
लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवं विश्लेषक, ब्यावर
प्रस्तावना
अंतर्मन की वेदना और एडवोकेट राकेश जयपाल लवेरा पोकरण की वह पुकार
आज बहुजन समाज के वैचारिक धरातल पर एक अजीब सी बेचैनी व्याप्त है। हाल ही में राजस्थान के पोकरण की पावन धरा पर एक सच्चे अंबेडकरवादी एडवोकेट राकेश जयपाल लवेरा पोकरण द्वारा व्यक्त की गई पीड़ा ने हर उस व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया है, जिसके सीने में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति सच्ची श्रद्धा है।
फेसबुक और व्हाट्सएप पर डाला गया वह वीडियो केवल एक व्यक्ति का विलाप नहीं था, बल्कि वह उन तमाम मिशनरी कार्यकर्ताओं की सामूहिक चीख थी, जो दिन-रात समाज को जोड़ने में लगे हैं, लेकिन बदले में उन्हें अपनों की ही गद्दारी और उपेक्षा मिलती है।
यह लेख उन ‘विभीषणों’ और ‘भस्मासुरों’ के चेहरे से नकाब हटाने का एक प्रयास है, जो बाबा साहब के नाम का व्यापार तो करते हैं, लेकिन उनके विचारों का कत्ल करने में जरा भी संकोच नहीं करते।
1. 14 अप्रैल: जयंती का स्वांग और वैचारिक शून्यता
बहुजन समाज के लिए 14 अप्रैल का दिन संकल्प और चेतना का दिन होना चाहिए था, लेकिन विडंबना देखिए कि इसे मात्र एक उत्सव और दिखावे का केंद्र बना दिया गया है।
साल के 365 दिनों में से 364 दिन बाबा साहब के सिद्धांतों को पैरों तले रौंदने वाले लोग, उस एक दिन नीली पगड़ी और गले में दुपट्टा डालकर ऐसे निकलते हैं, जैसे उनसे बड़ा कोई क्रांतिकारी न हो।
यह ढोंग और दिखावा समाज को खोखला कर रहा है।
ऊंचे-ऊंचे साउंड सिस्टम, नाच-गाना और रैली में शक्ति प्रदर्शन क्या वाकई बाबा साहब के ‘शिक्षित बनो’ के सपने को पूरा कर रहा है?
इन आयोजनों में वही लोग सबसे आगे दिखते हैं, जिनके जीवन में बाबा साहब के विचारों की एक बूंद भी नहीं उतरी है।
यह प्रदर्शन केवल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को चमकाने का एक जरिया मात्र बनकर रह गया है।
2. दोहरी मानसिकता: सामने शहद, पीछे जहर
आज समाज में एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है, जो ‘मुंह में राम, बगल में छुरी’ की कहावत को चरितार्थ कर रहा है।
ये लोग जब मंच पर खड़े होते हैं या किसी कार्यक्रम में मिलते हैं, तो इतनी मधुर भाषा का प्रयोग करते हैं, कि सुनने वाले को लगता है कि समाज का उद्धार यही करेंगे।
लेकिन, जैसे ही वे समाज के बीच से हटते हैं, वे अपनों के ही विरुद्ध बुराइयों का अंबार लगा देते हैं।
इनकी मीठी बातों के पीछे ईर्ष्या और द्वेष का कालकूट जहर भरा होता है।
ये लोग समाज के उन कर्मठ कार्यकर्ताओं की जड़ें काटने में माहिर होते हैं, जो चुपचाप धरातल पर काम कर रहे हैं। इनकी दोहरी मानसिकता ने समाज में अविश्वास की एक गहरी खाई पैदा कर दी है।
3. विद्वता का अपमान और लघुता का प्रदर्शन
एक स्वस्थ समाज वही है, जहाँ विद्वानों और अच्छे व्यक्तित्वों का सम्मान हो। लेकिन हमारे समाज के कथित ‘स्वयंभू नेताओं’ की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि, वे अपने से अधिक योग्य और विद्वान व्यक्ति की प्रशंसा सुनना पसंद नहीं करते।
यदि कोई व्यक्ति अपनी मेहनत और बुद्धि से समाज को दिशा दे रहा हो, तो ये लोग उसकी हौसला-अफजाई करने के बजाय उसे नीचा दिखाने का षड्यंत्र रचने लगते हैं।
यह हीन भावना ही समाज के पतन का कारण है।
जब तक हम अपनों की सफलता पर गर्व करना नहीं सीखेंगे, तब तक हम एक सशक्त राष्ट्र या समाज का निर्माण नहीं कर पाएंगे।
4. पारिवारिक विघटन और ईर्ष्या का तांडव
बाबा साहब ने कहा था कि, समाज को संगठित करो, लेकिन ये लोग अपने परिवार तक को संगठित नहीं रख पाते।
समाज सुधार का दंभ भरने वाले ये लोग अपने ही सगे भाई-बंधुओं से ईर्ष्या और द्वेष की भावना रखते हैं।
पैतृक संपत्तियों के विवाद हों या व्यक्तिगत प्रगति, ये अपने ही भाइयों की राह में रोड़े अटकाते हैं।
जो व्यक्ति अपने परिवार और समाज के सगे संबंधियों से दूरी बनाकर चलता है, वह समाज का नेतृत्व करने का नैतिक अधिकार खो देता है।
इनकी ईर्ष्या की अग्नि इतनी तीव्र होती है कि वे अपनों को संकट में देखकर कन्नी काट लेते हैं, और दूसरों के सामने अपनी महानता का ढोंग करते हैं।
5. संगठन में पद और मंच की ललक: एक कुत्सित प्रयास
आज समाज में ‘मंच और पद की एक अंधी दौड़ लगी है। पद पाने के लिए ये लोग किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं। जैसे ही कोई अवसर आता है, ये शिकारी की तरह उसे लपकने के लिए पूरा जोर लगा देते हैं।
इनके लिए पद सेवा का साधन नहीं, बल्कि अहंकार की तुष्टि का माध्यम है।
मंच पर चढ़ने की यह होड़ इतनी निर्लज्ज है कि वे सच्चे और पुराने मिशनरी कार्यकर्ताओं को कोहनियों से धकेल कर आगे बढ़ जाते हैं।
साम-दाम-दंड-भेद का प्रयोग करते हुए ये हमारे पवित्र मंचों को अपनी व्यक्तिगत सीढ़ी (Step) बना लेते हैं।
भले ही इससे समाज का अहित हो, इनकी सत्ता और राजनीति चमकनी चाहिए।
6.सत्ता का मद और अहंकार की पराकाष्ठा
जैसे ही इन लोगों को कोई छोटा-मोटा पद मिल जाता है, इनके पैर जमीन पर नहीं टिकते। वे खुद को ‘सर्वेसर्वा’ समझने लगते हैं। उनका व्यवहार ऐसा हो जाता है जैसे पूरा समाज उनका ऋणी हो। घमंड और अहंकार में डूबे ये लोग अपने ही भाई-बंधुओं की पीड़ा और तकलीफों को भूल जाते हैं।
जब समाज का कोई जरूरतमंद व्यक्ति इनके पास मदद की उम्मीद लेकर जाता है, तो ये लोग अपनी व्यस्तता का बहाना बनाकर कन्नी काट लेते हैं।
यह वही लोग हैं जो चुनाव या जयंती के समय उन्हीं मजबूर लोगों के कंधों पर हाथ रखकर फोटो खिंचवाते थे।
इनका यह बदला हुआ स्वरूप बाबा साहब के मिशन के प्रति सबसे बड़ा विश्वासघात है।
7. जलन की भावना और चरित्र हनन का उद्योग
अपने से आगे बढ़े हुए लोगों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के बजाय, ये लोग उनसे जलन रखते हैं। वे उनकी पीठ पीछे बुराई करने का एक संगठित उद्योग चलाते हैं।
इनका एकमात्र लक्ष्य यह होता है कि कैसे दूसरों की छवि को धूमिल करके खुद को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जाए।
यह नकारात्मक राजनीति समाज के भीतर एक ऐसा कैंसर है जो धीरे-धीरे हमारी जड़ों को काट रहा है।
वे सच्चे अंबेडकरवादियों को दरकिनार कर देते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर सच्चाई सामने आ गई, तो उनकी दुकान बंद हो जाएगी।
8. हाशिए पर खड़ा व्यक्ति: उनकी प्राथमिकता में कभी नहीं
बहुजन समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ा वह व्यक्ति, जो आज भी रोटी, कपड़ा और मकान के लिए संघर्ष कर रहा है, जो प्रशासनिक अन्याय का शिकार है, जो मजबूर और बेबस है—उसकी पीड़ा से इन ‘नकली अंबेडकरवादियों’ का कोई लेना-देना नहीं है। उनके लिए वह व्यक्ति केवल एक वोट बैंक या भीड़ का हिस्सा है।
पोकरण राजस्थान के उस एडवोकेट राकेश जयपाल लवेरा की पीड़ा भी यही थी कि, जब समाज का कोई व्यक्ति अन्याय के खिलाफ लड़ता है, तो ये कथित नेता उसकी ढाल बनने के बजाय तमाशबीन बने रहते हैं। वे तभी बाहर निकलते हैं जब उन्हें अपना व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध करना हो।
9. मिशन से विमुखता और स्वार्थ की सिद्धि
बाबा साहब का मिशन ‘आत्मसम्मान’ और ‘समानता’ का मिशन था।
लेकिन इन लोगों ने इसे ‘स्वार्थ सिद्धि’ का साधन बना लिया है।
उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि दलित समाज का कितना नुकसान हो रहा है, बस उनकी अपनी राजनीति और सत्ता चमकती रहनी चाहिए।
वे समाज के संगठनो का उपयोग केवल अपनी ब्रांडिंग के लिए करते हैं।
10. समाज को संदेश: अब जागने का वक्त है!
मेरे प्यारे बहुजन भाइयों और बहनों,
पोकरण राजस्थान से उठी वह दर्द भरी आवाज हम सबके लिए एक चेतावनी है।
हमें पहचानना होगा कि हमारे बीच कौन ‘सच्चा मिशनरी’ है और कौन ‘व्यापारी’।
जो लोग 365 दिन में केवल एक दिन दिखावा करते हैं, उनसे सावधान रहें।
सच्चा अंबेडकरवाद क्या है?
वह जो अपने भाई की उन्नति पर प्रसन्न हो।
वह जो पद और मंच के पीछे न भागे, बल्कि कर्तव्य के पीछे चले।
वह जो समाज के अंतिम व्यक्ति के आंसू पोंछने के लिए अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग करे।
वह जो पाखंड और आडंबर को छोड़कर तर्क और विज्ञान की बात करे।
हमें ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार की इस दीवार को गिराना होगा।
यदि हम अपनों की टांग खींचना बंद नहीं करेंगे, तो हम कभी भी उस मंजिल तक नहीं पहुँच पाएंगे जिसका सपना बाबा साहब और हमारे बहुजन महापुरुषों ने देखा था।
निष्कर्ष
लेखन का उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि उस कड़वी सच्चाई से रूबरू कराना है,जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
एडवोकेट राकेश जयपाल लवेरा पोकरण राजस्थान के उस सच्चे साथी की पीड़ा को बेकार मत जाने दीजिए। आइए, हम संकल्प लें कि हम केवल संगठन में पद के भूखे नहीं, बल्कि समाज के प्रति जवाबदेह बनेंगे।
हम ढोंग और दिखावे की राजनीति को त्यागकर सच्चे अर्थों में ‘अंबेडकरवादी’ बनेंगे।
याद रहे, कारवां को आगे बढ़ाना अनिवार्य है, और जो इसे पीछे खींच रहे हैं, उन्हें समाज के मुख्य विमर्श से बाहर करना ही बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जय भीम! जय भारत! जय संविधान!
लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक विचारक एवं विश्लेषक, ब्यावर (राजस्थान)
