बहुजन समाज की आर्थिक और वैचारिक मुक्ति का घोषणापत्र(3 भागों में शब्द 3856)
प्रस्तावनाइतिहास गवाह है कि किसी भी समाज का पतन तब शुरू होता है जब उसकी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा उत्पादक कार्यों (शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य) के बजाय अनुत्पादक आडंबरों…
प्रस्तावनाइतिहास गवाह है कि किसी भी समाज का पतन तब शुरू होता है जब उसकी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा उत्पादक कार्यों (शिक्षा, व्यापार, स्वास्थ्य) के बजाय अनुत्पादक आडंबरों…
लेखकसोहनलाल सिंगारियासामाजिक-आर्थिक चिन्तक मानवता के इतिहास में तथागत बुद्ध का धम्म केवल एक आध्यात्मिक विचार नहीं, बल्कि एक संपूर्ण मनोवैज्ञानिक और सामाजिक क्रांति है। यह क्रांति किसी शस्त्र से नहीं,…
भूमिकाभारत का बहुजन वंचित समाज सदियों से सामाजिक उपेक्षा, आर्थिक निर्भरता और मानसिक गुलामी का बोझ उठाता आया है। कथित उच्च वर्गों के व्यवहार ने उसके भीतर हीनता और भय…
भूमिका भारत के बहुजन और वंचित समाज का युवा केवल आर्थिक गरीबी से नहीं बल्कि मानसिक, सामाजिक और जातिगत संघर्षों से भी लड़ता है। उसे बचपन से यह महसूस कराया…
वह जो दिल किसी कादूखाता नही है।चोरी जूट कपट, हत्या लूट नफरत का विचार भीतर लाता नही है।। वह जोकरता है पालन नेतिकता का,जीता है जीवन सदाचार भरा। रह कर…
लेखकसोहनलाल सिंगारियासामाजिक-आर्थिक चिन्तक डिस्क्लेमरप्रस्तुत लेख एक स्वतंत्र सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, संप्रदाय, जाति या व्यक्तिगत आस्था को अपमानित करना नहीं है। लेख का मूल…
लेखकसोहनलाल सिंगारियासामाजिक-आर्थिक चिंतक, ब्यावर, राजस्थान डिस्क्लेमरप्रस्तुत लेख एक स्वतंत्र सामाजिक और आर्थिक विश्लेषण है। इसका उद्देश्य किसी भी धर्म, संप्रदाय, जाति या व्यक्तिगत आस्था को अपमानित करना नहीं है। लेख…
भूमिका भारतीय समाज में आज भी लाखों लोग ऐसे हैं जिन्हें उनके नाम, प्रतिभा या मेहनत से नहीं, बल्कि उनकी जाति से पहचाना जाता है। वंचित समाज का बच्चा जब…
विशेष डिस्क्लेमरप्रस्तुत लेख लेखक के व्यक्तिगत सामाजिक-आर्थिक शोध, ऐतिहासिक विश्लेषण और संवैधानिक दर्शन पर आधारित है।इसका लेखक के पद, विभाग या सरकार की किसी भी आधिकारिक नीति से कोई संबंध…