लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक

शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षर होना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की पशुता को मारकर मानवता को जाग्रत करना है।

हाल ही में राजस्थान के सीकर जिले के रिंगस कस्बे के तेजल कॉलेज के डायरेक्टर बाबूलाल यादव द्वारा सार्वजनिक मंच पर अनुसूचित जाति समाज के लोगों के प्रति दिखाया गया जातिवादी अहंकार न केवल निंदनीय है, बल्कि उनकी ऐतिहासिक अज्ञानता का प्रमाण
भी है।

जब शिक्षा के मंदिरों के संचालक ही ‘मानसिक गुलामी’ और ‘जातिवाद के अवशेषों’ को ढो रहे हों, तो समाज के भविष्य की कल्पना भयावह हो जाती है।

बाबूलाल यादव जी: इतिहास का आईना देखिए

श्री बाबूलाल जी यादव, आप स्वयं को शिक्षा जगत का विद्वान मान सकते हैं, लेकिन आपका आचरण आपके बौद्धिक खोखलेपन को उजागर करता है।

आप जिस ‘श्रेष्ठता बोध’ के अहंकार में डूबे हैं, वह पूरी तरह उधार का है।

आपको इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन करने की नितांत आवश्यकता है।

उत्तर वैदिक काल की कड़वी सच्चाई
जिस ‘वैदिक व्यवस्था’ की रूढ़ियों का आप अनजाने में पोषण कर रहे हैं, एवं जिनका संदर्भ देकर आप अनुसूचित जाति के लोगों का घोर अपमान कर रहे हो, उसी कालखंड में आपके पूर्वजों की स्थिति क्या थी, यह जान लीजिए:

शूद्र श्रेणी में वर्गीकरण: उत्तर वैदिक काल में यादव (अहीर/गोप) शूद्रों की श्रेणी में गिने जाते थे।

शिक्षा से पूर्ण वंचित
आपको ‘उपनयन संस्कार’ का अधिकार नहीं था। जिसका अर्थ था कि आपके लिए शिक्षा के द्वार पूरी तरह बंद थे।

अमानवीय दंड
तब व्यवस्था यह थी कि यदि कोई शूद्र वेदमंत्र सुन ले, तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाता था और उच्चारण करने पर जीभ काट ली जाती थी।

संपत्ति और आत्मसम्मान का अभाव
आपको न संपत्ति रखने का अधिकार था, न शस्त्र धारण करने का और न ही यज्ञशाला में प्रवेश का। आपको केवल ‘सेवा’ के लिए सीमित रखा गया था।

आपका वर्तमान
किसी ‘ईश्वरी कृपा’ से नहीं, बल्कि संविधान की देन है

बाबूलाल यादव जी, आज आप जो कॉलेज चला रहे हैं, जिस आलीशान कुर्सी पर बैठकर आप दूसरों का घोर अपमान कर रहे हो और उन्हें,हीन भावना से देख रहे हैं, वह सौभाग्य आपको किसी प्राचीन धार्मिक ग्रंथ ने नहीं दिया है।

यह महात्मा ज्योतिबा राव फुले के संघर्षों का परिणाम है, जिन्होंने शिक्षा के बंद कपाट आपके और हमारे जैसे वर्गों के लिए खोले थे।

यह बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के द्वारा रचे गए भारतीय संविधान की शक्ति है, जिसने आपको ‘शूद्र’ के अपमानजनक पायदान से उठाकर एक ‘कॉलेज डायरेक्टर’ के सम्मानजनक पद तक पहुँचाया है।

यदि आज संविधान न होता, तो आप आज भी किसी ऊंचे वर्ण की चौखट पर सेवा कर रहे होते।

बहुजन समाज को संदेश
अब मौन नहीं, संघर्ष चाहिए
बहुजन समाज (SC, ST, OBC) को यह समझना होगा कि हमारा अस्तित्व एक-दूसरे से जुड़ा है।

यदि समाज के एक व्यक्ति का अपमान होता है, तो वह पूरे समाज के आत्मसम्मान पर चोट है।

एकजुटता
यादव हो या मेघवाल, गुर्जर हो या जाट—यदि हम संवैधानिक अधिकारों का लाभ ले रहे हैं, तो हमें
उन महापुरुषों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जिन्होंने हमारे लिए अपना जीवन खपा दिया।

कानूनी संघर्ष
बाबूलाल जी यादव जैसे लोगों को यह अहसास कराना जरूरी है कि, भारत ‘स्मृतियों’ से नहीं, ‘संविधान’ से चलता है। SC/ST एक्ट के तहत कड़ी कानूनी कार्यवाही ही ऐसी मानसिकता का इलाज है।

वैचारिक बहिष्कार
ऐसे संस्थानों और व्यक्तियों का सामूहिक बहिष्कार करें
जो मानवता और समानता के मूल्यों का गला घोंटते हैं।

निष्कर्ष
संविधान निर्माता बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर के शब्दों में अन्याय सहना भी अन्याय करने के समान है।

बाबूलाल जी यादव जैसों को हमारी विनम्र लेकिन कड़ी चेतावनी है

“इतिहास को भूलने वाले लोग कभी इतिहास नहीं बना सकते।” जिस संविधान ने आपको कुर्सी दी है, वही संविधान उस कुर्सी से उतारने की ताकत भी रखता है।

इंसान बनिए, क्योंकि आपकी जाति आपकी योग्यता नहीं, बल्कि महज एक संयोग है।

जय भीम, जय भारत, जय संविधान!


लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक ब्यावर

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)
“इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के अध्ययन अनुभव, सामाजिक विश्लेषण और प्राप्त सूचनाओं पर आधारित हैं।

इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, जाति या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना और सामाजिक कुरीतियों का तार्किक विरोध करना है।

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