महामानव की महागाथा: गुलामी के अंधेरे से सत्ता के शिखर तक
बाबा साहेब की 135 वीं जन्म जयन्ती पर 14 अप्रेल 2026 को बाबा साहेब को सादर समर्पित
लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवम विश्लेषक
1.वर्ण व्यवस्था का काला इतिहास: एक सामाजिक नरक
साथियों, बाबा साहब के जन्म से पूर्व का भारत बहुजन समाज के लिए किसी नरक से कम नहीं था। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त से उपजी वर्ण व्यवस्था ने समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में बांटा था। लेकिन इन चारों से नीचे एक ‘पंचम वर्ण’ (अछूत) बनाया गया, जिनका जीवन जानवरों से भी बदतर था।
पेशवा शासन में अछूतों को गले में मिट्टी की हांडी बांधनी पड़ती थी ताकि उनका थूक जमीन को अपवित्र न करे, और कमर पर झाड़ू बांधनी पड़ती थी ताकि उनके पैरों के निशान मिटते 946जाएं। उन्हें संपत्ति रखने और शिक्षा पाने का कोई अधिकार नहीं था।
यदि कोई अछूत गलती से वेद सुन लेता, तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाता था। यह एक ‘जीती-जागती लाश’ का जीवन था।
2. मुक्तिदाता का आगमन (14 अप्रैल 1891)
14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू सैन्य छावनी में सूबेदार रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई के घर 14वीं संतान के रूप में भीम का जन्म हुआ। यह जन्म साधारण नहीं था; यह सदियों की गुलामी को भस्म करने वाले एक सूर्य का उदय था। रामजी सकपाल कबीरपंथी थे, जिन्होंने भीम के भीतर निडरता और नैतिकता के संस्कार रोपे।
3. प्रारंभिक शिक्षा और “No Peon, No Water” का दंश
जब बालक भीम सातारा के गवर्नमेंट हाई स्कूल में पढ़ने गए, तो उन्हें कक्षा के भीतर बैठने की अनुमति नहीं थी। उन्हें बाहर बरामदे में अपनी टाट की बोरी पर बैठना पड़ता था। सबसे क्रूर था पानी पीने का नियम। स्कूल का चपरासी ऊँचाई से उनके हाथों पर पानी गिराता था।
बाबा साहब ने बाद में लिखा—”No Peon, No Water” (चपरासी नहीं तो पानी नहीं)। जिस दिन चपरासी नहीं आता, उस दिन भीम को पूरा दिन प्यासा रहना पड़ता था।
4. संस्कृत शिक्षक द्वारा अपमान: ज्ञान का महासंग्राम
भीम संस्कृत भाषा सीखना चाहते थे, लेकिन स्कूल के संस्कृत शिक्षक ने यह कहकर मना कर दिया कि “एक अछूत देववाणी नहीं पढ़ सकता।” इस अपमान ने भीम को तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बनाया। उन्होंने जबरन फारसी पढ़ी, लेकिन आगे चलकर स्वयं स्वाध्याय से संस्कृत के इतने बड़े विद्वान बने कि उन्होंने ‘ऋग्वेद’ और ‘मनुस्मृति’ जैसे ग्रंथों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर सवर्ण विद्वानों के दावों की धज्जियां उड़ा दीं।
5. बैलगाड़ी की घटना: इंसान की कीमत जानवर से कम
एक बार भीम और उनके भाई मसूर स्टेशन से गोरेगांव जा रहे थे। जब गाड़ीवान को पता चला कि ये बच्चे अछूत हैं, तो उसने उन्हें बीच रास्ते में गाड़ी से उतार दिया। दोगुना किराया देने पर भी कोई उन्हें बैठाने को तैयार नहीं था।
अंततः उन्हें खुद गाड़ी चलानी पड़ी और गाड़ीवान दूर पैदल चला। तपती धूप में प्यास से तड़पते बच्चों को रास्ते के किसी कुएँ से पानी नहीं मिला। उस दिन भीम ने समझा कि इस देश में कुत्ते-बिल्ली की कीमत है, पर अछूत इंसान की नहीं।
6. माता रमाबाई का ऐतिहासिक त्याग (विवाह: 4 अप्रैल 1906)
9 वर्ष की रमाबाई और 15 वर्ष के भीम का विवाह 4 अप्रैल 1906 को मुंबई के भायखला मार्केट में हुआ। माता रमाबाई ‘त्याग की प्रतिमूर्ति’ थीं। जब बाबा साहब विदेश में पढ़ाई कर रहे थे, तब माता रमाई ने गोबर के कंडे बेचे, उपवास रखे और भीषण गरीबी झेली।
उनके चार बच्चे (गंगाधर, रमेश, इंदु और राजरत्न) दवा और दूध के अभाव में उनकी आँखों के सामने दम तोड़ गए, लेकिन उन्होंने भीमराव को ‘बाबा साहब’ बनाने के मार्ग में कभी बाधा नहीं आने दी।
7. मैट्रिक परीक्षा (1907): सफलता का प्रथम शंखनाद
1907 में भीमराव ने एल्फिंस्टन हाई स्कूल से मैट्रिक पास की। यह पूरे बहुजन समाज के लिए एक ऐतिहासिक घटना थी। इसी उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में उनके शिक्षक केलुस्कर गुरुजी ने उन्हें अपनी पुस्तक ‘बुद्ध चरित्र’ भेंट की।
यह पुस्तक केवल एक उपहार नहीं थी, बल्कि यह बाबा साहब के जीवन में बुद्ध के विचारों का पहला प्रवेश द्वार था।
8. महाराजा सयाजीराव का सान्निध्य और छात्रवृत्ति
भीम की कुशाग्र बुद्धि को बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने पहचाना। उन्होंने भीम को आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति दी। महाराजा की इसी मदद ने एक अछूत बालक के लिए विदेश जाकर पढ़ने के दरवाजे खोले, जो उस समय किसी चमत्कार से कम नहीं था।
9. विदेश में शिक्षा: आधा पेट और खाली पेट का भीषण संघर्ष
1913 से 1917 (कोलंबिया विश्वविद्यालय) और 1920 से 1923 (लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स) के बीच बाबा साहब ने जो संघर्ष किया, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
पैसे बचाने के लिए वे दिन में केवल एक कप चाय और पाव का एक टुकड़ा खाकर 18 से 20 घंटे लाइब्रेरी में पढ़ते थे। कई बार वे भूख के मारे बेहोश होकर गिर जाते थे। उन्होंने अपनी पूरी जवानी किताबों के बीच खपा दी ताकि वे अपने समाज के लिए ज्ञान का हथियार ला सकें।
10. “सिंबल ऑफ नॉलेज” वैश्विक गौरव
बाबा साहब की अद्वितीय विद्वत्ता के सम्मान में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें आधिकारिक रूप से ‘सिंबल ऑफ नॉलेज’ घोषित किया। आज उनकी प्रतिमा वहां की लाइब्रेरी में लगी है, जो दुनिया भर के छात्रों को प्रेरित करती है कि ज्ञान के बल पर नियति को बदला जा सकता है।
11. अकल्पनीय विद्वत्ता का सागर और 32 डिग्रियाँ
बाबा साहब की डिग्रियाँ केवल उनकी शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण नहीं थीं, बल्कि वे उस ब्राह्मणवादी मानसिकता के विरुद्ध एक ‘बौद्धिक युद्ध’ की विजय पताका थीं, जो मानती थी कि ‘शूद्र’ ज्ञान प्राप्त करने के योग्य नहीं है। बाबा साहब के पास कुल 32 डिग्रियाँ थीं, जिनमें प्रमुख थीं—बी.ए., एम.ए., पी.एच.डी. (कोलंबिया यूनिवर्सिटी), एम.एससी., डी.एससी. (लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स), बैरिस्टर-एट-लॉ (ग्रेज-इन, लंदन)।
वे दक्षिण एशिया के पहले ऐसे विद्वान थे जिन्होंने अर्थशास्त्र में दोहरी डॉक्टर की उपाधि हासिल की थी। उनकी पी.एच.डी. का विषय था “नेशनल डिविडेंड फॉर इंडिया” और डी.एससी. का विषय था “द प्रॉब्लम ऑफ द रुपी”। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में उन्होंने वह कोर्स, जो 8 वर्षों में पूरा होता था, उसे अपनी असाधारण मेधा और कठोर परिश्रम से मात्र 2 वर्ष 3 महीने में पूर्ण कर लिया। वे प्रतिदिन 18 से 21 घंटे अध्ययन करते थे। उनकी यह विद्वत्ता ही थी जिसके कारण दुनिया ने उन्हें ‘सिंबल ऑफ नॉलेज’ (ज्ञान का प्रतीक) माना। आज भी कोलंबिया विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उन्हें दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली छात्रों की सूची में प्रथम स्थान पर रखा गया है।
12. नौ भाषाओं के महान ज्ञाता: भाषाई महाशक्ति
बाबा साहब को मराठी, हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, गुजराती, पाली, जर्मन, फारसी और फ्रेंच भाषाओं का पूर्ण ज्ञान था। उन्होंने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ साहित्य को उनकी मूल भाषा में पढ़ा, जिससे उन्हें वैश्विक स्तर पर बहस करने की ताकत मिली।
13 चवदा सितंबर 1917 संकल्प भूमि एक युगान्तरकारी प्रतिज्ञा
जब बाबा साहब विदेश से लौटकर बड़ौदा के महाराजा के सैन्य सचिव बने, तो उन्हें लगा कि उनकी डिग्रियाँ छुआछूत को मिटा देंगी। लेकिन कड़वा सच यह था कि उनके अधीन काम करने वाले चपरासी भी उन्हें ‘अछूत’ मानकर फाइलें उनके हाथ में देने के बजाय उनकी मेज पर फेंक देते थे। उन्हें रहने के लिए बड़ौदा में कोई मकान नहीं मिला। वे पहचान छिपाकर एक पारसी धर्मशाला में रहे, लेकिन जब लोगों को पता चला कि वे अछूत हैं, तो लाठियों और तलवारों से लैस भीड़ ने उन्हें वहां से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।
उस दिन, 14 सितंबर 1917 को, डॉ. अंबेडकर बड़ौदा के सयाजी बाग के एक बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर घंटों फूट-फूट कर रोए। वह रोना एक व्यक्ति की कमजोरी नहीं थी, बल्कि वह उस विद्वान का विलाप था जो अपनी करोड़ों जनता की बेबसी महसूस कर रहा था। उसी अंधेरी रात में, उस बरगद के पेड़ के नीचे उन्होंने कसम खाई—”यदि मैं अपने अछूत भाइयों के अपमान और गुलामी की जंजीरें नहीं तोड़ पाया, तो मैं खुद को गोली मार लूँगा।” इसी स्थान को आज हम ‘संकल्प भूमि’ कहते हैं, जहाँ से एक विद्रोही अंबेडकर का उदय हुआ।
14. सिडेनहैम कॉलेज में प्रोफेसर: नियुक्ति और इस्तीफा (1918-1920)
बाबा साहब 11 नवंबर 1918 को मुंबई के विख्यात सिडेनहैम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स में ‘राजनीतिक अर्थशास्त्र’ के प्रोफेसर नियुक्त हुए। यद्यपि वे वहां के सबसे अधिक शिक्षित शिक्षक थे, लेकिन वहां के तथाकथित उच्च जाति कहे जाने वाले प्रोफेसरों ने उनके साथ पानी के जग से पानी पीने पर कड़ा विरोध जताया। चपरासी ने उनके कक्ष की सफाई करने और उन्हें पानी पिलाने से इनकार कर दिया। छात्र शुरू में उन्हें ‘अछूत’ मानकर उपहास उड़ाते थे, लेकिन जब बाबा साहब ने अपना पहला व्याख्यान दिया, तो उनकी विद्वत्ता और शब्दों के जादू ने छात्रों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सवर्ण छात्र भी उनके चरणों में बैठकर ज्ञान लेने को आतुर हो गए। लेकिन बाबा साहब केवल कॉलेज की चारदीवारी में बंधकर नहीं रहना चाहते थे। उन्हें अपने समाज के मुक्ति संग्राम को धार देनी थी। इसलिए 11 मार्च 1920 को उन्होंने प्रोफेसर के पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि वे पेट पालने के लिए नौकरी नहीं, बल्कि समाज के अधिकारों के लिए ‘आंदोलन’ करने आए हैं।
15. ‘मूकनायक’ की स्थापना (31 जनवरी 1920): बेजुबानों की आवाज़
बाबा साहब ने महसूस किया कि जब तक हमारे पास अपनी आवाज़ नहीं होगी, दुनिया हमारी पीड़ा नहीं सुनेगी। इसी उद्देश्य से 31 जनवरी 1920 को उन्होंने अपना पहला पाक्षिक अखबार
‘मूकनायक’ शुरू किया। इसके शीर्षक पर संत तुकाराम की पंक्तियाँ थीं—”काय करू आता धरुनिया भीड़, नि:शंक हे तोंड वाजविले” (अब लोकलाज की चिंता छोड़कर मुझे निडर होकर सत्य बोलना होगा)।
मूकनायक ने सोए हुए समाज को झकझोरने का काम किया। बाबा साहब ने इसके जरिए बताया कि हिंदू समाज एक ऐसी मीनार है जिसमें कई मंजिलें तो हैं, पर कोई सीढ़ी नहीं है। जो जिस मंजिल पर पैदा हुआ, उसे वहीं मरना है। इस अखबार ने दबे-कुचले समाज में चेतना पैदा की और यह सिद्ध किया कि अब उनका ‘नायक’ (नेता) आ चुका है जो उनकी गूंगी पीड़ा को वैश्विक मंच पर रखेगा।
16. छत्रपति शाहू जी महाराज का ऐतिहासिक समर्थन (21 मार्च 1920)
माणगाँव के सम्मेलन में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहू जी महाराज ने बाबा साहब की प्रशंसा करते हुए कहा—”आपको आपका मुक्तिदाता मिल गया है, वे केवल आपके नहीं बल्कि पूरे भारत के नेता होंगे।” शाहू जी ने ही उन्हें ‘मूकनायक’ चलाने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की थी।
17. महाड़ सत्याग्रह: पानी और स्वाभिमान का शंखनाद (20 मार्च 1927)
इतिहास का वह सबसे क्रांतिकारी दिन 20 मार्च 1927 था, जब बाबा साहब ने महाराष्ट्र के महाड़ में चवदार तालाब का पानी अपनी अंजलि में भरकर पिया। साथियों, यह कोई साधारण प्यास बुझाने की घटना नहीं थी, बल्कि यह हजारों वर्षों की उस धार्मिक व्यवस्था को चुनौती थी जिसने पशुओं को तालाब से पानी पीने का हक दिया था, पर इंसानों को नहीं।
बाबा साहब ने गरजते हुए कहा—”हम यहाँ केवल पानी पीने नहीं आए हैं, हम यहाँ यह सिद्ध करने आए हैं कि हम भी इंसान हैं।” जब सवर्णों ने तालाब को ‘शुद्ध’ करने के लिए उसमें गोमूत्र और गोबर डाला, तो बाबा साहब ने स्पष्ट कर दिया कि इस धर्म में इंसान से ज्यादा कीमत जानवर की है। इस आंदोलन ने बहुजन समाज की रगों में वह उबाल पैदा किया जो फिर कभी शांत नहीं हुआ।
18. मनुस्मृति दहन (25 दिसंबर 1927): वैचारिक दासता का अंत
महाड़ सत्याग्रह के दूसरे चरण में, 25 दिसंबर 1927 को बाबा साहब ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने हिंदू धर्म की नींव हिला दी। उन्होंने भेदभाव, ऊँच-नीच और महिलाओं की गुलामी की जननी ‘मनुस्मृति’ को सार्वजनिक रूप से अग्नि के हवाले कर दिया। बाबा साहब ने घोषणा की
कि जिस किताब में इंसान का अपमान हो, उसे जलाना ही मानवता की सच्ची सेवा है। यह दिन भारतीय इतिहास में ‘स्त्री मुक्ति दिवस’ और ‘सामाजिक न्याय दिवस’ के रूप में दर्ज हुआ। मनुस्मृति दहन ने यह संदेश दिया कि अब बहुजन समाज मानसिक रूप से गुलाम नहीं रहा और वह अपनी नई नियति खुद लिखेगा।
19. बहिष्कृत हितकारिणी सभा (1924): संगठन का महामंत्र
बाबा साहब ने 1924 में ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ का गठन किया और समाज को वह ऐतिहासिक नारा दिया जो आज हमारी सफलता का मूल मंत्र है—”शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” उन्होंने अछूतों के लिए छात्रावास, वाचनालय और स्कूल खोले। उनका मानना था कि जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, वह अपनी बेड़ियों को देख नहीं पाएगा। उन्होंने समाज को सिखाया कि अधिकार भीख में नहीं मिलते, वे संगठन की शक्ति से छीने जाते हैं। इस सभा ने उन लाखों युवाओं को तैयार किया जिन्होंने आगे चलकर अंबेडकरवादी कारवां को गाँव-गाँव तक पहुँचाया।
20. साइमन कमीशन के सामने निडरता और वीरता (1928)
1928 में जब पूरा भारत ‘साइमन कमीशन गो बैक’ के नारे लगा रहा था, बाबा साहब ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया। वे जानते थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद यदि सत्ता वापस उन्हीं कट्टरपंथियों के हाथ में गई जिन्होंने हमें हजारों साल गुलाम रखा, तो हमारी स्थिति और भी भयावह होगी। बाबा साहब अकेले कमीशन के सामने खड़े हुए और उन्होंने अछूतों के लिए ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की ठोस मांग रखी। उन्होंने अंग्रेजों को बताया कि भारत तब तक स्वतंत्र नहीं होगा जब तक अछूतों को सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा नहीं मिलती। उनकी इस निडरता ने ही भविष्य के ‘कम्युनल अवार्ड’ का रास्ता साफ किया।
21. कालाराम मंदिर सत्याग्रह (2 मार्च 1930 – 1935)
नासिक के कालाराम मंदिर में प्रवेश के लिए उन्होंने 5 साल 1930-1935 तक संघर्ष किया। अंत में उन्होंने महसूस किया कि सवर्ण समाज पत्थर के भगवान को अछूतों से बचाने के लिए तो तैयार है, पर इंसान को गले लगाने के लिए नहीं। यहीं से उन्होंने अपना रुख मंदिर से हटाकर संसद की ओर मोड़ लिया।
22. गोलमेज सम्मेलन (लंदन 1930-1932): विश्व मंच पर अछूतों की गूंज
लंदन में आयोजित तीनों गोलमेज सम्मेलनों में बाबा साहब ने अपनी विद्वत्ता का लोहा मनवाया। उन्होंने अंग्रेज प्रधानमंत्री रैमजे मैकडोनाल्ड को अपनी दलीलों से लाजवाब कर दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि अछूत हिंदू धर्म का अंग नहीं हैं, बल्कि एक अलग और स्वतंत्र पहचान रखते हैं जिन्हें हिंदुओं ने जबरन गुलाम बना रखा है। जब सम्मेलन में गांधी जी ने कहा कि “मैं अछूतों का नेता हूँ,” तो बाबा साहब ने पलटकर जवाब दिया—”यदि आप हमारे नेता होते, तो हमारी दशा ऐसी न होती। मैं यहाँ अपने लोगों के अधिकारों का सौदा करने नहीं, उन्हें हक दिलाने आया हूँ।” इस सम्मेलन ने बाबा साहब को एक ‘विश्व नेता’ के रूप में स्थापित कर दिया।
23. कम्युनल अवार्ड (16 अगस्त 1932): दो वोटों की जादुई ताकत
बाबा साहब की महानतम राजनीतिक जीत 16 अगस्त 1932 को हुई, जब ब्रिटिश सरकार ने ‘कम्युनल अवार्ड’ की घोषणा की। इसके तहत दलितों को ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ (दो वोटों का अधिकार) दिया गया।
पहला वोट: अपने समाज के प्रतिनिधि को चुनने के लिए।
दूसरा वोट: सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि को चुनने के लिए।
यह अधिकार हमें ‘शासक’ बनाने वाला था। इससे कोई भी सवर्ण नेता हमारे वोट के बिना सत्ता में नहीं आ सकता था। यह बहुजन समाज के इतिहास की वह चाबी थी जो सत्ता के ताले खोलने वाली थी।
24. पूना पैक्ट का दर्द और समाज के लिए बलिदान (24 सितंबर 1932)
जब हमें दो वोटों का अधिकार मिला, तो महात्मा गांधी इसके विरोध में यरवदा जेल में आमरण अनशन पर बैठ गए। पूरा सवर्ण भारत बाबा साहब के खिलाफ हो गया। गांधी के प्राणों पर संकट था। बाबा साहब के सामने दो रास्ते थे—या तो अपने समाज का सुनहरा भविष्य चुनें या गांधी की जान बचाएं। 24 सितंबर 1932 को बाबा साहब ने भारी मन से ‘पूना पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए। उन्होंने कहा—”मैंने अपने समाज के राजनीतिक अधिकारों की बलि गांधी के प्राण बचाने के लिए दी है।” हमें आरक्षित सीटें तो मिलीं, पर स्वतंत्र नेतृत्व का अधिकार छिन गया। यह बाबा साहब का समाज के लिए सबसे बड़ा हृदयविदारक बलिदान था
25 येवला की ऐतिहासिक प्रतिज्ञा (13 अक्टूबर 1935): वैचारिक धमाका
नासिक के पास येवला में आयोजित धर्मांतरण सम्मेलन में बाबा साहब ने वह ऐतिहासिक घोषणा की जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया—”मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ, यह मेरे बस में नहीं था, पर मैं हिंदू के रूप में मरूँगा नहीं।” इस प्रतिज्ञा ने सिद्ध कर दिया कि बाबा साहब अब हिंदू धर्म की संकीर्णता में और अधिक नहीं रह सकते। उन्होंने हिंदू समाज को चेतावनी दी कि यदि वे नहीं सुधरे, तो वे करोड़ों लोगों के साथ इस धर्म का त्याग कर देंगे। इसके बाद ही उन्होंने 21 वर्षों तक बुद्ध के मार्ग का अध्ययन किया, जो अंततः
1956 में फलीभूत हुआ।
26. इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन (1936)
उन्होंने मजदूरों, किसानों और गरीबों के हक के लिए अपनी पहली राजनीतिक पार्टी बनाई और 1937 के चुनावों में शानदार जीत हासिल की। यह बहुजन राजनीति के उदय का पहला अध्याय था।
27.पुस्तक प्रेम और ‘राजगृह’ का निर्माण (1934)
मुंबई के दादर में उन्होंने अपना घर ‘राजगृह’ केवल अपनी 50,000 से अधिक पुस्तकों को रखने के लिए बनवाया। वे दुनिया के सबसे बड़े निजी पुस्तकालय के मालिक थे। वे कहते थे, “मेरा जीवन मेरी पुस्तकों में बसता है।”
28. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रूपरेखा (1935)
भारत के केंद्रीय बैंक (RBI) की स्थापना बाबा साहब की पुस्तक “The Problem of the Rupee” और उनके द्वारा हिल्टन यंग कमीशन को दी गई दलीलों के आधार पर हुई। आज देश की पूरी अर्थव्यवस्था बाबा साहब की बौद्धिक नींव पर खड़ी है।
29. श्रम मंत्री के रूप में क्रांतिकारी कार्य (1942-1946)
वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य (श्रम मंत्री) के रूप में बाबा साहब ने मजदूरों के काम के घंटे 12 से घटाकर 8 किए। उन्होंने महंगाई भत्ता (DA), कर्मचारी राज्य बीमा (ESI), और महिलाओं के लिए प्रसूति अवकाश (Maternity Leave) जैसे कानून बनाए।
30. आधुनिक भारत की जल नीति: आधुनिक भागीरथ (1943-1946)
बाबा साहब ने 1943 से 1946 के बीच ‘केंद्रीय जल आयोग’ की स्थापना की। उन्होंने दामोदर घाटी, हीराकुंड और सोन नदी जैसी विशाल परियोजनाओं की नींव रखी। उन्होंने देश की नदियों को जोड़ने और जल प्रबंधन की जो नीति बनाई, उसी के कारण आज भारत में बिजली और सिंचाई की सुविधा है।
32.संविधान सभा में प्रवेश (1946)
कट्टरपंथियों ने उन्हें रोकने की हर संभव कोशिश की, लेकिन बाबा साहब बंगाल (आज का बांग्लादेश) से चुनकर संविधान सभा में पहुँचे। उनकी विद्वत्ता को देखकर उन्हें संविधान की ‘मसौदा समिति’ (Drafting Committee) का अध्यक्ष बनाया गया।
33. भारतीय संविधान का निर्माण। 9दिसंबर 1946 – 26 नवंबर 1949
2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन के कड़े परिश्रम के बाद बाबा साहब ने विश्व का सबसे बड़ा और श्रेष्ठ संविधान तैयार किया। उन्होंने हर नागरिक को ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ का अधिकार देकर राजनीतिक समानता स्थापित की।
34. अनुच्छेद 17: छुआछूत का संवैधानिक अंत
संविधान में अनुच्छेद 17 के माध्यम से छुआछूत को अपराध बनाकर बाबा साहब ने सदियों पुराने कलंक को कानूनी रूप से जड़ से मिटा दिया। आज जो हम सम्मान के साथ समाज में खड़े होते हैं, वह इसी की ताकत है।
35. हिंदू कोड बिल (1948-1951): महिला अधिकारों का युद्ध
बाबा साहब ने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, तलाक का अधिकार और गोद लेने का अधिकार दिलाने के लिए ‘हिंदू कोड बिल’ पेश किया। उन्होंने सिद्ध किया कि वे केवल दलितों के नहीं, बल्कि भारत की प्रत्येक नारी के मुक्तिदाता थे।
36. प्रथम कानून मंत्री के रूप में इस्तीफा (सितंबर 1951)
जब हिंदू कोड बिल को संसद में रोका गया, तो बाबा साहब ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि—”जहाँ महिलाओं के हक सुरक्षित न हों, वहां कानून मंत्री बने रहने का कोई अर्थ नहीं।” उन्होंने पद से ज्यादा सिद्धांतों को महत्व दिया।
37. पिछड़ा वर्ग (OBC) और अनुच्छेद 340
पिछड़ों के कल्याण के लिए बाबा साहब ने संविधान में अनुच्छेद 340 का प्रावधान किया ताकि उनके लिए विशेष आयोग बनाया जा सके। आज जो पिछड़ों को मंडल आयोग के लाभ मिल रहे हैं, उसकी जननी बाबा साहब की दूरदर्शिता है।
38. इक्कीस वर्षों का गहन धार्मिक अध्ययन (1935-1956)
बाबा साहब ने 21 साल तक दुनिया के सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने इस्लाम, ईसाई और सिख धर्म की पेशकश को ठुकरा दिया क्योंकि वे प्रलोभन नहीं, बल्कि ऐसा मार्ग चाहते थे जो तर्क, विज्ञान और करुणा पर आधारित हो।
39. धम्म दीक्षा: नागपुर की रक्तहीन क्रांति (14 अक्टूबर 1956)
5 लाख अनुयायियों के साथ नागपुर की दीक्षाभूमि पर तथागत बुद्ध की शरण में जाकर उन्होंने इतिहास रच दिया। यह विश्व इतिहास का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था, जहाँ बिना किसी हिंसा के लाखों लोगों ने मानसिक आजादी प्राप्त की।
40. बाईस प्रतिज्ञाएं: वैचारिक स्वाधीनता का घोषणापत्र
धम्म दीक्षा के समय उन्होंने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएं दीं। ये प्रतिज्ञाएं अंधविश्वास, पौराणिक पाखंड और मानसिक गुलामी को जड़ से खत्म करने का एक क्रांतिकारी दस्तावेज हैं।
41. अंतिम विरासत “The Buddha and His Dhamma”:
अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने इस महान ग्रंथ को पूरा किया। यह केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि भविष्य के समतावादी समाज के निर्माण का मार्गदर्शक सिद्धांत है।
42. महापरिनिर्वाण: सूर्य का अस्त होना (6 दिसंबर 1956)
6 दिसंबर 1956 को दिल्ली के अलीपुर रोड पर बाबा साहब ने अपनी अंतिम सांस ली। पूरा देश अनाथ हो गया। उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया था और अब कारवां को आगे ले जाने की जिम्मेदारी हम पर छोड़ दी थी।
43. चैत्यभूमि (7 दिसंबर 1956): श्रद्धा का केंद्र
मुंबई के दादर चौपाटी पर उनका अंतिम संस्कार हुआ, जो आज करोड़ों बहुजनों के लिए ‘शक्ति स्थल’ (चैत्यभूमि) है। हर साल लाखों लोग वहां अपनी श्रद्धा अर्पित करने आते हैं।
44. भारत रत्न (1990): एक औपचारिक सम्मान
मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। हालांकि, बाबा साहब स्वयं रत्नों के रत्न थे और उनका कद किसी भी सरकारी सम्मान से बहुत ऊंचा और वैश्विक है।
45. आधुनिक भारत के वास्तुकार: चहुंमुखी योगदान
लोकतंत्र, नारी अधिकार, शिक्षा, बैंक, बिजली, पानी और आधुनिक कृषि—भारत के विकास का हर क्षेत्र बाबा साहब का ऋणी है। वे सच्चे अर्थों में आधुनिक भारत के निर्माता हैं।
46. एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य (26 जनवरी 1950)
उन्होंने भारत के लोकतंत्र में ऐसी समानता स्थापित की कि देश के प्रधानमंत्री और एक गरीब किसान के वोट की कीमत एक बराबर कर दी।
47. अछूतों के लिए शिक्षा का अधिकार
पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना कर उन्होंने सिद्धार्थ और मिलिंद कॉलेज जैसे महान संस्थान खोले ताकि अछूतों के बच्चे भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें।
48.छुआछूत और विदेशी शिक्षा का विरोधाभास
दुनिया के सबसे विद्वान व्यक्ति का अपने ही देश में अछूत कहकर अपमान होना इस देश के इतिहास का सबसे बड़ा काला अध्याय था, जिसे बाबा साहब ने अपनी विद्वत्ता से धोया।
49. बाबा साहब का अगाध साहित्य प्रेम
वे कहते थे—”पुस्तकें ही मेरी सच्ची मित्र हैं।” उन्होंने रात-रात भर जागकर हजारों पृष्ठों का साहित्य रचा ताकि आने वाली पीढ़ियां बौद्धिक रूप से जाग सकें।
50. आधुनिक लोकतंत्र के प्राण: संसदीय व्यवस्था
बाबा साहब ने भारत के लिए संसदीय लोकतंत्र को चुना ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज दिल्ली की संसद में गूँज सके। उन्होंने ‘सत्ता की चाबी’ आपके हाथों में दी है।
51.हिन्दू धर्म छोड़ने का 21 वर्षों का मन्थन
1935 से 1956 तक बाबा साहब जल्दबाजी में नहीं थे। उन्होंने हर धर्म की पेशकश को तराजू में तोला। इस्लाम ने रियासतें देने का वादा किया, सिखों ने साथ देने का, लेकिन बाबा साहब ने कहा कि मुझे वह धर्म चाहिए जो भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ा हो और वैज्ञानिक हो।
52. कोलंबिया यूनिवर्सिटी की ‘किंग’ छात्रवृत्ति का कर्ज
महाराजा गायकवाड़ द्वारा दी गई छात्रवृत्ति का कर्ज उतारने के लिए उन्होंने बड़ौदा में अपमान सहा, पर भागे नहीं। उन्होंने सिखाया कि समाज के प्रति कृतज्ञता कैसे व्यक्त की जाती है।
53. महिलाओं के लिए संपत्ति का अधिकार
बाबा साहब ने हिंदू कोड बिल के जरिए यह सुनिश्चित किया कि बेटी का भी पिता की संपत्ति में हिस्सा हो। आज की सशक्त महिलाएं बाबा साहब की कलम की ऋणी हैं।
54. चुनाव आयोग की स्थापना
भारत में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए स्वतंत्र चुनाव आयोग की संवैधानिक नींव बाबा साहब ने ही रखी थी, ताकि कोई भी दबंग आपके वोट को न छीन सके।
55.वित्त आयोग की परिकल्पना
राज्यों और केंद्र के बीच धन के उचित बंटवारे के लिए बाबा साहब ने जो ढांचा तैयार किया, वही आज भारत के आर्थिक संतुलन का आधार है।
56.तिरंगे में ‘अशोक चक्र’ का स्थान
भारत के राष्ट्रध्वज तिरंगे के बीच में ‘चरखे’ की जगह प्रगति और न्याय के प्रतीक ‘अशोक चक्र’ को स्थान दिलाने वाले बाबा साहब ही थे।
57. विदेशों में भारत का सम्मान
जब बाबा साहब लंदन या अमेरिका जाते थे, तो वहां के विद्वान उन्हें घेर लेते थे। वे दुनिया के उन चंद लोगों में से एक थे, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अधिकार के साथ बोलते थे।
58. अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार
बाबा साहब ने सिखाया कि पत्थर पूजने से अधिकार नहीं मिलते, बल्कि संसद में बैठने से मिलते हैं। उन्होंने पाखंडवाद की जड़ें खोद दीं।
59. बहुजन समाज का ऐतिहासिक दायित्व
उन्होंने कहा था—”मैं बहुत कठिनाई से इस कारवां को यहाँ तक लाया हूँ, अगर इसे आगे न ले जा सको तो इसे पीछे भी मत जाने देना।”
60. निष्कर्ष: यदि बाबा साहब संघर्ष नहीं करते, तो हमारी स्थिति क्या होती?
मेरे बहुजन समाज के प्रबुद्ध साथियों! जरा एक पल के लिए आँखें बंद कीजिए और सोचिए कि यदि बाबा साहब न होते तो क्या होता?
यदि बाबा साहब न होते, तो आज हम किसी जमींदार के पैरों में बैठकर बेगारी कर रहे होते।
यदि बाबा साहब न होते, तो आज हमारी बहनें और माताएं शिक्षा और संपत्ति के अधिकार से वंचित होतीं।
यदि बाबा साहब न होते, तो आज आपके पास वोट देने की ताकत नहीं होती और कोई भी सामंत आपके स्वाभिमान को कुचल देता।
यदि बाबा साहब न होते, तो आज हम मंदिरों और कुओं के लिए मार खा रहे होते।
बाबा साहब ने अपनी पूरी जिंदगी, अपने सुख-आराम और अपने चार-चार बच्चों की कुर्बानी सिर्फ इसलिए दी ताकि आज हम और आप इस मंच पर खड़े होकर बोल सकें। उन्होंने हमें ‘भीख’ नहीं, ‘संविधान’ दिया है। उन्होंने हमें ‘अछूत’ से ‘इंसान’ और ‘इंसान’ से ‘शासक’ बनने का अधिकार दिया है।
बाबा साहेब का अंतिम सन्देश, बाबा साहब ने कहा था—”मैंने इस कारवां को बहुत कठिनाई से यहाँ तक पहुँचाया है। यदि इसे आगे न ले जा सको, तो इसे पीछे मत जाने देना।” आज बाबा साहेब के 135 वीं जन्म जयन्ती पर यह संकल्प लेकर जाइए कि हम शिक्षित बनेंगे, संगठित रहेंगे और अपने हक के लिए हमेशा संघर्ष करेंगे।
शिक्षित बनो! संगठित रहो! संघर्ष करो! जय भीम! जय भारत! जय संविधान! नमो बुद्धाय!
लेखक
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवम विश्लेषक ब्यावर MO.NO. 94622-60179
