एक सघन वन में एक प्राचीन वटवृक्ष की डाल पर दो उल्लू आकर बैठे।

दोनों के पंजों में उनका ताज़ा शिकार दबा हुआ था।

एक उल्लू के पंजों में फड़फड़ाता हुआ एक विषधर सर्प था, तो दूसरे के पंजों में अपनी अंतिम सांसें गिनता हुआ एक असहाय चूहा।

दोनों जीव जीवित थे, किंतु उनकी नियति काल के कठोर शिकंजे में तय हो चुकी थी।

तभी एक अत्यंत विस्मयकारी और आंखें खोल देने वाला
दृश्य उभरा।

सर्प ने जैसे ही सामने दूसरे उल्लू के पंजों में दबे चूहे को देखा, उसकी आंखें लालच और क्षुधा से चमक उठीं।

वह यह सर्वथा भूल गया कि वह स्वयं मृत्यु के पंजों में जकड़ा हुआ है और उसका अंत कुछ ही पलों की दूरी पर है।

मृत्यु के साक्षात सम्मुख होते हुए भी उसकी लालसा शांत न हुई; वह चूहे को अपना निवाला बनाने की योजना में तड़पने लगा।

दूसरी ओर, चूहे की दृष्टि जब ललचाई नजरों से घूरते उस सर्प पर पड़ी, तो वह आतंक से कांप उठा।

चूहे की विडंबना देखिए—वह स्वयं महाकाल (उल्लू) के तीक्ष्ण पंजों में कैद था, किंतु उसे अपनी उस प्रत्यक्ष और निश्चित मृत्यु का कोई भान न रहा।

वह व्यर्थ ही उस अशक्त सर्प से भयभीत हो रहा था, जो स्वयं काल की कगार पर खड़ा था।

यह देखकर दोनों उल्लू एक-दूसरे की ओर देख मुस्कुराए।

एक ने गंभीर स्वर में कहा, “संसार की माया का यह खेल देखो! मृत्यु साक्षात सिर पर खड़ी है, फिर भी यह सर्प अपने लोभ और तृष्णा के वशीभूत होकर अपने से दुर्बल को निगलने का स्वप्न देख रहा है।

दूसरे ने कहा, “और इस मूषक की चेतना को देखो! यह पहले से ही मौत की गिरफ्त में है, फिर भी इसे वास्तविक संकट का भान नहीं।

यह उस दुर्बल से डरकर अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रहा है, जो खुद बेबस और लाचार है।

इसी ऊहापोह में सर्प ने चूहे की ओर झपटने की क्षणिक चेष्टा की।

उल्लुओं को लगा कि शिकार छूटने का प्रयास कर रहा है।

उन्होंने अपने पंजों की पकड़ एक झटके में कठोर कर दी और एक ही क्षण में दोनों जीवों की जीवनलीला समाप्त हो गई।

तृष्णा और अकारण भय दोनों ही एक साथ काल के गाल में समा गए।

जीवन का यथार्थ एवं चिंतन
यह केवल दो जीवों की कहानी नहीं, बल्कि मानव समाज के यथार्थ का सजीव दर्पण है।

हम जीवनभर समय और नश्वरता के शिकंजे में बंधे रहते हैं, फिर भी हमारा अंतर्मन लोभ, संग्रह, और दूसरों को नीचा दिखाने की व्यर्थ लालसाओं में उलझा रहता है।

वहीं दूसरी तरफ, हम अक्सर काल्पनिक, छोटे-मोटे और अकारण भयों से घिरे रहकर अपने वास्तविक जीवन, स्वास्थ्य, संबंधों और अंतिम सत्य को विस्मृत कर देते हैं।

जब तक इंसान अपनी चेतना को मोह, अंधी महत्वाकांक्षा और अवास्तविक भयों से मुक्त नहीं करता, तब तक वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य को पहचान ही नहीं पाता।

सजग दृष्टि, संतुलित विवेक और यथार्थ का बोध ही मनुष्य को भटकाव से बचाकर सही दिशा दे सकते हैं।

लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक, ब्यावर राजस्थान सम्पर्क सूत्र-94622-60179

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *