डांगावास प्रकरण भारतीय समाज और न्यायिक प्रक्रिया के इतिहास में एक अत्यंत गंभीर, दुखद और संवेदनशील मोड़ रहा है।

5+1= छह अमूल्य जिंदगियों का जाना और पीड़ित परिवारों का भी वर्षों तक न्याय की आस में प्रतीक्षा करना हर संवेदनशील नागरिक के हृदय को व्यथित करता है।

हाल ही में न्यायालय के निर्णय के उपरांत सामाजिक हलकों में विचार-विमर्श का दौर पुनः प्रारंभ हुआ है।

इस संदर्भ में, आदरणीय डॉ. शशि इन्दुलिया जी (पूर्व प्राचार्य, उच्च शिक्षा) द्वारा व्यक्त की गई चिंताएं और उठाए गए प्रश्न स्वाभाविक हो सकते हैं, किंतु इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढते समय हमें केवल आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने के बजाय सकारात्मकता,संस्थागत सीमाओं की व्यावहारिक समझ और समाज निर्माण के व्यापक संदर्भ को ध्यान में रखना अनिवार्य है।

नकारात्मकता को उभारने या सामाजिक संस्थाओं की मंशा पर संदेह करने से समाज में दूरी और अविश्वास बढ़ता है।

जो संस्थाएं और प्रतिनिधि निस्वार्थ भाव से समाज सेवा में संलग्न हैं, वे हतोत्साहित होते हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि हम कमियों की ओर उंगली उठाने के बजाय सामूहिक प्रयासों को संबल प्रदान करें।

डॉ. शशि इन्दुलिया जी द्वारा उठाए गए बिंदुओं का क्रमबद्ध एवं नम्रतापूर्ण विश्लेषण

  1. 11 वर्षों की कथित निष्क्रयता बनाम प्रक्रियात्मक और व्यावहारिक सीमाएं

आलोचनात्मक बिंदु
11 वर्षों तक संस्थाएं कहां थीं? क्या किसी ने मुकदमे की निरंतर मॉनिटरिंग या समीक्षा की?

सकारात्मक एवं व्यावहारिक पक्ष
न्यायिक और पुलिस प्रक्रियाएं (विशेषकर सीबीआई जांच) एक निश्चित कानूनी व्यवस्था के तहत स्वतंत्र रूप से संचालित होती हैं।

किसी भी गैर-सरकारी सामाजिक संस्था या प्रतिनिधि संगठन के पास अदालत के दैनिक कामकाज या जांच एजेंसियों की आंतरिक प्रक्रियाओं में सीधे हस्तक्षेप करने का कानूनी अधिकार नहीं होता।

इन 11 वर्षों में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं और संस्थाओं ने अपनी-अपनी सीमाओं में रहकर पीड़ित परिवारों का नैतिक, सामाजिक और निजी स्तर पर संबल बनाए रखा।

यह सहयोग सदैव प्रचार-प्रसार या मीडिया की सुर्खियों का मोहताज नहीं होता।

अनेक प्रयास शांत रहकर भी किए जाते हैं, जिन्हें ‘निष्क्रियता’ कहना न्यायसंगत नहीं होगा।

  1. न्यायालय के निर्णय के बाद सक्रियता: ‘श्रेय’ नहीं, अपितु ‘नैतिक दायित्व और संवेदना’

आलोचनात्मक बिंदु
निर्णय के बाद धरने, प्रदर्शन और बयानबाजी केवल ‘श्रेय लेने’ और ‘राजनीतिक लाभ’ के लिए है।

सकारात्मक एवं व्यावहारिक पक्ष
न्यायालय का फैसला आने के बाद समाज में उठने वाली प्रतिक्रिया या सक्रियता को ‘श्रेय की राजनीति’ के रूप में देखना एकांगी दृष्टिकोण है।

जब किसी न्यायिक निर्णय से समाज या पीड़ित परिवार निराश महसूस करता है, तब सामाजिक संस्थाओं का आगे आना, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना और पीड़ित पक्ष से मिलना उनका संवैधानिक अधिकार और नैतिक दायित्व है।

यह सक्रियता श्रेय पाने के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित परिवारों को यह भरोसा दिलाने के लिए होती है कि वे समाज में अकेले नहीं हैं।

यदि इस मोड़ पर भी संस्थाएं शांत बैठ जाएं, तो समाज पर संवेदनहीनता का आरोप लगेगा।

अतः निर्णय के बाद की एकजुटता सामाजिक चेतना का प्रतीक है, किसी अवसरवादिता का नहीं।

  1. ‘गिद्धतंत्र’ जैसे कठोर शब्दों की प्रासंगिकता पर पुनर्विचार

आलोचनात्मक बिंदु:
सामाजिक संस्थाओं और कार्यकर्ताओं के रवैये की तुलना ‘गिद्ध’ से करना।

सकारात्मक एवं व्यावहारिक पक्ष
सामाजिक क्षेत्र में कार्य करने वाले अधिकांश व्यक्ति और संस्थाएं सीमित संसाधनों, बिना किसी सरकारी अनुदान और भारी सामाजिक-कानूनी चुनौतियों के बावजूद केवल सामाजिक दायित्व बोध से कार्य करते हैं।

संपूर्ण सामाजिक तंत्र के लिए ‘गिद्धतंत्र’ जैसे कठोर और नकारात्मक शब्दों का प्रयोग उन अनगिनत निष्ठावान कार्यकर्ताओं का अनादर करता है जो दिन-रात समाज सुधार में लगे हैं।

शब्दों की नम्रता और गरिमा ही रचनात्मक संवाद का मार्ग प्रशस्त करती है।

आलोचनात्मक शब्दावली से संस्थाएं हतोत्साहित होती हैं, जिससे अंततः समाज को ही हानि पहुँचती है।

  1. ‘ठोस योजना और उपाय’ की दिशा में सकारात्मक पहल की आवश्यकता

आलोचनात्मक बिंदु
जब तक ठोस योजना नहीं होगी, समाज ऐसी घटनाओं का दोषी रहेगा।

सकारात्मक एवं व्यावहारिक पक्ष
इस बात से पूर्ण सहमति है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए दीर्घकालिक और ठोस योजनाओं की आवश्यकता है।

किंतु यह उत्तरदायित्व केवल सामाजिक संस्थाओं का नहीं, बल्कि राज्य, प्रशासन, न्यायपालिका और संपूर्ण प्रबुद्ध समाज का सामूहिक दायित्व है।

केवल संस्थाओं की जवाबदेही तय करने से हल नहीं निकलेगा; बल्कि संस्थाओं, शिक्षाविदों और प्रशासनिक तंत्र को एक साथ मिलकर काम करना होगा ताकि भूमि सुधार, कानूनी साक्षरता और त्वरित न्याय व्यवस्था को धरातल पर उतारा जा सके।

हमारा दृष्टिकोण, नकारात्मकता से परे, सुदृढ़ समाज निर्माण
सकारात्मकता ही शक्ति है
नकारात्मक बातें उठाने या अविश्वास फैलाने से समाज में बिखराव आता है।

हमें उन प्रयासों को उजागर करना चाहिए जो समाज में समता, बंधुता, शिक्षा और न्याय चेतना का प्रसार कर रहे हैं, और जागरूक कर रहे हैं

संस्थाओं का संबल बनें
सामाजिक संस्थाएं समाज का रक्षा-कवच हैं।

उनकी छोटी-मोटी त्रुटियों पर प्रहार करने के बजाय, उन्हें सही मार्गदर्शन देना और उनका सहयोग करना प्रबुद्ध वर्ग का कर्तव्य है।

भविष्य की ओर कदम
अतीत के 11 वर्षों की कमियों पर केवल आरोप-प्रत्यारोप लगाने के बजाय, आज से यह संकल्प लेना आवश्यक है कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील प्रक्रिया हेतु पीड़ित पक्ष को सर्वश्रेष्ठ कानूनी सहायता कैसे उपलब्ध कराई जाए।

डांगावास प्रकरण निश्चित ही एक दुखद त्रासदी है, किंतु इस दर्द पर केवल तीखे कटाक्ष करने के बजाय नम्रता, सहानुभूति और सकारात्मकता के साथ पीड़ित परिवारों का हाथ थामना ही सच्ची सामाजिक सेवा और अम्बेडकरवादी मूल्यों का वास्तविक सम्मान है।

लेखक:
सोहन लाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर (राजस्थान) |
संपर्क: 94622-60179

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