हालिया 4 मई 2026 केचुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति की दिशा को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी की स्थिति मजबूत होती दिखाई दे रही है, वहीं कई क्षेत्रीय दलों का प्रभाव अपेक्षाकृत कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। यह परिदृश्य 2029 के लोकसभा चुनाव की संभावनाओं को नई दृष्टि से देखने का संकेत देता है। हालांकि, यह भी सच है कि क्षेत्रीय दल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, बल्कि उनकी राजनीतिक पकड़ कुछ क्षेत्रों में ढीली हुई है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या आने वाला चुनाव द्विध्रुवीय होगा या फिर क्षेत्रीय शक्तियां अभी भी निर्णायक भूमिका निभाएंगी।
पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति को एक बार फिर गहन विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। अनेक विश्लेषणों और जन-चर्चाओं में यह धारणा उभर रही है कि देश के कई क्षेत्रीय दल अब लगभग “समाप्त” हो चुके हैं और 2029 का लोकसभा चुनाव मुख्यतः दो राष्ट्रीय शक्तियों—भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस—के बीच सीधी टक्कर के रूप में सामने आएगा। किंतु इस निष्कर्ष को अंतिम सत्य मान लेना भारतीय लोकतंत्र की जटिलता को नज़रअंदाज़ करना होगा। अधिक सटीक आकलन यह है कि कई क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कमजोर हुआ है, पर उनका अस्तित्व और प्रासंगिकता अब भी कायम है।
भारतीय राजनीति की संरचना बहुस्तरीय है, जहाँ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों प्रकार की शक्तियाँ समानांतर रूप से कार्य करती हैं। क्षेत्रीय दल केवल चुनावी मशीनरी नहीं हैं, बल्कि वे अपने-अपने राज्यों की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय आकांक्षाओं के प्रतिनिधि होते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कषगम, बीजू जनता दल जैसे दल अपनी-अपनी भौगोलिक सीमाओं में आज भी मजबूत सामाजिक आधार रखते हैं।
बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल का प्रभाव यादव और मुस्लिम मतदाताओं पर आधारित रहा है, जबकि जनता दल (यूनाइटेड) ने अति पिछड़े वर्गों, कुर्मी समाज और महादलितों के बीच अपनी पहचान बनाई। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने दलित समाज को राजनीतिक रूप से संगठित कर एक नई दिशा दी। भले ही इन दलों का वोट प्रतिशत घटा हो, लेकिन इनकी सामाजिक जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन्हें “समाप्त” कहना वास्तविकता से परे है।
दक्षिण भारत में द्रविड़ मुनेत्र कषगम केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि तमिल पहचान, भाषा और सामाजिक न्याय की विचारधारा का प्रतिनिधि है। कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) का प्रभाव वोक्कालिगा समुदाय में देखा जाता है। तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति ने राज्य निर्माण आंदोलन के आधार पर अपनी राजनीति खड़ी की, जो आज भी उसके समर्थन का मुख्य स्रोत है।
पूर्वी भारत में तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में मजबूत जनाधार बनाए हुए है, जबकि बीजू जनता दल ओडिशा में लंबे समय तक स्थिर शासन और क्षेत्रीय विकास के कारण लोकप्रिय रहा है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल का आधार सिख समुदाय और कृषि राजनीति से जुड़ा है।
इसी प्रकार, आम आदमी पार्टी ने शहरी शासन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत किया, जिससे दिल्ली और पंजाब में उसे समर्थन मिला। महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तथा शिव सेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय नेतृत्व को केंद्र में रखा। हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल का आधार जाट समुदाय रहा है, जबकि केरल और बंगाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) वर्ग आधारित राजनीति का प्रतिनिधित्व करती रही है।
यह सत्य है कि इन चुनावों में इन दलों के प्रदर्शन में गिरावट देखने को मिली है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—नेतृत्व का अभाव, संगठनात्मक कमजोरी, आंतरिक विभाजन या बदलते राजनीतिक समीकरण। इसके साथ ही, भारतीय जनता पार्टी ने अपने सुदृढ़ संगठन, संसाधनों और रणनीतिक विस्तार के माध्यम से कई राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत की है। वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी नए नेतृत्व, गठबंधनों और जन-आंदोलनों के जरिए अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश कर रही है।
इन परिस्थितियों में यह संभावना बनती है कि 2029 का लोकसभा चुनाव इन दोनों राष्ट्रीय दलों के बीच मुख्य प्रतिस्पर्धा के रूप में उभरे। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारतीय राजनीति केवल “दो ध्रुवों” की कहानी नहीं है। यहाँ क्षेत्रीय दल अक्सर सत्ता संतुलन के निर्णायक कारक बनते हैं। यदि कोई भी राष्ट्रीय दल पूर्ण बहुमत से दूर रहता है, तो यही क्षेत्रीय दल गठबंधन की राजनीति में “किंगमेकर” की भूमिका निभाते हैं।
इसके अतिरिक्त, भारत का मतदाता अब पहले से अधिक जागरूक और विवेकशील हो चुका है। वह केवल राष्ट्रीय स्तर की बयानबाज़ी से प्रभावित नहीं होता, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास, स्थानीय नेतृत्व की विश्वसनीयता और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को भी ध्यान में रखता है। यही कारण है कि कई बार राष्ट्रीय लहर के बावजूद क्षेत्रीय दल अपने गढ़ में मजबूत बने रहते हैं।
भविष्य की राजनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्षेत्रीय दल समय-समय पर स्वयं को पुनर्गठित भी करते हैं। वे नए नेतृत्व को आगे लाते हैं, अपनी रणनीति बदलते हैं और बदलते सामाजिक समीकरणों के अनुसार खुद को ढालते हैं। इसलिए उन्हें स्थायी रूप से कमजोर मान लेना एक बड़ी राजनीतिक भूल हो सकती है।
कुल मिलाकर भारत की राजनीति इस और इशारा कर रही है कि, 2029 का लोकसभा चुनाव निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच मुख्य प्रतिस्पर्धा का रूप ले सकता है, लेकिन यह कहना कि क्षेत्रीय दल समाप्त हो गए हैं, वास्तविकता से परे है। वे आज भी भारतीय लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं—कभी निर्णायक सहयोगी, कभी सशक्त विपक्ष और कभी अपने-अपने राज्यों में प्रमुख शक्ति के रूप में।
भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी विविधता और बहुलता में निहित है। यहाँ कोई भी राजनीतिक शक्ति स्थायी रूप से कमजोर या समाप्त नहीं होती; समय, परिस्थितियों और जनता के निर्णय के साथ उसका स्वरूप बदलता रहता है। इसलिए 2029 की राजनीति को समझने के लिए हमें इस जटिलता और विविधता को स्वीकार करना होगा, न कि उसे केवल दो दलों के बीच सीमित कर देना चाहिए।
सम्पादक जागो हुक्मरान समाचारपत्र
