लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
मानवता के इतिहास में तथागत बुद्ध का धम्म केवल एक आध्यात्मिक विचार नहीं, बल्कि एक संपूर्ण मनोवैज्ञानिक और सामाजिक क्रांति है। यह क्रांति किसी शस्त्र से नहीं, बल्कि शील और प्रज्ञा के शस्त्रों से घटित होती है।
आज जब समाज स्वार्थ, द्वेष और अज्ञानता के अंधकार में भटक रहा है, तब बुद्ध द्वारा प्रतिपादित ‘दस पारमिताएं’ (पूर्णताएं) वह प्रकाश स्तंभ हैं, जो हमें एक समतामूलक और प्रबुद्ध समाज की ओर ले जा सकती हैं।
प्रस्तावना
समकालीन संकट और बुद्ध का समाधान
आज का आधुनिक युग जहाँ एक ओर तकनीकी उन्नति की ऊंचाइयों को छू रहा है, वहीं दूसरी ओर मानवीय मूल्य, सामाजिक समरसता और व्यक्तिगत चरित्र का तेजी से ह्रास हो रहा है।
समाज में बढ़ती विषमता, जातिवाद और आर्थिक शोषण ने सामान्य जनमानस को कुंठित कर दिया है।
ऐसे संक्रमण काल में तथागत बुद्ध की ‘धम्मदेशना’ मात्र एक धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्निर्माण का एक वैज्ञानिक मार्ग है।
दस पारमिताओं का विस्तृत विश्लेषण
1. शील -नैतिक आत्मबल का आधार
शील का अर्थ केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि एक ऐसी अंतरात्मा का निर्माण है जो बुराई करने से लज्जित हो।
शील का अर्थ है नैतिक स्वभाव, अकुशल न करने की मनोवृत्ति और कुशल करने की मनोवृत्ति।
जब हम दंड के भय से नहीं, बल्कि अपनी नैतिकता के गौरव के कारण पाप कर्म से बचते हैं, तब ‘शील’ जागृत होता है।
2. दान – निस्वार्थ त्याग की पराकाष्ठा
दान का अर्थ है बदले में किसी भी प्रकार की आशा न करना।
आर्थिक दृष्टिकोण से
दान का अर्थ संसाधनों का न्यायोचित वितरण है।
जब हम अपने सामर्थ्य का एक हिस्सा समाज के उत्थान के लिए बिना किसी स्वार्थ के देते हैं, तो वह समाज में आर्थिक संतुलन पैदा करता है।
3. उपेक्षा – समत्व का संतुलन
उपेक्षा का अर्थ उदासीनता से भिन्न है। यह चित्त की वह अवस्था है जिसमें प्रिय-अप्रिय कुछ नहीं है।
फल कुछ भी हो, उससे निरपेक्ष रहना और लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना ही उपेक्षा है।
यह वह मानसिक संतुलन है जो हमें कठिन परिस्थितियों में भी टूटने नहीं देता।
4. नैस्क्रम्य- वासनाओं से मुक्ति
नैस्क्रम्य का अर्थ है सांसारिक काम-भोगों का त्याग।
जब तक मनुष्य केवल व्यक्तिगत सुखों में लिप्त रहता है, वह समाज के व्यापक उद्देश्यों को नहीं देख पाता।
नैस्क्रम्य हमें उच्च आदर्शों के लिए स्वयं को अनुशासित करना सिखाता है।
5. वीर्य -अडिग संकल्प की शक्ति
वीर्य का अर्थ है सम्यक प्रयत्न।
जो संकल्प एक बार कर लिया, उसे अपनी पूरी सामर्थ्य से करने का प्रयास करना और बिना उसे पूरा किए पीछे मुड़कर नहीं देखना।
यही वह शक्ति है जो बड़े-बड़े सामाजिक परिवर्तनों को
जन्म देती है।
6. क्षांति -क्षमाशीलता की महानता
क्षांति का अर्थ है क्षमाशीलता।
घृणा के बदले में घृणा न करना ही इसका सार है।
क्योंकि घृणा से कभी घृणा शांत नहीं होती, यह केवल क्षमाशीलता से ही शांत होती है।
यह वीर का आभूषण है, कमजोर का गुण नहीं।
7. सत्य -निष्कपट जीवन
सत्य का अर्थ है सत्यवादी होना।
आदमी को कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। वाणी, कर्म और विचार में एकरूपता ही सत्य है।
एक सत्यनिष्ठ समाज ही न्याय की मांग कर सकता है और शोषक व्यवस्थाओं को चुनौती दे सकता है।
8. अधिष्ठान-ध्येय के प्रति दृढ़ता
अधिष्ठान का अर्थ है अपने उद्देश्य तक पहुंचने का दृढ़ संकल्प।
यह वह आंतरिक शक्ति है जो सामाजिक और आर्थिक न्याय की लंबी लड़ाई में व्यक्ति को डिगने नहीं देती।
9. करुणा -वैश्विक संवेदना
करुणा का अर्थ है सभी प्राणियों के प्रति प्रेम-भरी भावना।
यह दूसरों के दुःख को दूर करने की सक्रिय इच्छा है।
एक सामाजिक चिंतक के रूप में, करुणा का अर्थ है ऐसी नीतियों का समर्थन करना जो दीन-दुखियों के आंसू पोंछ सकें।
10. मैत्री -भ्रातृत्व का विस्तार
मैत्री का अर्थ है सभी प्राणियों के प्रति भ्रातृत्व-भावना रखना, न केवल मित्रों के प्रति, बल्कि शत्रुओं के प्रति भी।
यह लोकतंत्र की सच्ची भावना है, जहाँ नफरत की जगह सहयोग और भाईचारा हो।
बहुजन समाज के लिए प्रेरणा
आज बहुजन समाज को इन दस पारमिताओं को अपने आचरण में उतारने की महती आवश्यकता है।
यदि हम आर्थिक रूप से सुदृढ़ और सामाजिक रूप से संगठित होना चाहते हैं, तो हमें अपने चरित्र को बुद्ध के इन मापदंडों पर कसना होगा।
मुख्य संदेश
शिक्षा और प्रज्ञा:
पारमिताओं का अभ्यास हमें प्रज्ञावान बनाता है।
संगठन और शील
शीलवान चरित्र ही मजबूत संगठन की नींव है।
आर्थिक स्वावलंबन
संसाधनों का सही उपयोग और सामाजिक सहयोग ही उत्थान का मार्ग है।
बुद्ध का मार्ग इसी धरती पर एक सुखी और न्यायपूर्ण समाज निर्माण का मार्ग है।
आइए, हम सब मिलकर बुद्ध के इस प्रकाश को जन-जन तक पहुंचाएं और एक प्रबुद्ध भारत का सपना साकार करें।
“अत्त दीपो भव” —
अपने दीपक स्वयं बनें।
सभ्वे सत्ता सुखी होन्तु
(सभी प्राणी सुखी हों)

लेखक
सोहन लाल सिंगारिया सामाजिक-आर्थिक चिन्तक ब्यावर राजस्थान
