(भाग–1 : जहाँ मैंने प्रेम को पूजा समझा था)
“विवाह सिर्फ़ सात फेरों का नाम नहीं… यह पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला होता है।” यह वाक्य मैंने पहली बार किसी पुस्तक में पढ़ा था, लेकिन उसे मैंने केवल पढ़ा नहीं, अपने जीवन का विश्वास बना लिया था। मुझे लगता था कि विवाह दो लोगों का साथ भर नहीं होता, बल्कि दो अधूरी यात्राओं का मिलन होता है। यदि जीवनसाथी सही मिल जाए तो अभाव भी आशीर्वाद लगने लगते हैं, और यदि साथ देने वाला हाथ सच्चा हो तो संसार की सबसे कठिन राह भी सरल हो जाती है। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि विवाह सचमुच एक ऐसा निर्णय है, जिसमें केवल प्रेम नहीं, धैर्य, संवाद, संस्कार, परिस्थितियाँ और समय—सबकी परीक्षा होती है।
मैं एक बहुजन वंचित परिवार में जन्मी। मेरे हिस्से में विरासत के रूप में कोई ज़मीन-जायदाद नहीं आई; विरासत में मिला संघर्ष, आत्मसम्मान की लड़ाई और हर मोड़ पर स्वयं को सिद्ध करने का दायित्व। बचपन से ही मैंने देखा कि कुछ लोगों के लिए सम्मान जन्म के साथ आता है, और कुछ लोगों को सम्मान पाने के लिए पूरी ज़िंदगी लगानी पड़ती है। स्कूल में पढ़ते समय कई बार मुझे महसूस हुआ कि मेरी पहचान मेरी प्रतिभा से पहले देखी जाती है। कॉलेज पहुँची तो लगा कि शिक्षा ने मेरे विचारों को उड़ान दी है, लेकिन समाज की अनेक दीवारें अभी भी वहीं खड़ी हैं। एक स्त्री होने का संघर्ष अलग था, और वंचित समाज से आने का संघर्ष अलग। कई बार लगता था कि मैं एक साथ दो पहाड़ ढो रही हूँ।
शायद इसी कारण मैंने बचपन में ही सीख लिया था कि रोने से पहले मुस्कुराना पड़ता है। मैंने अपने भीतर एक ऐसा मौन बसाना शुरू कर दिया जो बाहर से शांत दिखाई देता था, लेकिन भीतर अनगिनत प्रश्नों से भरा हुआ था। समय के साथ समझ में आया कि हर खामोशी हार नहीं होती। कई बार मनुष्य इसलिए भी चुप रहता है क्योंकि शब्द उसके दर्द का बोझ नहीं उठा पाते। उस मौन ने मुझे सहना सिखाया, लेकिन उसी मौन ने मुझे भीतर से अकेला भी कर दिया। आज सोचती हूँ कि यदि उस समय कोई मेरे मन को पढ़ लेता, तो शायद मैं जीवन को थोड़ा अलग नज़रिए से देखती।
जब विवाह का प्रस्ताव आया तो मेरे मन में कोई महल या वैभव नहीं था। मेरी केवल एक इच्छा थी—मुझे ऐसा साथी मिले जिसके सामने मुझे अपने आँसू छिपाने न पड़ें। मैं प्रेम को अधिकार नहीं, समर्पण मानती थी। मेरा विश्वास था कि वफ़ादारी किसी भी रिश्ते की सबसे बड़ी पूँजी होती है। यदि दो लोग एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहें, तो जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियाँ भी उन्हें अलग नहीं कर सकतीं। मैंने निश्चय किया था कि चाहे जैसे हालात हों, मैं अपने रिश्ते को पूरी निष्ठा से निभाऊँगी। क्योंकि मुझे बचपन से यही संस्कार मिले थे कि चरित्र और नीयत कभी व्यर्थ नहीं जाते, चाहे रिश्ते हमारी इच्छा के अनुसार चलें या नहीं।
विवाह के शुरुआती दिन सचमुच किसी मधुर गीत जैसे थे। मुझे लगा कि मेरी लंबी यात्रा को अब एक ठिकाना मिल गया है। मेरे पति मेहनती थे, जिम्मेदार थे और अपने संघर्षों से लड़ते हुए यहाँ तक पहुँचे थे। मैं उनके व्यक्तित्व का सम्मान करती थी। मुझे उनके भीतर एक गहरी चुप्पी दिखाई देती थी। उस समय मैं उसे गंभीरता समझती थी, बाद में समझ पाई कि वह उनके जीवन के संघर्षों की परछाईं भी थी। मैं अपने पूरे मन से उनसे जुड़ गई। शायद स्त्री का प्रेम ऐसा ही होता है—वह केवल किसी व्यक्ति से नहीं, उसके पूरे जीवन से प्रेम करने लगती है। उसकी खुशियाँ अपनी हो जाती हैं, उसके दुःख अपनी प्रार्थनाएँ बन जाते हैं। यह मेरा अनुभव है; हो सकता है हर स्त्री का अनुभव अलग हो। लेकिन मैंने प्रेम किया तो अपने पूरे अस्तित्व से किया।
समय धीरे-धीरे बदलने लगा। हमारे जीवन में भी मोबाइल और सोशल मीडिया ने प्रवेश किया। अब दुनिया हमारी हथेली में थी। हर दिन किसी की मुस्कुराती हुई तस्वीर, किसी का आदर्श दांपत्य, किसी की विदेश यात्रा, किसी की प्रेम-कहानी आँखों के सामने होती। कई बार अनजाने में मैं भी अपने जीवन की तुलना उन चमकती तस्वीरों से करने लगी। बाद में समझ में आया कि तस्वीरें जीवन का केवल उजला हिस्सा दिखाती हैं, संघर्ष नहीं। लेकिन तब तक तुलना मन में जगह बना चुकी थी। शायद यही वह समय था जब हमारे बीच पहली अदृश्य दूरी पैदा हुई। वे अपनी जिम्मेदारियों में और अधिक डूबते गए, और मैं अपने मन की अनकही अपेक्षाओं में।
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है कि हमारी सबसे बड़ी कमी प्रेम की नहीं थी, संवाद की थी। मैं चाहती थी कि वे मेरे मन की आवाज़ सुनें, और शायद वे चाहते थे कि मैं उनकी खामोशी को समझूँ। हम दोनों अपने-अपने तरीके से सही थे। कई बार आज भी मन कहता है—”शायद हम दोनों सही होकर भी एक-दूसरे के लिए सही नहीं थे।” लेकिन उस समय यह समझ कहाँ थी? तब तो हर छोटी दूरी केवल शिकायत बनकर दिखाई देती थी। किसी ने सच ही कहा है कि गलत रिश्ता मनुष्य को एक दिन में नहीं तोड़ता; वह हर दिन थोड़ा-थोड़ा भीतर से खाली करता है। तब भी मैं अपने रिश्ते को बचाए रखने के लिए वफ़ादारी का हाथ नहीं छोड़ना चाहती थी। मुझे विश्वास था कि प्रेम हार सकता है, परिस्थितियाँ जीत सकती हैं, लेकिन सच्ची नीयत कभी हारती नहीं।
आज जब उन दिनों को याद करती हूँ तो मेरे भीतर हल्की-सी उदासी उतर आती है। वह उदासी किसी व्यक्ति से शिकायत की नहीं, बल्कि उन अधूरे सपनों की है जिन्हें हमने मिलकर देखा था। तब कहाँ मालूम था कि जीवन की सबसे कठिन लड़ाइयाँ बाहर के समाज से नहीं, कभी-कभी अपने ही घर की खामोशियों से भी लड़नी पड़ती हैं। फिर भी उस समय मेरे मन में उम्मीद जीवित थी। मुझे विश्वास था कि एक दिन हम दोनों बैठेंगे, खुलकर बात करेंगे और हर गलतफ़हमी पिघल जाएगी। मुझे क्या पता था कि कुछ कहानियाँ टूटती नहीं, धीरे-धीरे मौन में बदल जाती हैं… और कुछ रिश्ते समाप्त होने से पहले ही भीतर कहीं उदासी का स्थायी घर बना लेते हैं।
(भाग–2 : जब प्रेम था, पर हम एक-दूसरे तक पहुँच नहीं सके)
विवाह के कुछ वर्षों बाद मुझे महसूस होने लगा कि जीवन वैसा नहीं रहता जैसा विवाह के पहले दिन दिखाई देता है। जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं और धीरे-धीरे इंसान भी बदलने लगता है। पहले जो बातें मुस्कुराकर टल जाती थीं, वही बाद में बहस का कारण बनने लगीं। पहले जिन खामोशियों में अपनापन महसूस होता था, वही खामोशियाँ अब दूरी का एहसास कराने लगीं। मैं कई बार उनके सामने बैठती और चाहती कि वे बिना मेरे कुछ कहे मेरे चेहरे को पढ़ लें। लेकिन वे दिनभर के संघर्ष से इतने थके होते कि शायद उनके भीतर भी शब्द बचते ही नहीं थे। उस समय मुझे लगता था कि वे मुझे समझना नहीं चाहते। आज सोचती हूँ, शायद वे स्वयं को ही समझाने में लगे हुए थे।
मैंने अक्सर यह महसूस किया कि एक स्त्री का मन प्रेम को केवल जिम्मेदारियों में नहीं, बल्कि उपस्थिति में भी खोजता है। उसे यह विश्वास चाहिए होता है कि कोई उसकी बातें बिना थके सुन ले, उसके डर को गंभीरता से ले, उसकी छोटी-छोटी खुशियों में भी सहभागी बने। मैं यह नहीं कहती कि हर स्त्री ऐसी होती है, यह केवल मेरी अपनी अनुभूति है। मेरा मन चाहता था कि वे कभी यूँ ही मेरा हाथ पकड़कर पूछ लें—”तुम सच में कैसी हो?” शायद मैं उसी एक प्रश्न की प्रतीक्षा करती रह गई। दूसरी ओर वे यह मानकर चलते रहे कि घर की जिम्मेदारियाँ निभाना ही प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण है। उनके लिए त्याग प्रेम था, और मेरे लिए संवाद प्रेम था। हम दोनों प्रेम कर रहे थे, लेकिन प्रेम की परिभाषाएँ अलग-अलग थीं।
सोशल मीडिया का प्रभाव धीरे-धीरे हमारे घर तक भी पहुँच गया। वहाँ हर दिन आदर्श रिश्तों की तस्वीरें दिखाई देती थीं। कोई पति अपनी पत्नी के लिए कविता लिख रहा था, कोई पत्नी अपने पति के साथ मुस्कुराती हुई तस्वीरें साझा कर रही थी। कभी-कभी मैं भी उन चित्रों को देखकर सोचती—”क्या मेरे जीवन में कुछ कमी है?” आज समझती हूँ कि उन तस्वीरों के पीछे का संघर्ष दिखाई नहीं देता था। लेकिन उस समय तुलना मेरे मन में घर कर चुकी थी। मैं उनसे शिकायत करने लगी और वे मेरी शिकायतों को अपनी असफलता समझने लगे। शायद हम दोनों भूल गए थे कि किसी भी रिश्ते की तुलना किसी दूसरे रिश्ते से नहीं की जा सकती, क्योंकि हर घर की कहानी अलग होती है।
धीरे-धीरे हमारे बीच संवाद कम होने लगा। पहले हम हर बात साझा करते थे, फिर केवल ज़रूरी बातें होने लगीं और अंत में कई दिन ऐसे गुजरने लगे जब एक ही घर में रहते हुए भी हमारे बीच केवल औपचारिक शब्द रह गए। बाहर से देखने वाले कहते—”तुम दोनों तो बहुत अच्छे लगते हो।” मैं मुस्कुरा देती थी। वे भी मुस्कुरा देते थे। लेकिन उस मुस्कान के पीछे कितनी थकान थी, यह कोई नहीं जानता था। सच तो यह है कि घर के भीतर के घाव सबसे कम दिखाई देते हैं। वे शोर नहीं करते, लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य को भीतर से खोखला कर देते हैं।
कई रातें ऐसी बीतीं जब मैं तकिए में मुँह छिपाकर रोती रही। सुबह आईने के सामने खड़ी होकर मुस्कुरा लेती और दुनिया से कह देती—”मैं ठीक हूँ।” शायद हर टूटते रिश्ते की यही सबसे बड़ी विडंबना होती है कि सबसे ज़्यादा दर्द वही लोग छिपाते हैं जो सबसे ज़्यादा प्रेम करते हैं। मैंने अपने रिश्ते को बचाने की बहुत कोशिश की। मुझे विश्वास है कि उन्होंने भी अपने तरीके से कोशिश की होगी। लेकिन कुछ दूरियाँ ऐसी होती हैं जो केवल इच्छा से नहीं मिटतीं। उन्हें मिटाने के लिए समय, धैर्य और दोनों ओर से खुला संवाद चाहिए होता है। हमारे पास प्रेम था, लेकिन उसे व्यक्त करने की एक जैसी भाषा नहीं थी।
समय के साथ मेरे भीतर भी बहुत परिवर्तन आया। पहले मैं हर बात पर उत्तर चाहती थी, अब मैंने मौन को पढ़ना शुरू किया। मैंने समझा कि हर चुप्पी उपेक्षा नहीं होती। कई बार इंसान इसलिए भी नहीं बोलता क्योंकि उसके भीतर का शोर बहुत बड़ा होता है। मेरे पति भी शायद ऐसे ही थे। उनके बचपन के संघर्ष, समाज की उपेक्षा, परिवार की जिम्मेदारियाँ और लगातार स्वयं को सिद्ध करने का दबाव उन्हें भीतर से कठोर बना चुका था। मैं देर से समझ पाई कि वे पत्थर नहीं थे, केवल बहुत थके हुए इंसान थे। और शायद वे भी यह देर से समझ पाए कि मैं शिकायत नहीं, केवल अपनापन माँग रही थी।
आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो किसी एक को दोषी नहीं ठहरा पाती। कई बार लगता है कि हालात हमसे अधिक शक्तिशाली थे। कई बार लगता है कि यदि हम कुछ वर्ष बाद मिले होते, जब हम दोनों थोड़ा अधिक परिपक्व होते, तो शायद हमारी कहानी अलग होती। मेरे मन में आज भी उनके लिए कटुता नहीं है। अफ़सोस है, पीड़ा है, अधूरापन है, लेकिन नफ़रत नहीं है। क्योंकि मैं जानती हूँ कि उन्होंने भी अपने हिस्से का संघर्ष जिया था और मैंने भी। शायद हम दोनों एक-दूसरे का सहारा बनना चाहते थे, लेकिन दोनों ही पहले से इतने घायल थे कि एक-दूसरे के घाव भरने के बजाय अनजाने में उन्हें और गहरा कर बैठे। तभी आज भी मेरे मन से एक ही वाक्य निकलता है—”शायद हालात गलत थे, शायद वक्त गलत था… या फिर हम दोनों सही होकर भी एक-दूसरे के लिए सही नहीं थे।”
मैं भी इंसान थी… सिर्फ़ किसी की पत्नी नहीं
(भाग–3 : कुछ कहानियाँ पूरी होकर भी अधूरी रह जाती हैं)
समय बीतता गया, लेकिन मेरे भीतर का खालीपन वहीं ठहरा रहा। पहले मैं हर बात का उत्तर खोजती थी, फिर एक समय ऐसा आया जब मैंने प्रश्न पूछना ही छोड़ दिया। शायद हर मनुष्य के जीवन में एक ऐसा पड़ाव आता है जहाँ वह हारकर नहीं, बल्कि थककर शांत हो जाता है। पहले जैसा अब कुछ भी नहीं रहा था। न मैं पहले जैसी रही, न वे पहले जैसे रहे। समय केवल चेहरों को नहीं बदलता, वह मनुष्य के भीतर के अर्थ, उसकी प्राथमिकताएँ और उसके मौन तक बदल देता है। तब मुझे पहली बार समझ आया कि हर खामोशी दुःख की अभिव्यक्ति नहीं होती। कई बार मनुष्य इसलिए नहीं बोलता क्योंकि उसके भीतर का शोर समाप्त हो चुका होता है। वह उन उत्तरों तक पहुँच चुका होता है जिन्हें शब्दों में कहना संभव नहीं होता। ऐसे मौन में भी एक ध्वनि होती है, लेकिन उसे सुनने के लिए कान नहीं, संवेदनशील हृदय चाहिए।
मैंने अपने जीवन में बहुत लोगों को बोलते देखा, पर बहुत कम लोगों को सुनते देखा। हम सब चाहते हैं कि हमें समझा जाए, लेकिन बहुत कम लोग किसी दूसरे के भीतर उतरने का धैर्य रखते हैं। आज मुझे लगता है कि यदि मैंने अपने पति के मौन को थोड़ा और समझा होता और उन्होंने मेरी आँखों में छिपे आँसुओं को थोड़ा और पढ़ा होता, तो शायद हमारी कहानी का अंत कुछ और होता। रिश्ते तर्क से नहीं, संवेदना से चलते हैं। प्रेम का अर्थ केवल “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ” कहना नहीं, बल्कि यह भी है कि “मैं तुम्हारी चुप्पी को भी समझने की कोशिश करूँगा।” हम दोनों शायद यही नहीं कर पाए। हम दोनों अपनी-अपनी पीड़ा के इतने निकट थे कि एक-दूसरे की पीड़ा तक पहुँच ही नहीं सके।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि स्त्री होना क्या है? मेरे लिए स्त्री होना केवल अधिकारों की बात नहीं थी, बल्कि अपने पूरे अस्तित्व से प्रेम करना और प्रेम निभाना था। जब मैं किसी से जुड़ी, तो केवल उसके नाम से नहीं जुड़ी; मैं उसके सुख-दुःख, उसके परिवार, उसके संघर्ष और उसके भविष्य से भी जुड़ गई। शायद यही कारण है कि जब रिश्ते में दरार आती है तो स्त्री केवल एक संबंध नहीं खोती, वह अपने भीतर बसाई हुई पूरी दुनिया को टूटते हुए देखती है। लेकिन आज मैं यह भी समझती हूँ कि पुरुष भी अपने ढंग से टूटता है। समाज उसे रोने नहीं देता, परिस्थितियाँ उसे रुकने नहीं देतीं और जिम्मेदारियाँ उसे बिखरने नहीं देतीं। इसलिए कई बार उसका दुःख दिखाई नहीं देता। मेरी सबसे बड़ी सीख यही रही कि पीड़ा का कोई स्त्री या पुरुष रूप नहीं होता; पीड़ा केवल मनुष्य की होती है।
आज भी जब कोई युवती मुझसे विवाह के बारे में सलाह माँगती है तो मैं उसे डराती नहीं हूँ। मैं केवल इतना कहती हूँ कि विवाह केवल प्रेम से नहीं चलता, संवाद से चलता है। केवल आकर्षण से नहीं चलता, धैर्य से चलता है। जीवनसाथी चुनने से पहले यह मत देखो कि वह तुम्हें कितना हँसाता है; यह भी देखो कि वह तुम्हारे आँसू कितनी शांति से सुन सकता है। और यदि तुम स्वयं किसी की जीवनसंगिनी बन रही हो, तो उसके संघर्षों को भी समझने का प्रयास करना। कोई भी व्यक्ति अपने अतीत से खाली होकर विवाह नहीं करता। हर कोई अपने साथ कुछ अधूरे सपने, कुछ पुराने घाव और कुछ अनकहे डर लेकर आता है। यदि उन घावों को सम्मान नहीं मिलेगा, तो वे किसी दिन रिश्ते को घायल कर देंगे।
आज मैं अपने पति से दूर होकर भी उनके लिए मन में सम्मान रखती हूँ। शिकायतें समय के साथ कम हो गईं, लेकिन सीखें बढ़ गईं। कभी-कभी उनकी याद आती है तो मन में क्रोध नहीं, एक शांत-सी करुणा भर जाती है। मैं सोचती हूँ कि शायद वे भी किसी रात मेरी तरह जागे होंगे। शायद उन्होंने भी कभी मन ही मन कहा होगा—”काश, मैं उसे थोड़ा और समझ पाता।” जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि समझ अक्सर तब आती है जब समय हमारे हाथ से निकल चुका होता है। हम दोनों ने अपनी तरफ़ से रिश्ता निभाने की कोशिश की थी। शायद कोशिशें कम नहीं थीं, लेकिन परिस्थितियाँ उनसे बड़ी थीं। कुछ दूरियाँ सचमुच ऐसी होती हैं जिन्हें केवल प्रेम नहीं, समय भी तय करता है।
मेरी डायरी के अंतिम पन्ने पर आज भी कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं, जिन्हें पढ़कर मेरी आँखें नम हो जाती हैं—”शायद हालात गलत थे, शायद वक्त गलत था, या फिर हम दोनों सही होकर भी एक-दूसरे के लिए सही नहीं थे। जिस रिश्ते को हमने इतनी मोहब्बत से शुरू किया था, वह खामोशी में खत्म हो गया। गलत कौन था, आज भी नहीं जानती। बस इतना जानती हूँ कि एक रिश्ता था, जो धीरे-धीरे हाथों से फिसल गया।” अब मैं उस रिश्ते को दोष नहीं देती। वह रिश्ता मेरे जीवन की सबसे बड़ी सीख बन गया है।
आज भी कभी-कभी उदासी मेरे दरवाज़े पर आकर बैठ जाती है। भीड़ में चलते हुए भी मैं अपने भीतर का अकेलापन महसूस करती हूँ। लेकिन अब वह उदासी मुझे तोड़ती नहीं, मुझे मेरे भीतर ले जाती है। मैंने समझ लिया है कि किसी एक व्यक्ति के चले जाने से जीवन समाप्त नहीं होता, लेकिन जीवन की दिशा अवश्य बदल जाती है। मैंने अपने आँसुओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। मैंने उन्हें अपनी संवेदना बना लिया। क्योंकि जिसने दर्द को समझ लिया, वह दूसरों के घावों पर मरहम रखना सीख जाता है।
यदि मेरी यह व्यथा पढ़कर कोई पति अपनी पत्नी से खुलकर बात कर ले, यदि कोई पत्नी अपने पति के मौन को केवल उपेक्षा न समझकर उसके भीतर छिपे संघर्ष को भी पढ़ने की कोशिश करे, यदि कोई युवा विवाह से पहले केवल प्रेम नहीं बल्कि समझ, धैर्य और संवाद का महत्व भी समझ ले, तो मेरी पीड़ा सार्थक हो जाएगी। जीवन ने मुझे यही सिखाया है कि रिश्ते जीतने की चीज़ नहीं, सँभालने की जिम्मेदारी हैं। उनमें कोई एक पूरी तरह सही और दूसरा पूरी तरह गलत नहीं होता। अधिकतर बार दोनों घायल होते हैं, दोनों प्रेम करते हैं, दोनों संघर्ष करते हैं, लेकिन दोनों एक-दूसरे तक पहुँच नहीं पाते।
आज मेरी कहानी का अंत किसी शिकायत पर नहीं, एक प्रार्थना पर होता है। ईश्वर से मेरी बस इतनी विनती है कि किसी भी स्त्री को ऐसा प्रेम मिले जिसमें उसे स्वयं को सिद्ध न करना पड़े, और किसी भी पुरुष को ऐसा साथ मिले जिसमें वह अपनी खामोशी से बाहर आ सके। क्योंकि अंततः विवाह दो शरीरों का नहीं, दो थके हुए मनुष्यों का मिलन है। यदि वे एक-दूसरे का हाथ थामकर जीवन की कठिन राहों पर साथ चल सकें, तो वही रिश्ता स्वर्ग बन जाता है। और यदि वे एक-दूसरे को समझे बिना केवल साथ रहने का अभिनय करते रहें, तो सबसे सुंदर घर भी भीतर से सूना हो जाता है।
मैंने अपने जीवन से यही सीखा है कि कुछ कहानियाँ अधूरी रहकर भी मनुष्य को पूरा बना जाती हैं। मेरी कहानी भी शायद ऐसी ही एक कहानी है।

हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी
कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
निवासी ग्राम नवाब पोस्ट झाड़ौल वाया रामसर जिला अजमेर ।(राजस्थान) 9829 230 966

