(संबोधन के रूप में)

मंच पर उपस्थित सभी जागरूक साथियों और सामने बैठे मेरे शेर दिल बहुजन भाइयों!
आज मैं यहाँ आपके सामने कोई मीठी-मीठी बातें करने नहीं आया हूँ, बल्कि सदियों से हमारे सीने में दबी उस आग को भड़काने आया हूँ जिसे तथाकथित उच्च समाज ने ‘संस्कार’ की राख तले दबा कर रखा है। शताब्दियों से जिसे केवल सहना सिखाया गया, आज उस बहुजन और वंचित समाज के पुरुष को अपनी असली ताकत पहचाननी होगी! यह तथाकथित उच्च समाज हमेशा से चाहता आया है कि वंचित वर्ग का पुरुष रीढ़विहीन होकर जिए, घुटने टेककर जिए। लेकिन ये जालिम भूल गए कि हमारी रगों में महात्मा ज्योतिराव फुले का त्याग, बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर का ज्ञान और पेरियार ई.वी. रामासामी का स्वाभिमान दौड़ रहा है! आज का यह भाषण मूक सहमति के उस पिंजरे को तोड़ने का एक सीधा ऐलान-ए-जंग (
युद्ध की घोषणा) है, जिसे तथाकथित व्यवस्था आपकी शराफत कहती है!
साथियों! जब एक बहुजन या वंचित समाज का पुरुष किसी दफ़्तर में, किसी कार्यस्थल पर या समाज के किसी ऊंचे मंच पर कदम रखता है, तो तथाकथित उच्च समाज उससे सबसे पहली कायरतापूर्ण अपेक्षा क्या रखता है? वह चाहता है कि आप अपनी बुद्धि और तर्क को घर पर छोड़कर आएं! जब तक आप उनकी हर सही-गलत बात पर, उनके हर जायज-नाजायज हुक्म पर ‘हाँ में हाँ’ मिलाते रहेंगे, तब तक आप उनकी नज़रों में सबसे समझदार हैं, सबसे प्यारे हैं और उनके अपने हैं। इस सड़ी-गली व्यवस्था में आपके ज्ञान या हुनर का पैमाना यह नहीं है कि आप कितने काबिल हैं, बल्कि यह है कि आप कितने बड़े ताबेदार ( फरमांबरदार – आज्ञाकारी) हैं! प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो इस प्रकार का गुलामू व्यवहार कामकाजी माहौल में सबऑर्डिनेशन (
अधीनता या अधीन होना) की उस औपनिवेशिक मानसिकता का प्रतीक है, जहाँ निचले पायदान के इंसान को सिर्फ एक मशीन समझकर हुक्म का गुलाम बना दिया जाता है। लेकिन आज हमें इस अधीनता को लात मारनी होगी!
मेरे भाइयों! इस शोषक मानसिकता को कभी भी सच्चे, ईमानदार और वफ़ादार लोग नहीं चाहिए होते; इन्हें तो सिर्फ और सिर्फ ग़ुलाम चाहिए होते हैं! वे चाहते हैं कि वंचित समाज का पुरुष बिना सोचे-समझे उनके पीछे भेड़ों की तरह चले और बिना कोई सवाल किए अपना सर झुकाए रखे। यदि आप अपनी कोई स्वतंत्र सोच नहीं रखते और उनके सामने रीढ़विहीन बनकर खड़े रहते हैं, तो आप उनके लिए सबसे हसीन ( खूबसूरत – सुंदर) और आदर्श पुरुष हैं। प्रशासनिक ढांचे में इस कायरतापूर्ण आत्मसमर्पण को रेजिग्नेशन ( – आत्मसमर्पण या पद स्वीकार कर लेना) के रूप में देखा जाता है, जहाँ एक व्यक्ति व्यवस्था के खौफ़ से अपने मौलिक अधिकारों और अपने आत्मसम्मान का पूरी तरह से परित्याग कर देता है। महात्मा ज्योतिराव फुले ने अपनी कालजयी रचना ‘गुलामगिरी’ में इसी मानसिकता के परखच्चे उड़ाए थे। उन्होंने साफ कहा था कि शोषक वर्ग को कभी भी पढ़ा-लिखा और तार्किक बहुजन नहीं चाहिए, उन्हें सिर्फ मुफ्त में खटने वाला गुलाम चाहिए। आज हमें फुले का वो हंटर उठाना होगा और इस मानसिक गुलामी की बेड़ियों को काट फेंकना होगा!
अब आइए उस कड़वे सच पर, जो हर दिन हमारे भाई दफ्तरों और फैक्ट्रियों में झेलते हैं—कार्यस्थल की गंदी राजनीति और मेहनत की डकैती! दिन-रात पसीना आप बहाते हैं, प्रोजेक्ट को सफल आप बनाते हैं, लेकिन जब तारीफ और प्रमोशन की बारी आती है, तो तथाकथित उच्च समाज के ‘साहब’ आपके कार्य का पूरा श्रेय खुद डकार जाते हैं। वे आपकी पीठ थपथपाने के बजाय आपको कोने में धकेल देते हैं, क्योंकि वे एक वंचित समाज के पुरुष को नेतृत्व करते हुए देख ही नहीं सकते! इस गंदी कॉर्पोरेट और दफ्तरशाही राजनीति के खिलाफ हमें अपना इक्का ( हुक्म का पत्ता – सबसे शक्तिशाली साधन/हथियार) निकालना होगा, जो है हमारा लिखित और ठोस काम। प्रशासन की भाषा में इसे मैलप्रैक्टिस (कदाचार या पद का दुरुपयोग) और क्रेडिट थेफ्ट( कार्य के श्रेय की चोरी) कहा जाता है, जहाँ आपके अधिकारों का हनन करने के लिए झूठे परफॉरमेंस रिव्यू और भेदभावपूर्ण टूल अपनाए जाते हैं। अब चुप रहकर अपना श्रेय चोरी नहीं होने देना है, अपनी काबिलियत का ऑन-रिकॉर्ड हिसाब मांगना है!
याद रखिए साथियों! जिस दिन बहुजन समाज का पुरुष जागृत होता है, जिस दिन वह बाबासाहेब के ‘एनिहिलेशन ऑफष् कास्ट’ यानी जाति के उच्छेद के महामंत्र को समझ लेता है और भरी सभा में सच बोल देता है, उसी दिन इस तथाकथित उच्च समाज के सिंहासन हिलने लगते हैं! जैसे ही आप अपनी स्वतंत्र सोच को उनके सामने रखेंगे या कार्यस्थल पर हो रहे किसी अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएंगे, तथाकथित उच्च समाज की नज़रों में आप तुरंत ‘बदतमीज़’, अहंकारी, बागी और मतलबी हो जाएंगे! आपकी तार्किकता को ये लोग अनुशासनहीनता का नाम दे देते हैं। इस स्थिति को प्रशासनिक शब्दावली में अवज्ञा या हुक्म न मानने का नाम देकर आपको चार्जशीट करने, डराने और दबाने की कोशिश की जाती है, ताकि कोई भी दूसरा बहुजन शेर स्थापित सत्ता या व्यवस्था के खिलाफ दहाड़ने का साहस न कर सके। लेकिन मैं आपसे पूछना चाहता हूँ—क्या आप इस तथाकथित ‘बदतमीज़ी’ के तमगे से डरेंगे? नहीं! यह बदतमीज़ी नहीं, यह हमारे आत्मसम्मान का पहला शंखनाद है!
सुनो भाइयों! अक्सर हमें बचपन से, हमारे घरों में और समाज में यह घुट्टी पिलाई जाती है कि “बेटा, चुप रहो, शांत रहो, तुम्हारी ख़ामोशी ही तुम्हारा सबसे बड़ा संस्कार है।” आज मैं इस मंच से चीख-चीख कर कहना चाहता हूँ कि यह ख़ामोशी कोई संस्कार नहीं है, बल्कि यह वह मीठा ज़हर है जो सदियों से हमारी नसों में घोला जा रहा है! जहाँ आपकी ख़ामोशी को ‘संस्कार’ का नाम देकर उसकी सराहना की जाए, समझ जाना कि वहाँ आपकी फ़हम ( फहम – समझ या बुद्धि) को हमेशा के लिए दफ़्न करने की गहरी साज़िश रची जा रही है! बाबासाहेब आंबेडकर ने कड़े शब्दों में चेताया था कि ग़ुलाम को उसकी ग़ुलामी का अहसास करा दो, वह खुद-ब-खुद विद्रोह कर देगा। इस चुप्पी के जाल को प्रशासनिक संदर्भ में सप्रेसंन ( दमन या कुचलना) कहा जाता है, जहाँ बिना लाठी-गोली चलाए, केवल मनोवैज्ञानिक दबाव के ज़रिए आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया जाता है। हमें इस दमन को सहना बंद करना होगा! अपनी खामोशी को तोड़ना होगा!
अब ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए कि आखिर यह तथाकथित उच्च समाज हमसे ऐसी दमनकारी अपेक्षाएँ रखता ही क्यों है? आखिर क्यों थरथराता है यह समाज हमारे एक सवाल से? इसका सीधा सा कारण है—सत्ता, संपत्ति, संसाधन और वर्चस्व पर सदियों से जमा उनका अवैध कब्ज़ा! वे जानते हैं कि जिस दिन बहुजन समाज का पुरुष शिक्षित होकर, पेरियार ई.वी. रामासामी के आत्मसम्मान आंदोलन की मशाल थामकर खड़ा हो जाएगा, उस दिन उनकी जागीरदारी ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी! पेरियार कहते थे कि जो व्यवस्था तुम्हें इंसान नहीं मानती, उसे ठुकरा देना ही तुम्हारा पहला कर्तव्य है। शोषक वर्ग अपनी गद्दी और प्रभाव को बचाए रखने के लिए हमें हमेशा मानसिक रूप से कमतर और आश्रित बनाए रखना चाहता है। इसे समाजशास्त्र और प्रशासन में हेजीमनी ( आधिपत्य या सांस्कृतिक वर्चस्व) की नीति कहा जाता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य दूसरों की सोच पर अपना नियंत्रण बनाए रखना होता है। वे हमारे भीतर उठने वाले सवालों के खौफ़ से जीते हैं!
मेरे भाइयों, जरा अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा करो और पहचानो कि तुम कौन हो! तुम उस मिट्टी की संतान हो जिसने कभी झुकना नहीं सीखा। जब तुम सुबह उठकर काम पर निकलते हो, तो यह मत सोचो कि तुम सिर्फ रोजी-रोटी कमाने जा रहे हो, बल्कि यह सोचो कि तुम अपनी आने वाली नस्लों के लिए एक नया इतिहास रचने जा रहे हो! तुम्हारे भीतर वह रवां ( बहता हुआ/गतिशील) ऊर्जा है जो पहाड़ों का सीना चीरकर रास्ता बना सकती है। विपरीत परिस्थितियाँ तुम्हें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हें फौलाद बनाने के लिए आती हैं। जब तुम पर उँगलियाँ उठाई जाएँ, जब तुम्हें कमजोर साबित करने की कोशिश की जाए, तो अपनी मेहनत और बुद्धिमत्ता से ऐसा करारा जवाब दो कि उनकी साजिशें खुद बिखर जाएँ। प्रशासनिक स्तर पर इसे रेज़िलिएंस ( विपरीत परिस्थितियों से उबरने की क्षमता या लचीलापन) और एंपावरमेंट ( सशक्तिकरण) कहते हैं, जहाँ व्यक्ति हर आघात को अपनी ताकत में तब्दील कर देता है। तुम रुकने के लिए नहीं, बल्कि इस व्यवस्था पर राज करने और समता लाने के लिए पैदा हुए हो!
तो फिर साथियों, इस घुटन भरे माहौल से बाहर निकलने का रास्ता क्या है? रास्ता सीधा है—हुंकार भरो और अपना इतिहास खुद लिखो! बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने हमें तीन जादुई शब्द दिए थे: “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।” जब तक आप अपने भीतर के ज़मीर (अंतरात्मा – अंतःकरण की आवाज़) को ज़िंदा रखेंगे, दुनिया की कोई ताकत आपको अपना गुलाम नहीं बना सकती! हमें तथाकथित उच्च समाज के किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं है कि हम कब अच्छे लग रहे हैं और कब बुरे। जब आप प्रशासनिक व्यवस्था में और अपने कार्यस्थल पर पूरी ताकत से अपनी इक्विटी ( समता या निष्पक्षता) का दावा ठोकेंगे, जब आप अपने हक़ की वकालत खुद करेंगे, तभी सत्ता के गलियारों में आपकी धमक गूंजेगी!
मेरे वीर साथियों! अब समय आ गया है कि अपनी आँखों से लाचारी के आंसू पोंछकर उनमें क्रांति के अंगारे भर लिए जाएं। फुले ने जो शिक्षा की अलख जगाई, पेरियार ने जो आत्मसम्मान का स्वाभिमान दिया और बाबासाहेब ने जो संविधान का अचूक हथियार हमारे हाथों में दिया है, आज उसे उठाने का वक्त आ गया है। अपने भीतर के उस जलाल ( जलाल – क्रोध मिश्रित प्रताप या तेज़) को पहचानो जो सदियों के अन्याय को भस्म करने की ताकत रखता है!
अपनी ख़ामोशी को संस्कार कहने वाले पाखंडियों के मुंह पर बाबासाहेब का संविधान, फुले का हंटर और पेरियार का आत्मसम्मान दे मारिए! उठो और हुंकार भरो, क्योंकि तुम्हारी सोच को कैद करने वाले पिंजरे अब सड़ चुके हैं, कमज़ोर हो चुके हैं। सर झुकाकर ग़ुलाम की तरह सौ साल जीने से बेहतर है, सर उठाकर शेर की तरह एक दिन जीना! आज इस मंच से कसम खाइए कि जब तक हम इस समतामूलक समाज का निर्माण नहीं कर लेते, हमारा यह कारवां रुकेगा नहीं। उठो, जागो, लड़ो और जीतो!
जय भीम! जय ज्योति! जय पेरियार! इनकलाब ज़िंदाबाद!

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)

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