भूमिका

वंचित और बहुजन समाज का पुरुष सदियों से सामाजिक आधिपत्य की ऐसी मानसिकता में जीता आया है, जहाँ दूसरों की सेवा को अपना कर्तव्य और अपनी चुप्पी को अच्छाई समझता रहा।
स्वाभिमान धीरे-धीरे पीछे छूटता गया और दूसरों की सुविधा उसके जीवन का हिस्सा बन गई।वह मदद करता है, समझौते करता है और अपनी जरूरतों से पहले दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करता है।
लेकिन जिस दिन वह पहली बार अपने लिए खड़ा होकर ‘अब नहीं’ कहता है, उसी दिन उसके पुराने संबंधों की वास्तविकता सामने आने लगती है।उसका बदलना नहीं, केवल अपनी सीमा तय करना ही कुछ लोगों को बुरा लगने लगता है।यहीं से आत्मसम्मान की नई शुरुआत होती है।

  1. सेवा को अपना कर्तव्य समझने की मानसिकता

बहुजन वंचित पुरुष को लंबे समय तक यह विश्वास दिलाया गया कि प्रभावशाली लोगों के काम आना ही उसकी सामाजिक उपयोगिता है।
पुरुषार्थ (परिश्रम और साहस) तभी सार्थक है जब उसका उपयोग स्वयं और परिवार के उत्थान में हो।वह दूसरों के बुलाने पर तुरंत पहुँचता है, छोटे-बड़े काम करता है और बदले में सम्मान की उम्मीद भी नहीं रखता।धीरे-धीरे उसकी मेहनत को स्वाभाविक मान लिया जाता है और उसके इंकार को असामान्य समझा जाता है।
जब कोई व्यक्ति लगातार देता रहता है, तो सामने वाला उस सहयोग को अधिकार समझने लगता है।
ऐसी स्थिति में अपनी मेहनत का मूल्य पहचानना जरूरी है।
सम्मान वही है जिसमें दोनों पक्षों की बराबरी बनी रहे।अपने समय और श्रम को मुफ्त की वस्तु समझना स्वयं के साथ अन्याय है।
हर संबंध में अपना स्पेस (निजी जगह) सुरक्षित रखना आवश्यक है।गैरत (आत्मसम्मान) व्यक्ति को याद दिलाती है कि सेवा करना अच्छी बात है, लेकिन गुलामी स्वीकार करना नहीं।

2 ‘ना’ कहने पर बदलता व्यवहार

जब तक वंचित पुरुष हर मांग पूरी करता है, तब तक उसे अच्छा, समझदार और भरोसेमंद कहा जाता है।संकल्प (दृढ़ निश्चय) तभी दिखाई देता है जब व्यक्ति दबाव के बावजूद अपने निर्णय पर कायम रहता है।
समस्या उस समय शुरू होती है जब वह पहली बार किसी काम के लिए मना करता है।
अचानक वही व्यक्ति स्वार्थी, अकड़ू या बदल गया हुआ दिखाई देने लगता है।
असल में उसके चरित्र में परिवर्तन नहीं आया होता, केवल दूसरों की सुविधा कम हुई होती है।यही अंतर समझना जरूरी है कि सम्मान और उपयोग में बहुत फर्क है।जो संबंध केवल आपकी उपलब्धता पर टिके हों, उनमें बराबरी नहीं होती।ना कहना किसी के प्रति अपमान नहीं, बल्कि अपने जीवन के प्रति जिम्मेदारी है।
अपनी लिमिट (सीमा) स्पष्ट करना स्वस्थ संबंधों की पहचान है।
रवैया (व्यवहार) बदलने वालों से डरने के बजाय कारण समझना चाहिए कि उन्हें आपकी सहमति चाहिए थी या आपका साथ।

  1. आधिपत्य से मुक्ति की शुरुआत

बहुजन वंचित समाज के पुरुष के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाहरी विरोध से अधिक भीतर बैठा डर है।आत्मबोध (अपने अस्तित्व की समझ) व्यक्ति को यह पहचानने की शक्ति देता है कि उसका जीवन भी निर्णयों और अधिकारों से बना है।
जिस व्यवस्था में एक वर्ग आदेश देता रहा और दूसरा बिना सवाल किए पालन करता रहा, वहाँ बराबरी की शुरुआत प्रश्न पूछने से होती है।
अपने श्रम का उचित मूल्य माँगना, अनुचित आदेश को अस्वीकार करना और अपमानजनक व्यवहार का विरोध करना विद्रोह नहीं है।
यह मनुष्य होने की स्वाभाविक आवश्यकता है।
हर बार झुकना विनम्रता नहीं होता; कभी-कभी वह मजबूरी होती है।
अपनी आइडेंटिटी (पहचान) दूसरों की स्वीकृति से नहीं, अपने कर्म और निर्णयों से बनानी चाहिए।
तौहीन (अपमान) सहकर संबंध बचाना किसी उपलब्धि का प्रमाण नहीं है।सम्मान माँगने से पहले स्वयं को सम्मान देना सीखना होगा।

  1. अच्छाई रहे, लेकिन शोषण नहीं

अच्छा इंसान होना कमजोरी नहीं है। दूसरों की मदद करना, संकट में साथ खड़ा होना और जरूरतमंद के काम आना समाज को बेहतर बनाता है।
मर्यादा (उचित सीमा) यह तय करती है कि सहायता कहाँ समाप्त होती है और शोषण कहाँ से शुरू होता है।
यदि आपकी विनम्रता को कमजोरी, आपकी चुप्पी को सहमति और आपकी मदद को स्थायी जिम्मेदारी मान लिया जाए, तो वहाँ बदलाव आवश्यक है।
किसी को प्रसन्न रखने के लिए लगातार अपनी इच्छाओं का त्याग करना समझदारी नहीं है।अपनी चॉइस (चुनाव) को महत्व देना आत्मनिर्भरता का संकेत है।दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हुए अपने अधिकारों की रक्षा करना ही संतुलित जीवन है।इल्तिजा (विनती) करने की स्थिति से निकलकर बराबरी के संवाद तक पहुँचना जरूरी है।
अच्छाई तभी सुंदर है, जब उसके साथ आत्मसम्मान भी सुरक्षित रहे।

समापन
वंचित और बहुजन समाज के पुरुष को अब यह समझना होगा कि उसकी मेहनत किसी की जागीर नहीं और उसकी सहनशीलता किसी को स्थायी अधिकार नहीं देती।स्वतंत्रता (बंधन से मुक्ति) का अर्थ केवल बाहरी व्यवस्था बदलना नहीं, बल्कि भीतर की गुलामी को पहचानना भी है।
जो लोग आपकी उपलब्धता को अपना अधिकार समझते हैं, उनके नाराज़ होने से आपको अपने निर्णय गलत नहीं मान लेने चाहिए।आप मदद करें, लेकिन अपनी गरिमा खोकर नहीं। संबंध निभाएँ, लेकिन स्वयं को मिटाकर नहीं।बेबसी (लाचारी) को जीवन का स्थायी परिचय बनाने के बजाय अपने श्रम, समय और निर्णय पर अधिकार स्थापित करना ही वास्तविक परिवर्तन की शुरुआत है।

शेर
जो झुकते रहे, उन्हें इस्तेमाल किया गया; जो तनकर खड़े हुए, उनका सम्मान हुआ।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक. 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाडोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)

स्रोत व संदर्भ
यह लेख सामाजिक समानता, स्वाभिमान, न्याय, अधिकार, बहुजन चेतना और मानव गरिमा के संवैधानिक तथा सामाजिक मूल्यों पर आधारित है।

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