भारत की मिट्टी में आस्था (यक़ीन) और अंधविश्वास (ख़ाम-ख़याली) की जड़ें गहरी हैं। गाँव की पगडंडी से लेकर शहर की चौड़ी सड़क तक, आज भी झंडा उठाए, पचरंगे कपड़े पहने, जयकारे लगाते लोग पैदल यात्राएँ करते नज़र आते हैं। डिग्गी कल्याण जी की यात्रा हो, अजमेर ख़्वाजा साहब के जायरीन (श्रद्धालु) हों, रामदेवरा जाने वाले जातरू हों या सवाईभोज और जोगमाया के भक्त — यह सब तस्वीरें हमारे समाज की रूढ़ मान्यताओं और बेबसी को दिखाती हैं।


गरीब तबके की यात्रा : आस्था या मजबूरी?

अगर ग़ौर से देखो तो इन यात्राओं में सबसे आगे वही लोग हैं जिन्हें ठेठ देसी भाषा में ग़रीब गुरबा, मजूर-किसान, बंजारे, खेतिहर कहा जाता है।

यहाँ सबसे ज्यादा भीड़ दलित, आदिवासी, छोटे कृषक और मेहनतकश मज़दूरों की होती है।

अमीर, व्यापारी, फैक्ट्री मालिक या बाबू-कर्मचारी इन यात्राओं में शायद ही नज़र आएं।

अमीर आदमी हवाई जहाज़ या हेलिकॉप्टर से मन्नत पूरी कर लेता है, लेकिन गरीब पैदल अपनी जान जोखिम में डालकर निकलता है।

यहाँ सवाल खड़ा होता है — आखिर यह आस्था है या अक्ल से पैदलपन?


फसल और रोज़गार से दूरी

जब खेतों में फसल पकने को होती है, जब तालाब-नाले भरने का मौसम होता है, तब किसान और मज़दूरों का घर छोड़कर झंडा उठाना उनके परिवार की रोज़ी-रोटी को ही चोट पहुँचाता है।

गाय-भैंस, बैल-बकरी, बच्चे और औरतें सब पीछे छूट जाते हैं। औरतें कहती हैं — “मन्नत मानी थी, बाबा के धाम पैदल जाना पड़ेगा।” यह सोच उनकी बेचारगी और बेबसी को दर्शाती है।


सरकार और समाज की विफलता

यह स्थिति केवल समाज की देन नहीं है। इसमें राज्य और केंद्र की सरकारों का भी बहुत बड़ा हाथ है।

शिक्षा (एजुकेशन) की रोशनी अब तक गाँव-गाँव तक नहीं पहुँची।

अंधविश्वास मिटाने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनी।

विज्ञान (साइंस) और तर्क (लॉजिक) को शिक्षा का हिस्सा बनाना चाहिए था, पर सियासत (पॉलिटिक्स) ने इसे हाशिये पर डाल दिया।

जब सरकार और समाज दोनों हार जाते हैं, तभी आदमी कहता है — “अब ऊपरवाला ही सहारा है।”


सूचना क्रांति और अंधविश्वास

कहा गया था कि सूचना क्रांति (इन्फ़ॉर्मेशन रिवॉल्यूशन) लोगों के लिए ज्ञान का दीपक बनेगी। लेकिन हुआ इसका उल्टा।

आज सोशल मीडिया, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और यूट्यूब चैनलों पर बाबाओं के चमत्कार, तावीज़, झाड़फूँक और नकली कहानियाँ सबसे ज्यादा वायरल होती हैं।

यह क्रांति अंधविश्वास के लिए पेट्रोल साबित हुई।
लोग सवाल पूछने की बजाय “फ़ॉरवर्ड” दबा देते हैं। और इस तरह अंधविश्वास मिटने के बजाय और मजबूत हो गया।


आस्था बनाम तर्क

भक्ति (इबादत) ग़लत नहीं है। लेकिन अंधभक्ति (बे-सिर-पैर का यक़ीन) बेहद खतरनाक है। ठेठ देसी बोली में कहें तो —

“भगवान को मानो, पर अपने खेत-खलिहान मत भूलो।”

“मन्नत मांगो, पर बच्चों की पढ़ाई छुड़वाकर नहीं।”

“बाबा की राह पकड़ो, पर अक्ल मत छोड़ो।”

भंवर मेघवंशी जी सही कहते हैं — यह आध्यात्म का रास्ता नहीं, बल्कि बर्बादी का रास्ता है।


अंधविश्वास और मौत का गौरव

इन यात्राओं में हर साल सैकड़ों लोग साँप के डसने, सड़क हादसे, बाढ़ या बीमारी से जान गंवा देते हैं।
लेकिन यहाँ एक और अंधविश्वास गहरे बैठा हुआ है।

लोग मानते हैं कि — “जिसकी मौत यात्रा में हुई, उसे देवता ने अपने पास बुला लिया। उसकी गति हो गई, उसका मोक्ष हो गया।”

घर वाले इसे अपनी तक़दीर का बोझ मानने की बजाय गर्व (प्राइड) की तरह महसूस करते हैं। वे सोचते हैं कि जैसे उनके परिवार के सदस्य ने देवता को बलिदान दे दिया। दुख और आँसू के बजाय वे इसे “भाग्यशाली” मानकर दूसरों के सामने शान से बताते हैं।

असल में यह दुख को ढकने का एक मनोवैज्ञानिक तरीका है, लेकिन समाज इसे गौरव और पुण्य का रूप देकर और मजबूत कर देता है। इस सोच से मौत भी सवाल उठाने का अवसर नहीं देती, बल्कि अंधविश्वास को और पुख़्ता कर देती है।


विकल्प : असली मनौती क्या हो?

अगर सचमुच मनौती करनी है तो क्यों न यह हो:

“मैं वचन देता हूँ कि गाँव में कोई बच्चा भूखा नहीं सोएगा।”

“मैं प्रण करता हूँ कि बेटी की पढ़ाई छुड़वाऊँगा नहीं।”

“मैं ठान लेता हूँ कि खेत में पानी बचाऊँगा।”

यही असली इबादत (भक्ति) होगी, यही असली सेवा (सर्विस) होगी।


दलित-आदिवासी और गरीबों का प्रश्न

दलित (अछूत), आदिवासी (वनवासी) और मज़दूर वर्ग — यही इन यात्राओं का सबसे बड़ा हिस्सा हैं। असल में यह सियासत (पॉलिटिक्स) की नाकामी का नतीजा है।

अगर शिक्षा (एजुकेशन) होती तो वह सवाल पूछते।

अगर रोज़गार (एम्प्लॉयमेंट) होता तो वह मीलों पैदल नहीं चलते।

अगर स्वास्थ्य सुविधा (हेल्थ फ़ैसिलिटी) होती तो वह तावीज़-झाड़फूँक के चक्कर में न पड़ते।


सोचना क्रांति की जरूरत

आज सबसे बड़ी कमी यह है कि सोचना क्रांति (विचार क्रांति) पर भरोसा नहीं रहा।

लोग विज्ञान (साइंस) की बजाय चमत्कार की ओर झुक रहे हैं।

मेहनत पर भरोसा कम और करिश्मे पर भरोसा ज़्यादा हो गया है।

यह मानसिक हार (डीफ़ीट ऑफ़ माइंड) है।

जरूरत है कि समाज और सरकार मिलकर लोगों को तर्क, विज्ञान और शिक्षा की राह दिखाएँ। तभी यह झंडों वाली अंधी दौड़ रुकेगी।


निष्कर्ष

आस्था (Faith) इंसान को जोड़ सकती है, लेकिन अंधभक्ति (Blind Faith) उसे तोड़ देती है।
यह झंडा उठाए चलना सिर्फ़ धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि उस टूटी हुई व्यवस्था का आईना है जिसने गरीब आदमी को मज़लूम और बेबस बना दिया है।

जब तक सरकारें शिक्षा (एजुकेशन), रोज़गार (एम्प्लॉयमेंट) और तर्क (लॉजिक) पर काम नहीं करेंगी, तब तक गरीब आदमी अपनी किस्मत (क़िस्मत) ऊपरवाले पर छोड़ता रहेगा। और जब तक मौत को भी “मोक्ष” मान लिया जाएगा, तब तक यह चक्र टूटा नहीं जाएगा।

समापन शेर (सद्भावना भाव के साथ)

“जितना यक़ीन है तुझको दुआओं की ताक़त पर,
उतना भरोसा कर ले अपने हाथ की मेहनत पर।”

संकलनकर्ता लेखक
हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।

स्रोत और संदर्भ

भंवर मेघवंशी, शून्यकाल,
स्थानीय अवलोकन,
दलित-आदिवासी आंदोलनों पर अध्ययन,
सूचना क्रांति पर शोध लेख,
सामाजिक वैज्ञानिकों के विचार,
भारत की पदयात्राओं पर रिपोर्ट।

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