मानवीय जीवन से बढ़कर परम्पराओं का कोई स्थान नहीं हो सकता—यह बात जितनी सरल है, उतनी ही गहरी भी। बहुजन वंचित समाज के संदर्भ में यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ अक्सर परम्पराओं को जीवन से ऊपर रख दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि हर समाज को प्रोग्रेस (प्रगति) की दिशा में बढ़ना होता है और इसके लिए उसे अपने भीतर रिवायत (परम्परा) की समीक्षा भी करनी पड़ती है। अगर परम्पराएं मनुष्य के विकास में बाधा बनें, तो उनका पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है।
इतिहास इस बात का गवाह है कि कोई भी परम्परा स्थायी नहीं होती। समाज की जरूरतों के अनुसार उनका निर्माण होता है और समय आने पर उनका अंत भी होता है। बहुजन वंचित समाज को यह समझना होगा कि अतीत में जो परम्पराएं बनीं, वे उस समय की परिस्थितियों के अनुसार थीं। आज जब दुनिया मॉडर्न (आधुनिक) हो चुकी है, तब रस्म (रीति) को ज्यों का त्यों ढोना समाज को पीछे धकेल सकता है। परिवर्तन को स्वीकार करना ही विकास की पहली सीढ़ी है।
बहुजन वंचित समाज की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि उसने अपनी परम्पराओं को बिना प्रश्न किए स्वीकार किया। कई बार ये परम्पराएं ही उसे शिक्षा, अवसर और सम्मान से दूर रखती हैं। आज के समय में एजुकेशन (शिक्षा) को प्राथमिकता देना आवश्यक है, जबकि जंजीर (बंधन) बनी पुरानी मान्यताओं को तोड़ना भी उतना ही जरूरी है। जब तक समाज अपने विचारों में बदलाव नहीं लाएगा, तब तक उसकी स्थिति में सुधार संभव नहीं है।
कोई भी धर्म या दर्शन यह नहीं कहता कि मनुष्य के जीवन को संकट में डालकर परम्पराओं का पालन किया जाए। असल में हर धर्म का मूल उद्देश्य मानव कल्याण है। इसलिए समाज को ह्यूमैनिटी (मानवता) को प्राथमिकता देनी चाहिए और इंसाफ (न्याय) के आधार पर अपने निर्णय लेने चाहिए। अगर कोई परम्परा अन्याय को बढ़ावा देती है, तो उसे छोड़ देना ही उचित है।
बहुजन वंचित समाज को यह समझना होगा कि आत्मसम्मान और स्वाभिमान ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर वह परम्पराओं के नाम पर खुद को हीन समझता रहेगा, तो वह कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा। उसे सेल्फ-रिस्पेक्ट (आत्मसम्मान) को अपनाना होगा और ख़ुद्दारी (स्वाभिमान) को अपने जीवन का आधार बनाना होगा। यही भावना उसे समाज में एक नई पहचान दिला सकती है।
आज का समय प्रतिस्पर्धा का है, जहाँ हर समाज आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में बहुजन समाज यदि पुरानी परम्पराओं में उलझा रहेगा, तो वह और पीछे छूट जाएगा। उसे कम्पटीशन (प्रतिस्पर्धा) के इस दौर में आगे बढ़ने के लिए हौसला (साहस) दिखाना होगा। बिना साहस के कोई भी परिवर्तन संभव नहीं है।
परम्पराओं का अंधानुकरण समाज को कमजोर बनाता है। इसके बजाय आवश्यक है कि हर परम्परा को तर्क और विवेक की कसौटी पर परखा जाए। बहुजन समाज को लॉजिक (तर्क) के आधार पर निर्णय लेना चाहिए और तहकीक (जांच-पड़ताल) की प्रवृत्ति को अपनाना चाहिए। इससे वह सही और गलत के बीच अंतर कर सकेगा।
समाज का विकास तभी संभव है जब उसके लोग एक-दूसरे का साथ दें और सामूहिक रूप से आगे बढ़ें। बहुजन समाज को आपसी मतभेदों को छोड़कर एकजुट होना होगा। उसे यूनिटी (एकता) की भावना को मजबूत करना होगा और इत्तेहाद (एकजुटता) को अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा। यही एकता उसे नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है।
परिवर्तन कभी आसान नहीं होता, लेकिन यह आवश्यक होता है। जो समाज परिवर्तन को स्वीकार करता है, वही आगे बढ़ता है। बहुजन वंचित समाज को चेंज (परिवर्तन) को अपनाना होगा और तबदीली (बदलाव) को अपनी सोच में जगह देनी होगी। यही बदलाव उसे नई दिशा और नई पहचान देगा।
अंततः यह समझना जरूरी है कि परम्पराएं मनुष्य के लिए हैं, मनुष्य परम्पराओं के लिए नहीं। यदि कोई परम्परा मानव जीवन को नुकसान पहुंचाती है, तो उसे त्याग देना ही उचित है। बहुजन वंचित समाज को फ्यूचर (भविष्य) की ओर देखना होगा और उम्मीद (आशा) के साथ आगे बढ़ना होगा। यही मार्ग उसे सम्मान, समानता और प्रगति की ओर ले जाएगा।
शेर:
पुरानी रस्मों ने कदम बाँध दिए ज़ंजीरों की तरह,
वक़्त बदला मगर हम न बदले—यही नुकसान हुआ।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी,
रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966
स्रोत एवं संदर्भ :
सामाजिक चिंतन, इतिहास विश्लेषण, डॉ आंबेडकर विचारधारा, परिवर्तन सिद्धांत, बहुजन अनुभव, परंपरा आलोचना, आधुनिक समाज अध्ययन, मानवतावादी दृष्टिकोण।
