मैं एक बेरोजगार युवक हूँ—या यूँ कहूँ कि मैं एक चलती-फिरती उम्मीद हूँ, जो धीरे-धीरे धुंधला रही है। सुबह जब सूरज की पहली किरण मेरे कमरे की खिड़की से छनकर आती है, तो वह मेरे लिए कोई नई उमंग नहीं, बल्कि एक और संघर्षपूर्ण दिन की शुरुआत लेकर आती है। दिन की शुरुआत अखबार के पन्नों में नौकरियां तलाशने और मोबाइल पर नई वैकेंसी के नोटिफिकेशन चेक करने से होती है। हर नया दिन एक आस लेकर आता है, लेकिन शाम ढलते-ढलते वही आस एक गहरी हताशा में बदल जाती है। मेरी जिंदगी अब तारीखों, परीक्षाओं के फॉर्म, एडमिट कार्ड और रिजेक्शन ईमेल के बीच सिमट कर रह गई है। बेरोजगारी केवल जेब का खाली होना नहीं है, यह तो आत्मा का धीरे-धीरे छलनी होना है। यह उन अनगिनत सपनों की खामोश पीड़ा है, जिन्हें मैंने रात-रात भर जागकर, अपनी आंखों में संजोया था। सालों की कड़ी मेहनत, किताबों के साथ बिताए गए लंबे वक्त और परीक्षा केंद्रों के चक्कर काटने के बाद भी आज जब मेरे हाथ खाली हैं, तो दिल के किसी कोने में एक चीख उठती है, जो बाहर नहीं आ पाती।
मैं भारत का एक जिम्मेदार नागरिक हूँ, एक ऐसे देश का नागरिक जिसे बड़े गर्व से ‘विकासशील’ कहा जाता है। एक ऐसा देश, जहां के हुक्मरान और वहां की सरकार हर मंच से इस देश को ‘विश्व गुरु’ बनाने का दावा करती है, वैश्विक पटल पर महाशक्ति बनने के बड़े-बड़े नारे लगाए जाते हैं। लेकिन इन चमक-दमक वाले दावों और कागजी तरक्की के पीछे छिपी कड़वी हकीकत का जीता-जागता सबूत मैं खुद हूँ। हमारे जैसे करोड़ों नौजवान, जो इस तथाकथित विश्व गुरु बनने वाले देश की रीढ़ हैं, आज सड़कों पर बेरोजगार घूम रहे हैं और हमारी हालत वाकई देखने लायक है। डिग्रियां हाथ में लेकर दफ्तरों के चक्कर काटना, सरकारी दफ्तरों की चौखट पर अपनी जवानी को घिसना और अंत में खुद को नाकामयाब मान लेना ही हमारी नियति बन चुकी है। जो देश अपने युवाओं के सामर्थ्य को सही दिशा और काम नहीं दे सकता, उसके विकास के दावे खोखले और बेमानी लगने लगते हैं। विश्व गुरु बनने का सपना तब तक अधूरा है, जब तक इस देश का युवा अपनी बुनियादी जरूरतों और एक अदद नौकरी के लिए तड़प रहा है।
बचपन से ही मैंने एक ही बात सुनी थी कि ‘खूब पढ़ो-लिखो, ताकि एक दिन बड़े आदमी बन सको।’ मैंने भी वही किया। माता-पिता ने अपनी हैसियत से बढ़कर मुझे पढ़ाया। पिताजी ने अपनी फटी बनियान और टूटी चप्पल की कभी परवाह नहीं की, बस इस उम्मीद में पैसे जोड़ते रहे कि उनका बेटा एक दिन पढ़-लिखकर उनका नाम रोशन करेगा, परिवार की गरीबी को दूर करेगा। मां ने न जाने कितनी मन्नतें मांगीं, कितनी रातें मेरी पढ़ाई के लिए जागकर काटीं। कॉलेज की डिग्री हाथ में आई, तो लगा कि बस अब संघर्ष के दिन खत्म हुए और सुनहरे भविष्य की शुरुआत होने वाली है। मुझे क्या पता था कि असली संघर्ष तो अब शुरू होने जा रहा था। वह डिग्री, जो कभी मेरी सबसे बड़ी ताकत लगती थी, आज अलमारी के एक कोने में रखी हुई महज कागज का एक बेजान टुकड़ा नजर आती है। जब भी मैं उस डिग्री को देखता हूँ, मुझे अपनी योग्यता पर नहीं, बल्कि अपनी किस्मत पर रोना आता है। ऐसा लगता है कि मैंने जो कुछ भी सीखा, जो भी ज्ञान हासिल किया, उसकी इस दुनिया में कोई कीमत ही नहीं है।
जब मैं अपने बूढ़े माता-पिता के चेहरों को देखता हूँ, तो मेरा दिल बैठ जाता है। उनकी ढलती उम्र और उनकी आंखों में छिपी हुई उम्मीदें मुझे अंदर तक झकझोर देती हैं। वे मुझसे कुछ नहीं मांगते, कभी मुझसे शिकायत नहीं करते, लेकिन उनकी खामोशी में एक बहुत बड़ा सवाल छुपा होता है। जब पिताजी अपनी बीमारी के बावजूद काम पर जाते हैं, तो मुझे अपनी लाचारी पर बेहद गुस्सा आता है। मैं उनका हाथ बंटाना चाहता हूँ, उन्हें आराम देना चाहता हूँ, अपनी पहली सैलरी से मां के लिए एक नई साड़ी और पिताजी के लिए नए जूते खरीदना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि वे समाज में सिर उठाकर जी सकें और गर्व से कह सकें कि उनके बेटे ने उनका सहारा ढूंढ लिया है। लेकिन हर महीने जब मैं उनसे परीक्षा के फॉर्म या किसी इंटरव्यू में जाने के लिए पैसे मांगता हूँ, तो शर्म से मेरी आंखें झुक जाती हैं। एक नौजवान बेटा, जो अपने परिवार को बेहतर जीवन देने का संकल्प लेकर खड़ा था, आज खुद उनके टुकड़ों पर पलने को मजबूर है। यह अहसास किसी गहरे घाव की तरह हर रोज मुझे कचोटता रहता है।
बेरोजगारी का सबसे भयानक पहलू समाज का नजरिया और अपनों का बर्ताव है। जो दोस्त कभी साथ उठते-बैठते थे, आज वे अपनी नौकरियों में व्यस्त हैं, उनके पास अब मेरे लिए वक्त नहीं है। धीरे-धीरे मैंने खुद को सबसे अलग-थलग कर लिया है क्योंकि किसी भी शादी, त्योहार या सामाजिक समारोह में जाना अब एक सजा जैसा लगता है। वहां जाते ही रिश्तेदारों के वे चुभते हुए सवाल शुरू हो जाते हैं—’अभी तक कुछ नहीं हुआ?’, ‘उम्र निकली जा रही है, कब तक तैयारी करोगे?’, ‘शायद मेहनत में ही कोई कमी रह गई होगी।’ ये बातें कहने वाले नहीं जानते कि इन शब्दों के पीछे एक युवा का दिल कितनी बुरी तरह टूटता है। लोग आपकी योग्यता का मूल्य केवल एक सरकारी या निजी कंपनी के नियुक्ति-पत्र (जॉइनिंग लेटर) से आंकने लगते हैं। अगर आपके पास नौकरी नहीं है, तो समाज की नजरों में आप निकम्मे, आलसी और नाकामयाब हैं। कोई यह नहीं देखता कि उस नाकामयाबी के पीछे कितने रातों का संघर्ष है, कितनी परीक्षाओं की तैयारी में आंखें सड़ाई हैं, और कितनी बार मेरिट लिस्ट में एक-दो नंबरों से रह जाने का दर्द झेला है। हर बेरोजगार युवा को आज अवसर की जरूरत है, समाज की उपेक्षा की नहीं; उसे प्रोत्साहन चाहिए, अपनों के ताने नहीं।
मैं आज पूरी तरह टूट चुका हूँ, क्योंकि जिस सिस्टम पर मैंने भरोसा किया, उसने मुझे हर मोड़ पर सिर्फ धोखा दिया है। बेरोजगारी केवल मेरी व्यक्तिगत विफलता नहीं है, बल्कि यह इस भ्रष्ट और लाचार प्रशासनिक व्यवस्था का जीता-जागता सबूत है। जब एक युवा सालों तक दिन-रात एक करके परीक्षा की तैयारी करता है, तो वह केवल एक नौकरी की तैयारी नहीं कर रहा होता, बल्कि अपने पूरे परिवार के भविष्य को बुन रहा होता है। लेकिन यहाँ की चयन प्रक्रियाएं एक मज़ाक बनकर रह गई हैं। महीनों की कड़ी मेहनत और भूखे-प्यासे रहकर की गई पढ़ाई पर तब पानी फिर जाता है, जब परीक्षा के ठीक एक दिन पहले या परीक्षा केंद्र से बाहर निकलते ही खबर मिलती है कि पेपर लीक हो गया है। उस एक पल में सिर्फ पेपर लीक नहीं होता, बल्कि एक गरीब माँ-बाप का भरोसा और एक नौजवान के जीने की इच्छा भी लीक हो जाती है।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी कमी इसकी कछुआ चाल है। समय पर परीक्षा का न होना यहाँ का नियम बन चुका है। जो परीक्षा साल भर में पूरी हो जानी चाहिए, वह कोर्ट-कचहरी, तारीखों और सरकारी लेटलतीफी के चक्कर में चार-चार, पांच-पांच साल तक खिंचती रहती है। एक वैकेंसी आती है, तो उसकी परीक्षा होने में दो साल लग जाते हैं; परीक्षा हो जाए, तो रिजल्ट आने में सालों का इंतजार करना पड़ता है; और अगर रिजल्ट आ भी जाए, तो जॉइनिंग के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। इस लंबी प्रक्रिया में हमारी उम्र निकल जाती है, योग्यता दम तोड़ देती है और घर की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाती है। इसके ऊपर से चारों तरफ फैला यह भ्रष्टाचार हमारी छाती पर मूंग दलता है। जब हमें पता चलता है कि हमारी सालों की तपस्या पर उन लोगों की रसूख और पैसा भारी पड़ गया, जिन्होंने बिना पढ़े ही सीटें खरीद लीं, तो खून के आंसू रोने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। प्रतिभा और ईमानदारी को यहाँ सरेआम नीलाम कर दिया जाता है।
लेकिन इस पूरी व्यवस्था का सबसे कड़वा और क्रूर सच तो यह है कि बेरोज़गारी वास्तव में सरकार की नीतियों की विफलता और समाज के खोखले ढांचे की समस्या है, जिसे ज़बरदस्ती मेरी व्यक्तिगत समस्या बना दिया गया है। देश के हर नागरिक को उसकी योग्यता के अनुसार काम देना और रोज़गार के अवसर पैदा करना सीधे तौर पर सरकार की बुनियादी ज़िम्मेदारी है। युवाओं को आगे बढ़ने के लिए एक सकारात्मक माहौल देना और उन्हें मानसिक संबल प्रदान करना इस समाज का दायित्व होना चाहिए। लेकिन यहाँ नियम ही उल्टे हैं; व्यवस्था अपनी नाकामी छुपाने के लिए सारा बोझ एक अकेले युवा के कंधों पर डाल देती है। समाज अपनी घटिया सोशल वैल्यूज़ और संकीर्ण सोच के कारण मुझे हर पल हीन भावना से देखता है, जबकि असली कसूरवार तो वह सिस्टम है जो हमें रोज़गार देने में असमर्थ रहा है। हर बार नीतियों की कमी, पेपर लीक, या वैकेंसी न आने की सज़ा मुझे भुगतनी पड़ती है, और अंत में समाज की अदालत में कसूरवार भी बार-बार मुझे ही ठहरा दिया जाता है। यह कहाँ का न्याय है कि व्यवस्था फेल हो और उसकी सज़ा एक बेगुनाह युवा को अपनी ज़िंदगी, अपने आत्मसम्मान और अपने सपनों को दांव पर लगाकर चुकानी पड़े।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।
