विशेष डिस्क्लेमर
प्रस्तुत लेख लेखक के व्यक्तिगत सामाजिक-आर्थिक शोध, ऐतिहासिक विश्लेषण और संवैधानिक दर्शन पर आधारित है।
इसका लेखक के पद, विभाग या सरकार की किसी भी आधिकारिक नीति से कोई संबंध नहीं है।
यह लेख पूर्णतः सामाजिक चेतना, शैक्षणिक विमर्श और बहुजन समाज के वैचारिक प्रबोधन हेतु समर्पित है।
लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
भूमिका
एक नई चेतना का उदय
भारतीय लोकतंत्र आज अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।
स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी यदि समाज का एक विशाल हिस्सा—जो श्रम करता है, जो राष्ट्र का निर्माण करता है—वह यदि सत्ता, संपदा और संसाधनों से बेदखल है, तो हमें अपने ‘लोकतंत्र’ की परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा।
व्यवस्था परिवर्तन केवल नारों से नहीं आता, वह आता है उस सत्य को स्वीकार करने से जो हमारी जनगणना की फाइलों में छिपाया गया है। यह लेख उसी सत्य का उद्घोष है।
1. बाबा साहब का संवैधानिक संकल्प
आरक्षण का मूल दर्शन बहुजन समाज के मन में यह बात पत्थर की लकीर की तरह अंकित होनी चाहिए कि आरक्षण कोई ‘आर्थिक सहायता’ या ‘गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम’ नहीं है।
डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर ने गोलमेज सम्मेलन (1930-32) से लेकर संविधान सभा की बहसों तक जिस प्रतिनिधित्व की लड़ाई लड़ी, वह सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई थी।
बाबा साहब का स्पष्ट मत था कि भारतीय समाज जातियों का एक ऐसा समूह है जहाँ अवसर समान नहीं हैं।
उन्होंने कहा था कि “आरक्षण वह साधन है जिससे शासन-प्रशासन में वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है।” उनके लिए आरक्षण का अर्थ था कि उस मेज पर बैठना जहाँ नीतियां बनाई जाती हैं।
यदि समाज का पिछला तबका नीतियों के निर्माण में शामिल नहीं होगा, तो नीतियां कभी उनके पक्ष में नहीं बनेंगी।
अतः आरक्षण ‘गरीबी’ मिटाने का नहीं, बल्कि अदृश्यता’ मिटाने का माध्यम है।
2. छत्रपति शाहूजी महाराज
हिस्सेदारी का जीवंत और वैज्ञानिक दर्शन
हिस्सेदारी के सिद्धांत को दुनिया के सामने सबसे सरल और प्रभावी ढंग से राजर्षि शाहूजी महाराज ने रखा।
1902 में कोल्हापुर रियासत में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू कर उन्होंने आधुनिक भारत में सामाजिक न्याय की नींव रखी।
उनके ‘घोड़ों और चने’ के उदाहरण को विस्तार से समझना अनिवार्य है
शाहूजी महाराज ने तथाकथित उच्च वर्ण के विरोधियों को उत्तर देने के लिए अपने अस्तबल में एक प्रयोग किया।
उन्होंने सभी प्रकार के घोड़ों—शक्तिशाली अरबी घोड़े और कमजोर स्थानीय घोड़े—को एक साथ खुला छोड़ दिया और उनके बीच चने की बोरियां फैला दीं।
परिणाम वही हुआ जो अपेक्षित था शक्तिशाली घोड़ों ने न केवल अधिकांश चने खा लिए, बल्कि अपने पिछले पैरों से लात मार-मारकर कमजोर घोड़ों को दूर भगा दिया।
महाराज ने तब ऐतिहासिक सत्य कहा यदि सबको समान मैदान दे दिया जाए, तो शक्ति का पलड़ा हमेशा बलवान के पक्ष में रहेगा।”
इसलिए उन्होंने हर घोड़े के लिए उसका अलग ‘कोष्ठक बनाया ताकि कमजोर घोड़े को भी उसका पेट भरने का अधिकार मिले।
यही ‘समानुपातिक आरक्षण’ का आधार है। संसाधनों का खुला मैदान दुर्बलों के लिए कब्रिस्तान साबित होता है, इसीलिए आरक्षण एक सुरक्षा कवच है।
3. जातिगत जनगणना लोकतंत्र का वैज्ञानिक दर्पण और वैधानिक आधार
लोकतंत्र में ‘लोक’ (जनता) की गणना ही उसकी शक्ति का आधार है। वर्तमान में जातिगत जनगणना के विरोध के पीछे एक गहरा षड्यंत्र है।
वैज्ञानिक दर्पण
जिस प्रकार किसी गंभीर बीमारी के इलाज से पहले ‘ब्लड टेस्ट’ या ‘एक्स-रे’ अनिवार्य है, उसी प्रकार भारतीय समाज की असमानता को दूर करने के लिए जातिगत जनगणना अनिवार्य है। यह एक वैज्ञानिक दर्पण है,जो बताएगा कि कौन सा समाज आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सत्ता से वंचित है।
वैधानिक आधार
सामाजिक न्याय का कोई भी कानून तभी प्रभावी हो सकता है जब उसके पीछे ठोस आंकड़े हों।
आज ओबीसी की संख्या लगभग 52% मानी जाती है, लेकिन उन्हें आरक्षण केवल 27% मिल रहा है।
यह विसंगति तभी दूर होगी जब जातिगत जनगणना के माध्यम से हर जाति की वास्तविक संख्या सामने आएगी।
जातिगत जनगणना कोई सामाजिक विभाजन नहीं है, बल्कि यह जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” के सिद्धांत को लागू करने का वैधानिक उपकरण है।
4. ऐतिहासिक न्याय
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के उदाहरण
विश्व इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी राष्ट्र ने अपने एक वर्ग का शोषण किया है, उसे प्रगति के लिए ‘ऐतिहासिक न्याय’ करना पड़ा है।
अमेरिका
अमेरिका ने अश्वेतों के साथ हुए सदियों के नस्लीय शोषण को स्वीकार किया और वहां ‘अफरमेटिव एक्शन’ लागू किया।
विश्वविद्यालयों से लेकर कॉर्पोरेट जगत तक, अश्वेतों के लिए विशेष प्रावधान किए गए ताकि वे ऐतिहासिक पिछड़ेपन से उबर सकें।
ऑस्ट्रेलिया
ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने वहां के मूल निवासियों के साथ किए गए अत्याचारों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और उनके संसाधनों, जमीन और संस्कृति की रक्षा के लिए विशेष संवैधानिक अधिकार दिए।
भारत में भी ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों द्वारा एससी, एसटी और ओबीसी के साथ किए गए हजारों वर्षों के जातिगत शोषण के लिए ‘ऐतिहासिक न्याय’ अनिवार्य है।
यह न्याय केवल शब्दों से नहीं, बल्कि संसाधनों के पूर्ण हस्तांतरण से होगा।
5. जाति व्यवस्था शोषण से शासन का हथियार
हजारों वर्षों से जाति व्यवस्था का उपयोग बहुजनों के शोषण के लिए किया गया। मनुस्मृति की व्यवस्था ने शूद्रों को संपत्ति रखने और शिक्षा पाने से वंचित किया।
लेकिन आज, संवैधानिक युग में,जाति हमारे लिए ‘शासन का हथियार’ बननी चाहिए।
जब हम संगठित होकर अपनी जातिगत संख्या के आधार पर सत्ता का दावा करते हैं, तो वही ‘जाति’ जो हमें नीचे गिराने के लिए बनी थी, हमें ऊपर उठाने का सीढ़ी बन जाती है।
हमें अपनी उप-जातियों के अहंकार को छोड़कर ‘बहुजन’ की वृहद जातिगत पहचान में विलीन होना होगा ताकि हम शासन करने वाली कौम बन सकें।
6. निजीकरण का षड्यंत्र: आरक्षण का निष्पादन
आज देश में निजीकरण की जो आंधी चल रही है, वह वास्तव में आरक्षण को खत्म करने का एक पिछला दरवाजा है।
संविदा भर्ती और लैटरल एंट्री
सरकारी विभागों को बेचकर या वहां ‘संविदा’ और ‘लैटरल एंट्री के माध्यम से बिना किसी परीक्षा के सामान्य वर्ग के लोगों को उच्च पदों पर बैठाया जा रहा है।
यह सीधे तौर पर एससी, एसटी और ओबीसी के संवैधानिक अधिकारों की हत्या है।
कॉर्पोरेट कब्जा
जब सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम निजी हाथों में चले जाते हैं, तो वहां आरक्षण लागू नहीं होता।
इस तरह धीरे-धीरे सरकारी नौकरियों को समाप्त कर बहुजन समाज को पुनः ‘मजदूर’ बनाने की तैयारी है।
हमें ‘निजी क्षेत्र में आरक्षण’ की मांग को राष्ट्रव्यापी आंदोलन बनाना होगा।
7. लोकतंत्र के चारों स्तंभों में समान भागीदारी
लोकतंत्र तब तक अधूरा है जब तक इसके चारों स्तंभों में जातिगत विविधता न हो
विधायिका
यहां चुनाव प्रणाली में सुधार कर संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व हो।
कार्यपालिका
उच्च नौकरशाही में केवल एक विशेष वर्ग का कब्जा है,जिसे तोड़ना अनिवार्य है।
न्यायपालिका
भारत की न्यायपालिका में आज भी ‘कोलोजियम’ के माध्यम से वंशवाद और जातिवाद हावी है।
यहाँ 100% आरक्षण व्यवस्था लागू कर बहुजन जजों की नियुक्ति होनी चाहिए।
मीडिया
मीडिया जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, वहां बहुजनों की आवाज शून्य है। मीडिया घरानों के मालिकाना हक में जातिगत भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।
8. संसाधनों पर कब्जा और न्यायपूर्ण बँटवारा
वर्तमान भारत की कड़वी सच्चाई यह है कि देश की 70% से अधिक संपत्ति और संसाधनों पर मात्र 10-15% सामान्य वर्ग के (ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों) का कब्जा है।
जमीन और उद्योग
बड़े-बड़े कारखाने, खेती की विशाल जमीनें और धन-संपदा आज भी उन्हीं वर्गों के पास है जिन्होंने सदियों से बहुजनों का शोषण किया।
हमारा लक्ष्य
हमारा लक्ष्य है— “साधन संसाधनों का न्यायपूर्ण बँटवारा ही वास्तविक न्याय है।
इसके लिए भारत में जातिगत जनगणना होनी ही चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि,ओबीसी के पास कितने प्रतिशत जमीन है?
एससी/एसटी का औद्योगिक संपदा में कितना हिस्सा है?
सामान्य वर्ग ने अपनी जनसंख्या से कितने गुना अधिक संसाधनों पर कब्जा कर रखा है?
9. निष्कर्ष: जातिगत जनगणना हमारा अधिकार, शत-प्रतिशत आरक्षण हमारा लक्ष्य
लेख के अंत में, मैं समस्त बहुजन समाज को यह संदेश देना चाहता हूँ कि हमें अब ‘भीख’ नहीं ‘हिस्सेदारी’ चाहिए।
जातिगत जनगणना हमारा अधिकार है क्योंकि हमें अपनी संख्या जानने का हक है।
शत-प्रतिशत आरक्षण हमारा लक्ष्य है क्योंकि संसाधनों पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार देशद्रोह के समान है।
जब तक भारत से जाति व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं होती, तब तक आरक्षण हमारा जीवन है।
मैं यह भी मांग करता हूँ कि संविधान द्वारा किसी भी व्यक्ति को अपने नाम के आगे ‘जातिगत सरनेम’ लगाने पर कानूनी रोक लगनी चाहिए, ताकि जाति का अहंकार समाप्त हो।
लेकिन जब तक अपमान जारी है, जब तक दलितों पर पेशाब किया जा रहा है, जब तक घोड़ी पर चढ़ने से रोका जा रहा है, तब तक ‘आरक्षण’ हमारी ढाल बना रहेगा।
जागो बहुजन जागो! अपनी संख्या पहचानो, अपनी शक्ति पहचानो!
साधन संसाधनों पर जिसकी जितनी हिस्सेदारी,वही वास्तविक लोकतंत्र का अधिकारी।
जय भीम, जय भारत, जय संविधान!

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक, ब्यावर (राजस्थान)
