पैदल मार्च निकालना पड़ा, तो यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि व्यवस्था के मुंह पर एक ऐतिहासिक तमाचा था।
छात्राओं ने रुंधे गले और भारी आक्रोश के साथ बयां किया कि स्कूल प्रशासन व शिक्षक उन्हें लगातार यह कहकर अपमानित करते हैं—”तुम आदिवासी कीड़े हो, अनपढ़ और गंवार हो… ज्यादा से ज्यादा 10वीं-12वीं करोगे और शादी करके बच्चे पैदा करोगे।
संरक्षक ही बने शोषक,
यह कैसा न्याय?
यह कितनी बड़ी विडंबना और क्रूरता है कि जिन राजकीय कार्मिकों और शिक्षकों को शासन द्वारा आदिवासी और वंचित वर्ग के बच्चों के सर्वांगीण विकास, सुरक्षा और संवर्धन की जिम्मेदारी देकर नियुक्त किया गया है, वही उनके सबसे बड़े उत्पीड़क बन बैठे हैं।
जिन्हें इन बच्चों के भविष्य को पंख देने थे, वे उनके स्वाभिमान और हौसले को कुचलने का काम कर रहे हैं।
हॉस्टल में कैदियों जैसा अमानवीय व्यवहार, बुनियादी सुविधाओं का अभाव, माता-पिता से मिलने पर अभद्रता और फीडबैक फॉर्म को फाड़कर फेंक देना यह साबित करता है कि तंत्र में बैठे कुछ लोगों की सामंती और जातिवादी मानसिकता आज भी नहीं बदली है।
आदिवासी बच्चों के अदम्य
साहस को सलाम
इस अंधेरे और हृदयविदारक प्रसंग में सबसे बड़ा उजाला बनकर उभरा है इन मासूम बच्चों का अदम्य साहस।
जब अन्याय असहनीय हो गया, तो इन होनहारों ने सिर झुकाने के बजाय सिर उठाकर हक की आवाज बुलंद की।
हाथों में किताबों के साथ अपने हक के पोस्टर थामे इन बच्चों ने साफ संदेश दिया—
हम गूगल पर दुनिया देखते हैं, हम जानते हैं कि हमारा हक क्या है!
कड़कती धूप में 15 किलोमीटर की पदयात्रा कर प्रशासन को सड़क पर आने और बातचीत करने के लिए विवश कर देना बताता है कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का दिया ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो’ का विचार नई पीढ़ी के रग-रग में बस चुका है।
अन्याय और शोषण के विरुद्ध सीना तानकर खड़ा होना ही बदलाव की पहली शुरुआत है।
बहुजन समाज के लिए
आत्ममंथन का समय
यह घटना बहुजन समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी और आत्ममंथन का संदेश है:
जातिवाद खत्म नहीं हुआ, स्वरूप बदला है: केवल कागजों पर समानता मान लेना आत्मघाती है; जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति और आदिवासी बच्चे को बिना किसी भेदभाव के सम्मानपूर्वक शिक्षा और अवसर नहीं मिलते, संघर्ष अधूरा है।
संस्थागत प्रताड़ना के
खिलाफ एकजुटता
हमारे नौनिहालों के साथ शिक्षण संस्थानों में होने वाले मानसिक व जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ माता-पिता, अभिभावकों और सम्पूर्ण समाज को निरंतर सजग रहकर आवाज उठानी होगी।
संवैधानिक अधिकारों की रक्षा
सरकारी योजनाओं और आवासीय विद्यालयों की निगरानी व जवाबदेही तय होनी चाहिए, ताकि कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति अपने पद का दुरुपयोग कर बच्चों का भविष्य अंधकारमय न बना सके।
जातिसूचक गालियों और अपमानजनक शब्दों से किसी के स्वाभिमान को कुचला नहीं जा सकता।
आदिवासी समाज देश का मूल निवासी और स्वाभिमान का प्रतीक है। वक्त आ गया है कि ऐसी संवेदनहीन और अमानवीय व्यवस्था के खिलाफ सामूहिक चेतना जागृत की जाए और दोषियों के विरुद्ध कठोरतम कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कराई जाए।
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर | संपर्क: 94622-60179
