धूल और धूप के बीच उम्मीद की इबारत
राजस्थान के अजमेर शहर की छाँव में, जहाँ एक तरफ सूफी दरगाह की मखमली गूँज हवाओं में तैरती है, वहीं दूसरी तरफ शहर की बस्तियों के उन कोनों में जिंदगी का दूसरा ही सच धड़कता है, जिन्हें विकास की चमक कभी नहीं छू पाई। अजमेर के बाहरी छोर पर बसी कच्ची बस्तियों की तंग गलियों, जहाँ नालियों का पानी और कच्चे मकानों की खपरैलें गरीबी की पहचान थीं, वहीं रहता था एक बहुजन और वंचित समाज का परिवार।
इस घर में विरासत में क्या मिलता है? न कोई पुस्तैनी जमीन, न बैंक बैलेंस, न रईसी के किस्से। यहाँ विरासत में मिलते हैं—सिर्फ तंगहाली, पीढ़ी-दर-पीढ़ी का श्रम, जिल्लत के साये, और वह अनपढ़ता जो मजबूरी की कोख से जन्म लेती है। इस समाज के बच्चे जब आँख खोलते हैं, तो उनके हिस्से में खेल के मैदान नहीं, बल्कि धूल, अभाव और संघर्ष आते हैं। संसाधनों के नाम पर जेब में चवन्नी तक नहीं होती, बस एक अटूट जिद होती है कि किसी तरह इस दलदल से बाहर निकलना है।
इस परिवार के मुखिया थे अमित—जो दिहाड़ी मजदूरी और शहर की छोटी-मोटी फेरबहरी कर के किसी तरह चूल्हा जलाते थे। उनकी पत्नी थीं आराध्या, जो दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर और कपड़े धोकर अपने घर की गाड़ी खींचती थीं। उनका इकलौता बेटा था—अथर्व।
बचपन से ही अथर्व ने अपनी माँ को सूरज उगने से पहले उठकर चूल्हे-चौके से लेकर दूसरों की चौखट तक घिसते देखा था। अभावों के इस समंदर में अथर्व के लिए पढ़ाई ही एकमात्र नाव थी। वह जानता था कि उसकी माँ की उंगलियां जो दूसरों के घरों की कालिख साफ करती हैं, वही उसे एक दिन रौशन भविष्य देंगी। संसाधनों की कमी के बावजूद अथर्व ने अपनी किताबों से रिश्ता नहीं तोड़ा।
और आज वही दिन था, जब अजमेर के सरकारी स्कूल से दसवीं का परिणाम आया था। अथर्व ने अपनी दिन-रात की मेहनत और भूखे पेट की कसक को ताकत बनाकर 90% अंक हासिल किए थे।
पूरे घर में एक अजीब सी खामोशी को चीरती हुई खुशी की लहर दौड़ गई। अमित ने पसीने से भीगा अपना गमछा झाड़ा और हाथ में मार्कशीट थामे हुए अपनी पत्नी को आवाज दी, “आराध्या! अरे सुनती हो… जल्दी से आ, आज हमारे लाडले ने कमाल कर दिया है। स्कूल की परीक्षा में 90% अंक प्राप्त किए हैं।”
किचन से हाँफती हुई, पसीने से तर-बतर आराध्य दौड़ी-दौड़ी बाहर आईं। उनके हाथों पर मैल और पानी के निशान थे, लेकिन चेहरे पर वह बेइंतिहा चमक थी जिसके आगे दुनिया के सारे नगीने फीके पड़ जाएं। उन्होंने लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ते हुए कहा, “जल्दी से दिखाइए जी… मुझे भी देखना है कि मेरे लाल ने क्या कमाल किया है।”
तभी अथर्व, जो उस वंचित समाज के दर्द से लड़कर निकला था, अचानक सफलता के नशे में इस कदर अंधा हो गया कि वह अपनी ही माँ के संघर्ष को भूल बैठा। उसने फटाक से मार्कशीट अपनी माँ के हाथ से खींच ली और तंज कसते हुए कड़े शब्दों में कहा, “बाबा, आप इन्हें रिजल्ट क्यों दिखा रहे हैं? क्या यह पढ़-लिख सकती हैं? यह तो अनपढ़ हैं… इन्हें क्या समझ आएगा इस 90% का!”
वे शब्द उस तंग कमरे की दीवारों से टकराकर किसी कांटे की तरह चुभ गए। आराध्य के चेहरे की वह अनमोल मुस्कान एक ही पल में टूट गई। उनकी आँखें छलछला आईं। अपनी अश्रुपूर्ण आँखों को अपनी फटी हुई साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए, वह बिना एक भी शब्द कहे चुपचाप वापस चूल्हे की तरफ मुड़ गईं।
यह सब अमित ने अपनी थकी हुई आँखों से देखा। उनके भीतर एक गहरा दर्द और उबाल उठा। उन्होंने अपने बेटे अथर्व को अपने पास खींचा। अमित की आवाज में कड़वाहट भी थी और एक ऐसा ठहराव था जो रूह को झकझोर दे।
अमित ने अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “हाँ बेटा! तूने बिल्कुल सही कहा… वो अनपढ़ है।”
अथर्व ने हैरान होकर अपने पिता को देखा।
अमित अतीत के पन्नों को पलटते हुए बोले, “बेटा, जब इस समाज में हम जैसे लोगों का जन्म होता है, तो हमें हर एक साँस के लिए लड़ना पड़ता है। जब हमारी शादी हुई, तो आराध्या के पास न कोई मायके का सहारा था, न हमारे पास पेट भरने का ठिकाना। उसके तीन महीने के अंदर ही तुम्हारी माँ गर्भवती हो गई। उस वक्त हमारी हालत ऐसी थी कि एक वक्त की रोटी का ठिकाना नहीं था। मैंने सोचा कि इस गरीबी के कुचक्र में एक और नई जान को लाकर क्यों सजा दें? मैंने कहा कि इस बच्चे को अभी इस दुनिया में मत लाओ, अबॉर्शन करवा देते हैं।”
अथर्व सन्न होकर अपने पिता को सुनने लगा।
अमित ने भर्राए गले से कहा, “लेकिन तुम्हारी माँ ने सीना तानकर कहा था—’नहीं! गरीबी हमारी किस्मत हो सकती है, हमारे बच्चे की नहीं। घूमना-फिरना और सुख भोगना बाद में होता रहेगा, जब यह बच्चा आएगा तो इसकी किस्मत बदलने के लिए मैं अपनी जान लगा दूंगी।’ और फिर तेरा जन्म हुआ… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“बेटा, जब तू गर्भ में था, तब इस वंचित समाज की औरतें पोषण क्या होता है, जानती भी नहीं हैं। तुझे स्वस्थ पैदा करने के लिए, उसने महीनों तक लोगों के घरों में जूठे बर्तन धोकर जो पैसे बचाए, उससे दूध खरीदकर पिया, ताकि मेरा बेटा कमजोर न पैदा हो… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“तुझे सुबह स्कूल जाना रहता था, इसलिए वह रोज सुबह 4:00 बजे उठ जाती थी। कड़ाके की ठंड में जब अजमेर की सड़कें सूखी होती थीं, वह ठिठुरते हाथों से तेरे लिए रूखी-सूखी रोटी और बस्ता तैयार करती थी… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“याद है बेटा? जब तू रात को दीये की रोशनी में पढ़ते-पढ़ते सो जाता था, तब वह आकर तेरी फटी हुई कॉपियों को संभालती थी, तुझे चादर ओढ़ाती थी और खुद रातभर जागकर सोचती थी कि कल सुबह फीस के पैसे कहाँ से लाऊँगी… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“इस समाज में हमारे पास ब्रांडेड कपड़े पहनने का हक कभी नहीं रहा। लेकिन तू जब मोहल्ले के दूसरे बच्चों को देखता था और रोता था, तो तेरी माँ अपनी एक ही साड़ी को सालों-साल पहनकर, लोगों से उधार मांगकर तेरे बदन पर ढंग के कपड़े लाती थी… क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
अमित की आँखें अब आंसुओं से भर चुकी थीं। उन्होंने कहा, “बेटा, इस दुनिया के जो ‘पढ़े-लिखे’ लोग हैं ना, जो सूट-बूट पहनकर दफ्तरों में बैठते हैं, वो पहले अपना स्वार्थ देखते हैं। वो दलित और वंचितों का हक मारकर अपनी तिजोरी भरते हैं। लेकिन तेरी माँ ने आज तक कभी अपना स्वार्थ नहीं देखा, क्योंकि वो अनपढ़ है ना!”
“वह दिनभर दूसरों के घरों में अपमान सहती है, लौटकर हमारे लिए रूखा-सूखा बनाती है, हमें खिलाती है और खुद कई बार भूखी सो जाती है। इसलिए बेटा, आज मैं पूरी दुनिया के सामने गर्व से कहता हूँ कि—मेरी पत्नी, तुम्हारी माँ, अनपढ़ है!“
अमित की एक-एक बात अथर्व के सीने में तीर की तरह उतर रही थी। उसे अपनी उस नादानी और अहंकार पर घृणा होने लगी, जो उसने अपनी माँ के अनपढ़ होने पर दिखाया था। उसे एहसास हुआ कि वह समाज के जिस दर्द से निकलकर आगे आया था, उसने अनजाने में उसी दर्द को अपनी माँ के सीने पर दे मारा था।
अथर्व फूट-फूटकर रो पड़ा। वह दौड़ा हुआ किचन की तरफ गया, जहाँ आराध्य चूल्हे के पास चुपचाप बैठी अपने आँसू छिपा रही थीं।
अथर्व ने पीछे से जाकर अपनी माँ को कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया और उनके मैले आँचल में अपना सिर छिपाकर जोर-जोर से बिलखने लगा।
रोते हुए उसने कहा, “माँ… मुझे क्षमा कर दीजिए! मुझे लगा कि मैंने 90% लाकर बहुत बड़ा तीर मार लिया है, लेकिन मैं भूल गया कि जिस रास्ते पर चलकर मैं यहाँ तक पहुँचा हूँ, उस रास्ते के हर एक कांटे को आपने अपने नंगे पाँवों से कुचला है।”
अथर्व ने अपनी माँ के खुरदरे और मेहनतकश हाथों को चूमते हुए कहा, “माँ, मुझे तो इस कागज के टुकड़े पर 90% अंक मिले हैं, लेकिन आप मेरे पूरे जीवन को 100% मुकम्मल बनाने वाली इस दुनिया की सबसे पहली और महान शिक्षक हो। आज मुझे समझ आ गया कि मैं असल में अनपढ़ हूँ, और आपके पास इस दुनिया की किसी यूनिवर्सिटी की पीएचडी से भी बड़ी, त्याग और संघर्ष की उच्च कोटि की डिग्री है!”
आराध्य ने अपने काँपते और मेहनतकश हाथों से अपने बेटे का सिर सहलाया। उनकी आँखों से बहते आँसुओं में बरसों का वह दर्द धुल गया, जो उन्होंने चुपचाप सहा था। उस स्पर्श में वह असीम पवित्रता थी, जिसे दुनिया की कोई दौलत खरीद नहीं सकती।
अमित दरवाजे पर खड़े होकर यह सब देख रहे थे। उनकी आँखों में भी संतुष्टि के आँसू थे।
आज उस तंग कमरे में यह साबित हो गया था कि कागजी डिग्रियाँ इंसान को सिर्फ नौकरियां दे सकती हैं, लेकिन इंसानियत, हौसला और जीना तो वह अनपढ़ माँ सिखाती है, जो खुद अंधेरे में रहकर अपनी औलाद की जिंदगी रौशन कर देती है।
हाँ, दुनिया की नजरों में शायद वह अनपढ़ है, मगर दुनिया की बड़े से बड़ी डिग्रियाँ भी एक बहुजन, वंचित और अनपढ़ माँ के त्याग के आगे सिर्फ एक रद्दी कागज भर हैं—क्योंकि इस धरती पर हर वह शख्स जो संघर्ष की आंधी में भी खड़ा है, वह असल में अपनी माँ की तपस्या का ही परिणाम है। *
प्रेरणा:* अभावों की भट्टी में तपकर ही असली सोना निकलता है। हमारी माँ का संघर्ष और उनका त्याग ही हमारी सबसे बड़ी पूँजी है, जिसे कभी भुलाया नहीं जाना चाहिएं।

संकलनकर्ता
हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर,
आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
हाल मुकाम ग्राम, नवाब पोस्ट झाड़ोल वाया रामसर जिला अजमेर (राजस्थान)।

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