
(एक ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक एवं दार्शनिक महा-आलेख)
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
“खुद जलकर जो जग को रोशन करता है हर क्षण-क्षण, ऐसे महान शिक्षकों को कोटि-कोटि नमन, कोटि-कोटि नमन।
भाग 1
दार्शनिक एवं ऐतिहासिक मीमांसा, अंधकार से प्रज्ञा की ओर महायात्रा
मानव सभ्यता का संपूर्ण ज्ञात इतिहास मूलतः अज्ञान से ज्ञान, पशुता से मानवता और परतंत्रता से मुक्ति की ओर अग्रसर होने का इतिहास है।
पाषाण युगीन बर्बरता, कंदराओं की असुरक्षा और प्रकृति के अंध अंधविश्वासों से निकलकर जब मानव ने समाज, संस्कृति, नियम, दर्शन, विज्ञान और शासन-व्यवस्थाओं का निर्माण किया, तो उस युगांतरकारी क्रांति की धुरी कोई राजसत्ता, धनपति या बाहुबली नहीं था।
उस संपूर्ण विकास-यात्रा का वास्तविक चालक वह विचारशील मार्गदर्शक था, जिसे लोक-परंपरा और मानवीय चेतना में ‘शिक्षक’ कहा गया।
संसार में तलवारों के दम पर साम्राज्य स्थापित करने वाले राजाओं, शहंशाहों और विजेताओं के नाम समय के थपेड़ों में विलीन हो गए।
सिकंदर, चंगेज खान, सीज़र या नेपोलियन की विजय-गाथाएँ आज संग्रहालयों की धूल फांक रही हैं, किंतु तथागत बुद्ध, सुकरात, सावित्रीबाई फुले, कबीर, संत रैदास, ज्योतिराव फुले और बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा चेतना में बोए गए ज्ञान के बीज आज सहस्राब्दियों बाद भी करोड़ों मनुष्यों के अंतःकरण को आलोकित कर रहे हैं।
शिक्षक किसी भौतिक साम्राज्य का निर्माता नहीं होता; वह मनुष्य के अंतःकरण का शिल्पी होता है।
वह केवल वर्णमाला के अक्षरों को जोड़ना नहीं सिखाता, बल्कि वह उस विवेक और आत्मसम्मान के कपाट को खोलता है, जिसके खुलते ही एक असहाय और शोषित व्यक्ति अपनी नागरिक सत्ता और मानवीय अधिकारों को पहचानने लगता है।
भौतिक संपदा का क्षय निश्चित है, पद और प्रतिष्ठा की सीमा तय है, किंतु एक समर्पित शिक्षक द्वारा शिष्य के हृदय में रोपा गया विचार, बोया गया संस्कार और फूंका गया स्वाभिमान कभी समाप्त नहीं होता।
वह विचार पीढ़ियों से होकर शताब्दियों तक मानवीय चेतना में अमर रहता है।
इसीलिए संसार में शिक्षक से बढ़कर न कोई पद है, न कोई विचार और न ही कोई शक्ति।
भाग 2
बहुजन वैचारिक चेतना, समतावादी संत परंपरा और क्रांति के अग्रदूत
भारतीय उपमहाद्वीप में शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं रही, बल्कि यह मानवीय गरिमा, आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा मुक्ति-संग्राम रही है।
जब एक विराट बहुजन समाज (शूद्रों, अतिशूद्रों, आदिवासियों और समस्त नारी शक्ति) को ज्ञान, अक्षरों और मानवीय अधिकारों से वंचित किया गया, तब बहुजन परंपरा के संतों, विचारकों और शिक्षकों ने शिक्षा को मुक्ति का अचूक हथियार बनाकर सामाजिक क्रांति की नींव रखी।
1.तथागत गौतम बुद्ध: प्रज्ञा, शील और करुणा के वैश्विक महाशिक्षक
तथागत बुद्ध ने ‘अत्त दीपो भव’ (अपना दीपक स्वयं बनो) का कालजयी उद्घोष कर अंधविश्वास, कर्मकांड और जन्मना श्रेष्ठता के अहंकार को ध्वस्त कर दिया।
बुद्ध ने राजदरबारों की संकीर्ण भाषा को छोड़कर जनसाधारण की लोकभाषा ‘पाली’ में संवाद किया।
उन्होंने नालंदा, तक्षशिला और वल्लभी जैसी ज्ञान-पीठों की वैचारिक आधारशिला रखी, जहाँ बिना किसी जाति, वर्ण या देश के भेद के संपूर्ण विश्व से शिक्षार्थी ज्ञान की खोज में आते थे।
बुद्ध ने मानव चेतना को सिखाया कि किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार मत करो कि वह किसी प्राचीन ग्रंथ में लिखी है या किसी शक्तिशाली ने कही है; उसे अपनी बुद्धि और तर्क की कसौटी पर परखो।
बुद्ध मानव जाति के पहले ऐसे वैज्ञानिक शिक्षक थे जिन्होंने अंधविश्वास की जगह ‘कार्य-कारण सिद्धांत’ (प्रतीत्यसमुत्पाद) की स्थापना की।
- संत तिरुवल्लुवर, सार्वभौमिक जीवन-मूल्यों और सदाचार के शिक्षक
दक्षिण भारत के महान संत तिरुवल्लुवर ने ‘तिरुक्कुरल’ के माध्यम से मानवता को ऐसा नैतिक और व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया जो देश और काल की सीमाओं से परे है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई आपके साथ बुरा व्यवहार भी करे, तो भी उसके साथ श्रेष्ठ और कल्याणकारी व्यवहार करना ही सर्वोच्च मानवीय आचरण है।
तिरुवल्लुवर ने श्रम, सदाचार और समता को शिक्षा का प्राण माना।
3.संत कबीर:
पाखंड और जाति-व्यवस्था पर प्रहार करने वाले निर्भीक गुरु
मध्यकाल के घोर अंधकार और पाखंड के दौर में संत कबीर ने जनमानस के निर्भीक शिक्षक की भूमिका निभाई।
उन्होंने धर्म के ठेकेदारों, बाह्याडंबरों और छुआछूत की संकीर्णता पर सीधा प्रहार किया:
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ,
पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का,
पढ़े सो पंडित होय।।
कबीर की दृष्टि में सच्चा गुरु वही है जो शिष्य के भीतर के अहंकार को समाप्त कर उसमें मानवीय प्रेम, समता और आत्मबोध का संचार करे
गुरु गोविंद दोउ खड़े,
काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने,
गोविंद दियो बताय।।
4.संत शिरोमणि रविदास (रैदास): ‘बेगमपुरा’ की समतामूलक संकल्पना
संत रैदास ने वर्ण-व्यवस्था और ऊँच-नीच के घृणित तंत्र को चुनौती देते हुए एक ऐसे लोकतांत्रिक समाज की परिकल्पना की जिसे उन्होंने ‘बेगमपुरा’ (दुःख-दर्द से रहित नगर) कहा
“बेगम पुरा सहर को नाउँ।
दुख-अंदोहु नहीं तिहि ठाउँ।।
संत रैदास ने श्रम को सर्वोच्च प्रतिष्ठा दी और यह सिद्ध किया कि ज्ञान किसी जाति विशेष की बपौती नहीं है।
मन की पवित्रता और कर्म की शुद्धता ही सच्ची शिक्षा है: “मन चंगा तो कठौती में गंगा।”
संत रैदास का चिंतन आज के प्रत्येक शिक्षक के लिए सामाजिक समता का सर्वोच्च पाठ है।
5.संत तुकाराम एवं संत चोखामेला:
मानवीय अस्मिता की अमर वाणी
महाराष्ट्र की पावन भूमि पर संत तुकाराम और संत चोखामेला ने जनभाषा मराठी में अपने अभंगों के माध्यम से पुरोहितवादी शोषण और सामाजिक गैर-बराबरी पर चोट की।
बहिष्कृत जीवन के बावजूद संत चोखामेला ने आत्मिक ज्ञान और समता की जो मिसाल पेश की, उसने यह सिद्ध किया कि ज्ञान की कोई संकीर्ण सीमा नहीं हो सकती।
संत तुकाराम ने जनसाधारण को सिखाया कि दीन-दुखियों की सेवा ही वास्तविक ईश्वर-सेवा और सच्ची शिक्षा है।
6.राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिराव फुले: आधुनिक भारत में सामाजिक क्रांति के जनक
आधुनिक भारत में बहुजन समाज और महिलाओं के लिए शिक्षा का द्वार खोलने वाले युगपुरुष महात्मा ज्योतिराव फुले थे।
महात्मा फुले ने सामाजिक ग़ुलामी की जड़ को एक ही छंद में स्पष्ट कर दिया
“विद्या बिन मति गई,
मति बिन नीति गई,
नीति बिन गति गई,
गति बिन वित्त गया,
वित्त बिन शूद्र टूटे,
इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए।
महात्मा फुले ने पहचाना कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो शूद्रों, अतिशूद्रों और नारियों की ग़ुलामी के तालों को खोल सकती है।
उन्होंने 1 जनवरी 1848 को पुणे के भिड़े वाड़ा में भारत का पहला बालिका विद्यालय स्थापित कर रूढ़िवादी ताकतों को खुली चुनौती दी।
महात्मा फुले केवल एक विचारक नहीं थे; वे एक क्रांतिकारी शिक्षक थे जिन्होंने धमकियों और सामाजिक बहिष्कार को झेलते हुए भी बहुजन शिक्षा की मशाल जलाई।
7.क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले: भारत की प्रथम महिला शिक्षिका
जब माता सावित्रीबाई फुले वंचित बालिकाओं को पढ़ाने के लिए घर से निकलती थीं, तो संकीर्ण मानसिकता वाले लोग उन पर गोबर, कीचड़ और पत्थर फेंकते थे।
वे रास्ते में अपमान सहती थीं, किंतु अपने थैले में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर जाती थीं और विद्यालय पहुँचकर गंदी साड़ी बदलकर बच्चियों को पूरे वात्सल्य और निष्ठा से पढ़ाती थीं।
सावित्रीबाई फुले का संदेश आज भी प्रत्येक शिक्षक और शिक्षार्थी के हृदय में गूंजता है:
“जाओ, शिक्षा प्राप्त करो,आत्मनिर्भर बनो, मेहनती बनो, काम करो—ज्ञान और धन इकट्ठा करो,बिना ज्ञान के सब खो जाता है।
सावित्रीबाई फुले ने न केवल पढ़ाया, बल्कि बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की, अकाल पीड़ितों की सेवा की और 1897 में प्लेग महामारी के समय मरीजों की सेवा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
उनके साथ प्रथम मुस्लिम शिक्षिका फातिमा शेख का अदम्य सहयोग और त्याग भी शिक्षक इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है।
8.छत्रपति राजर्षि शाहूजी महाराज: बहुजन शिक्षा के शासकीय संरक्षक कोल्हापुर रियासत के दूरदर्शी नरेश छत्रपति शाहूजी महाराज ने महात्मा फुले के शैक्षिक दर्शन को शासकीय स्तर पर लागू किया।
उन्होंने वर्ष 1912 में अपनी रियासत में प्राथमिक शिक्षा को ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य’ घोषित कर दिया। उन्होंने विभिन्न वंचित, पिछड़े और उपेक्षित वर्गों के विद्यार्थियों के लिए छात्रावासों का जाल बिछाया, छात्रवृत्तियाँ दीं और नौकरियों में आरक्षण का ऐतिहासिक प्रावधान किया।
9.राष्ट्रसंत गाडगे महाराज
श्रम और शिक्षा से समाज-सुधार की पाठशाला
राष्ट्रसंत गाडगे बाबा ने अपने हाथ में झाड़ू लेकर न केवल गाँवों और नगरों की भौतिक गंदगी को साफ किया, बल्कि समाज के मानस में जमी अंधविश्वास, अशिक्षा और नशे की गंदगी को भी बुहार दिया।
गाडगे बाबा भिक्षा माँगकर जो धन एकत्र करते थे, उससे मंदिर नहीं, बल्कि विद्यालय, छात्रावास, धर्मशालाएँ और अस्पताल बनवाते थे।
गाडगे बाबा का विचार आज प्रत्येक शिक्षक के मानस में अंकित होना चाहिए
“यदि खाने की थाली न हो तो हाथ पर खा लो, कपड़े फटे हों तो फटे कपड़ों को सील कर पहन लो, रहने को झोपड़ी न हो तो खुले में रह लो;
किंतु अपने बच्चों को बिना पढ़ाए मत छोड़ो। शिक्षा ही मनुष्य को मनुष्य बनाती है।
10.बोधिसत्व डॉ. भीमराव अम्बेडकर: ज्ञान के प्रतीक (Symbol of Knowledge) और संविधान निर्माता
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का समूचा जीवन इस बात का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण है, कि शिक्षा किस प्रकार एक व्यक्ति को अभावों, तिरस्कार और सामाजिक बहिष्करण के गहन गर्त से निकालकर विश्व के पटल पर ज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर सकती है।
बाबा साहेब ने कहा था:
“शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो पिएगा वह दहाड़ेगा। “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।
डॉ. अम्बेडकर स्वयं एक प्रकांड विद्वान, अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता, समाजशास्त्री और शिक्षक थे।
उन्होंने मुंबई के सिडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। जब उन्होंने स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण किया, तो उन्होंने शिक्षा, समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय को राष्ट्र की आत्मा बना दिया।
बाबा साहेब ने वंचित वर्ग के विद्यार्थियों के लिए ‘पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना की और सिद्धार्थ कॉलेज तथा मिलिंद कॉलेज जैसे महान शिक्षण संस्थान स्थापित किए।
भाग 3
मानव जीवन के हर क्षेत्र में शिक्षक की उपस्थिति एवं महिमा
जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं, ज्ञान की ऐसी कोई शाखा नहीं और समाज का ऐसा कोई पद नहीं, जो शिक्षक के मार्गदर्शन के बिना संभव हो सका हो।
प्राथमिक एवं बुनियादी शिक्षा
अबोध बालक को अक्षरों, संख्याओं और मानवीय संवेदनाओं का बोध कराना, जिससे सामाजिक समरसता और सीखने की बुनियादी नींव का निर्माण होता है।
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य
जटिल शल्य-चिकित्सा, एनाटॉमी, पैथोलॉजी और जन-स्वास्थ्य का गहन प्रशिक्षण, जिससे जीवनरक्षा, महामारी निवारण और स्वस्थ समाज का सृजन होता है।
रक्षा एवं सैन्य तंत्र
सामरिक रणनीति, हथियार संचालन, अनुशासन और राष्ट्र-रक्षा का प्रशिक्षण, जिससे सीमाओं की अभेद्य सुरक्षा और देश की संप्रभुता सुरक्षित रहती है।
विमानन एवं अंतरिक्ष
(Aviation & Space)
वैमानिकी (Aerodynamics), सिमुलेशन, नेविगेशन और उपग्रह प्रक्षेपण की शिक्षा, जिससे अंतरिक्ष अन्वेषण, चंद्रयान-मंगलयान मिशन और सुरक्षित हवाई यात्रा संभव होती है।
न्यायपालिका एवं विधि
संविधान की मूल भावना, विधिशास्त्र, मानवाधिकार और न्याय के सिद्धांतों का शिक्षण, जिससे कानून के शासन की स्थापना और नागरिक अधिकारों की रक्षा होती है।
सूचना प्रौद्योगिकी एवं ए.आई.
एल्गोरिदम, कोडिंग, डेटा साइंस, रोबोटिक्स और साइबर सुरक्षा का ज्ञान, जिससे डिजिटल क्रांति और वैश्विक तकनीकी नेतृत्व संभव होता है।
कृषि, शिल्प एवं श्रम
आधुनिक कृषि पद्धतियाँ, मृदा परीक्षण, यांत्रिकी और हस्तशिल्प का व्यावहारिक ज्ञान, जिससे अन्न सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संबल और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित होती है।
भाग 4
समकालीन यथार्थ — बहुजन समाज, सरकारी विद्यालय और शिक्षक का संघर्ष
आज जब हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, तब भारत की शिक्षा व्यवस्था का सामाजिक-आर्थिक धरातल अत्यंत विचारणीय है।
सरकारी विद्यालयों की वास्तविक रीढ़: बहुजन समाज के 90% से अधिक नौनिहाल राजस्थान सहित संपूर्ण भारत के ग्रामीण, कस्बाई और दुर्गम क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों में अध्ययनरत विद्यार्थियों में से 90% से अधिक बच्चे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), विशेष पिछड़ा वर्ग और अत्यंत गरीब अल्पसंख्यक परिवारों से आते हैं।
ये वे बच्चे हैं जिनके पास महँगे निजी विद्यालयों, कॉर्पोरेट कोचिंग संस्थानों या वातानुकूलित डिजिटल कक्षाओं में जाने के आर्थिक साधन नहीं हैं।
इन बच्चों के लिए सरकारी विद्यालय केवल एक भवन नहीं है; यह सामाजिक बराबरी हासिल करने का एकमात्र मंदिर है।
उनके लिए सरकारी शिक्षक केवल एक कर्मचारी नहीं है; वह उनके जीवन का भाग्य-विधाता है, जो उन्हें पीढ़ियों की गरीबी, निरक्षरता और उपेक्षा से निकालकर सम्मान जनक जीवन दिला सकता है।
शिक्षक की सामाजिक-प्रशासनिक पीड़ा: गैर-शैक्षणिक कार्यों का अंबार
किंतु आज सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों के समक्ष सबसे बड़ा संकट क्या है?
आज का शिक्षक पढ़ाना चाहता है, वह वंचित बच्चों का जीवन संवारना चाहता है, परंतु व्यवस्था ने उसके दोनों हाथ बाँध दिए हैं।
शिक्षक को एक ‘अकादमिक शिल्पी’ के बजाय एक ‘प्रशासनिक बहुउद्देशीय कर्मचारी’ बना दिया गया है
बीएलओ एवं निर्वाचन कार्य
वर्ष भर मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण, घर-घर सत्यापन, फॉर्म 6, 7, 8 भरना और चुनावों में निरंतर व्यस्तता।
अंतहीन विभागीय ऑनलाइन पोर्टल्स एवं डेटा एंट्री
शाला दर्पण, यू-डाइस (UDISE+), छात्रवृत्ति, पोशाक वितरण, आधार सत्यापन, अपार आईडी जैसी दर्जनों पोर्टल्स पर दिन-रात लिपिकीय कार्य।
विभिन्न प्रकार के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण: पशुगणना, आर्थिक सर्वेक्षण, आवास सर्वेक्षण, राशन कार्ड सत्यापन से लेकर स्थानीय प्रशासन के विभिन्न सर्वे।
मिड-डे मील (पोषाहार) की
दैनिक उलझनें
राशन तौलना, गैस सिलेंडर की व्यवस्था, रसोइयों का मानदेय, दैनिक उपस्थिति के एसएमएस और रजिस्टर संधारण।
गैर-शैक्षणिक अभियानों की
लंबी कतार,रैलियाँ, उत्सव, खेलकूद के कागजी आयोजन, प्रशासनिक बैठकें और रिपोर्टिंग।
जब शिक्षक का 70% समय और ऊर्जा कागजी खानापूर्ति, मोबाइल स्क्रीन पर डेटा भरने और प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करने में नष्ट हो जाएगी, तो वह कक्षा में बैठे उस गरीब बच्चे को कब और कैसे पढ़ाएगा जो घर से पहली बार स्लेट-पेंसिल लेकर आया है?
भाग 5
वैश्विक परिप्रेक्ष्य-विकसित देशों की नीतियाँ और भारत के लिए सबक
यदि हम विश्व के उन देशों का अध्ययन करें जो आज शिक्षा, विज्ञान, नवाचार और खुशहाली में शीर्ष पर हैं (जैसे फ़िनलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, जर्मनी)
फ़िनलैंड का मॉडल
फ़िनलैंड में शिक्षक को समाज में वही दर्जा और स्वायत्तता प्राप्त है जो एक वरिष्ठ डॉक्टर या वैज्ञानिक को मिलती है।
वहाँ शिक्षकों से कोई भी गैर-शैक्षणिक कार्य नहीं कराया जाता।
उनका संपूर्ण ध्यान केवल शिक्षण पद्धति, बच्चों के मानसिक विकास और नवाचार पर केंद्रित रहता है।
जापान की परंपरा
जापान में यह कहावत प्रचलित है कि “सम्राट भी शिक्षक के आगे सिर झुकाता है, क्योंकि शिक्षक के बिना सम्राट का निर्माण संभव नहीं था।
वहाँ शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों से पूरी तरह
मुक्त रखा जाता है।
भारत का अतीत और वर्तमान विसंगति
भारत तक्षशिला और नालंदा की भूमि रहा है।
यदि भारत को पुनः विश्व गुरु के सिंहासन पर आसीन होना है, तो वह केवल नारों, भाषणों या कागजी नीतियों से संभव नहीं होगा। उसके लिए भारत के शिक्षक को वही सम्मान, वही स्वतंत्रता और वही एकाग्रता देनी होगी जो नालंदा और तक्षशिला के आचार्यों को प्राप्त थी।
भाग 6
ऐतिहासिक आह्वान-भारत को विश्व गुरु बनाने का एकमात्र अचूक मार्ग
यदि केंद्र और राज्य सरकारें वास्तव में राष्ट्र का कायाकल्प करना चाहती हैं, यदि वे वास्तव में बहुजन समाज के 90% बच्चों का भविष्य उज्ज्वल करना चाहती हैं, तो उन्हें बिना किसी विलंब के एक ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय लेना होगा
एकल-सूत्रीय राष्ट्रीय संकल्प
सरकारी शिक्षक को बीएलओ, डेटा एंट्री, सर्वेक्षण और पोषाहार प्रबंधन सहित तमाम गैर-शैक्षणिक कार्यों से शत-प्रतिशत मुक्त किया जाए और उन्हें केवल और केवल ‘अध्यापन एवं विद्यार्थी-निर्माण’ का पवित्र कार्य सौंपा जाए।
यदि शिक्षक को केवल पढ़ाने दिया जाए, तो क्या चमत्कार होगा?
सरकारी विद्यालयों का कायाकल्प
निजी कोचिंग संस्थानों और महँगे स्कूलों पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी। सरकारी विद्यालयों से ऐसे वैज्ञानिक, गणितज्ञ, दार्शनिक और नीति-निर्माता निकलेंगे जो दुनिया का नेतृत्व करेंगे।
बहुजन समाज का तीव्र उत्थान
बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का सपना तब साकार होगा जब गाँव-ढाणी के अंतिम छोर पर बैठे निर्धन दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के बच्चे गुणवत्तापूर्ण आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त कर प्रशासनिक सेवाओं, न्यायपालिका, अंतरिक्ष अनुसंधान और तकनीकी जगत के शीर्ष पर पहुँचेंगे।
शिक्षा में समता और बंधुत्व
जाति, धर्म और वर्ग के भेद स्वतः समाप्त हो जाएंगे जब समतावादी सिद्धांतों पर आधारित सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली मजबूत होगी।
भारत की आर्थिक एवं तकनीकी महाशक्ति के रूप में पुनर्स्थापना
एक सुशिक्षित, तार्किक और कुशल युवा पीढ़ी ही भारत को वैश्विक आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और तकनीकी पिछड़ेपन से निकालकर ‘ज्ञान अर्थव्यवस्था
‘ (Knowledge Economy)
का सिरमौर बना सकती है।
भाग 7
उपसंहार-कलम की ताकत और शिक्षक की अमर गरिमा
शिक्षक दिवस केवल प्रतिवर्ष 5 सितंबर को औपचारिक फूल-मालाएँ पहनाने, भाषण देने या सोशल मीडिया पर
बधाई संदेश साझा करने का रस्मिया उत्सव नहीं है।
यह आत्म-मंथन का दिन है।
यह उस मूक कर्मयोगी के त्याग, उसकी तपस्या, उसकी पीड़ा और उसके अवदान को नमन करने का दिन है।
अफगानिस्तान के भूमिगत विद्यालयों में तालिबान की बंदूकों के साए में बच्चियों को पढ़ाने वाले शिक्षक नजीब ने ठीक ही कहा था, “तुम्हारी पहचान तुम्हारी बंदूक हो सकती है, किंतु मेरी पहचान और मेरी ताकत मेरी कलम है।
कलम की ताकत दुनिया की किसी भी मिसाइल, तोप या परमाणु बम से अधिक विध्वंसक और अधिक सृजनशील होती है।
मिसाइलें शहरों को नष्ट करती हैं, किंतु एक शिक्षक की कलम नष्ट हुए समाजों में नवजीवन का संचार करती है।
“न तन की चिंता, न धन की चाह, कर्तव्य जिसे प्यारा है,
हर बच्चे का उज्ज्वल भविष्य ही, उसका सच्चा सहारा है।
सम्मान मिले इस कर्मयोगी को, यही हमारा नारा है, ज्ञान-ज्योति का अमर पुजारी, शिक्षक राष्ट्र का तारा है।
समस्त महापुरुषों, तथागत बुद्ध, संत कबीर, संत तिरुवल्लुवर, संत रैदास, संत तुकाराम, महात्मा ज्योतिराव फुले, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले, माता फातिमा शेख, छत्रपति शाहूजी महाराज, राष्ट्रसंत गाडगे बाबा और बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के चरणों में कोटि-कोटि नमन करते हुए हम देश के समस्त शिक्षकों के अदम्य साहस, निस्वार्थ साधना, सामाजिक समर्पण और राष्ट्र-निर्माण को शत्-शत् नमन करते हैं!
जय भीम! जय जोहार! जय शिक्षक! जय भारत!
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
प्राचार्य (RES)
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक,
ब्यावर-94622-60179
प्रदेश उपसभाध्यक्ष,
राजस्थान शिक्षक संघ अम्बेडकर
