“अकेलेपन की भूख से आत्मा के उत्सव तक की अंतर्मुखी आध्यात्मिक यात्रा!”
जब साथ की चाह मिटे और आत्मबोध की ज्योति स्वयं प्रज्वलित हो जब कैसे महसूस होता है?अकेलापन और एकांत देखने में समान प्रतीत होते हैं, पर उनके अर्थ और प्रभाव…
जब साथ की चाह मिटे और आत्मबोध की ज्योति स्वयं प्रज्वलित हो जब कैसे महसूस होता है?अकेलापन और एकांत देखने में समान प्रतीत होते हैं, पर उनके अर्थ और प्रभाव…
कहते हैं कि पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होते हैं। पर हमारे कुछ महाशय ऐसे हैं जिनके लिए यह स्तंभ नहीं, “स्टूडियो का स्टंट” है। कल्पना कीजिए, अगर देश में…
समाज की रिवायत (परंपरा) ने स्त्री के जीवन को एक अदृश्य घेरे में बाँध रखा है। यह घेरा किसी स्टैंडर्ड (मापदंड) की तरह काम करता है, जहाँ हर मुस्कान, हर…
मैं पैंतीस वर्ष का एक साधारण युवक हूँ। जीवन की इस अवस्था में जब अधिकतर मित्र अपनी-अपनी गृहस्थी में रच-बस गए हैं, मैं अब भी प्रतीक्षा में खड़ा हूँ। कभी-कभी…
जब लफ्ज़ कागज़ पर उतरते हैं तो वे केवल अभिव्यक्ति नहीं रहते, वे जीवन का वृतांत बन जाते हैं। हर रिश्ता भी एक जीवंत कहानी है, जिसे समय अपनी स्याही…
आँख नींद मांग रही है, दिमाग़ दौलत… दिल प्यार… और रूह सुकूनमनुष्य एक अद्भुत संगम है—शरीर, मन, दिल और आत्मा का। लेकिन जब ये चारों एक ही दिशा में न…
भारतीय समाज एक विराट वृक्ष की तरह है—जड़ों में परंपरा, तने में संस्कार और शाखाओं में संबंधों की हरियाली। किंतु इसी वृक्ष के भीतर कहीं-कहीं दीमक भी लग जाती है,…
कांटे तो बस यूँ ही बदनाम हैं, लोगों को चुभती तो ‘बातें’ ज़्यादा हैं ! प्रकृति के कांटे दिखाई देते हैं, इसलिए उनसे बचाव संभव है; पर मनुष्य की वाणी…
“याद रहे… प्रेम अनपढ़ है, ये हस्ताक्षर नहीं करता, छाप छोड़ता है।” यह पंक्ति प्रेम की उस मौलिक प्रकृति को उजागर करती है, जो औपचारिकताओं से परे है। प्रेम किसी…
(अनुसूचित जाति–जनजाति समाज के संदर्भ में) “जमाना बड़ा अजीब है यहां धोखा देने वाला भी बड़े तहज़ीब से बात करता है…।” अनुसूचित जाति और जनजाति समाज भारत की सबसे श्रमशील,…