लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक

भूमिका
आज भारत के बौद्धिक विमर्श में एक अजीब सा विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ वह वर्ग है जो यह दावा करता है कि प्राचीन काल में भारत ‘विश्वगुरु’ था, जहाँ मंत्रों से सृष्टि रची जाती थी और प्रकृति के नियमों को मुट्ठी में रखा जाता था। वहीं दूसरी तरफ, यही वर्ग आज भारत की हर विफलता, हर पिछड़ेपन और हर समस्या का दोष ‘आरक्षण’ के मथे मढ़ देता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या सदियों का वह महान ज्ञान और अलौकिक शक्तियां मात्र 75 साल के आरक्षण से परास्त हो गईं? या फिर सत्य कुछ और है जिसे ‘अंधभक्ति’ के चश्मे से देखा नहीं जा रहा?

मिथकीय शक्तियां और आधुनिक विफलता
हमारे शास्त्रों और कथाओं में ऐसी-ऐसी शक्तियों का वर्णन है जो कल्पना से परे हैं। हमें बताया गया कि यहाँ ऐसे महापुरुष हुए जो:
समुद्र को एक अंजलि में सोख सकते थे।
पृथ्वी को तीन कदमों में नाप सकते थे।
सूर्य को निगलने की क्षमता रखते थे।
मंत्रों, मिट्टी के मेल, मटकों या मछली से जीवन उत्पन्न कर सकते थे।

यदि यह सब सत्य था, यदि भारत के पास विज्ञान और चमत्कार का ऐसा संगम था कि पत्थर में प्राण फूँके जा सकते थे, तो फिर आज हम तकनीक और विज्ञान के लिए पश्चिम की ओर क्यों ताकते हैं? वह ‘दिव्य शक्ति’ कहाँ लुप्त हो गई? क्या बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा संविधान में दी गई सामाजिक न्याय की व्यवस्था (आरक्षण) इतनी शक्तिशाली है कि उसने इन तमाम ‘अवतारों’ और ‘शक्तियों’ के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया?

आरक्षण: विकास में बाधक या पाखंड का अंत?
अक्सर तर्क दिया जाता है कि यदि आरक्षण न होता, तो भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश होता। लेकिन गहराई से सोचिए—आरक्षण ने किसे बर्बाद किया? क्या आरक्षण ने उस प्रतिभा को रोका जो शून्य से शिखर तक पहुँचने का जज्बा रखती है, या उसने उस ‘एकाधिकार’ को तोड़ा जिसने हज़ारों सालों तक शिक्षा और सत्ता को एक खास वर्ग की तिजोरी में बंद कर रखा था?

आज जब पाखंड की पोल खुलती है, तो उसे ‘धर्म का अपमान’ कह दिया जाता है। लेकिन यह विडंबना है कि जो बातें स्वयं धर्मग्रंथों में लिखी हैं, जिन्हें कथावाचकों ने सदियों से हमें सुनाया, जब एक तर्कवादी व्यक्ति उन्हीं बातों को दोहराकर सवाल पूछता है, तो वह ‘अपराधी’ हो जाता है। यदि मंत्रों से चिड़िया बन सकती थी या भेस बदलकर मर्यादाओं का उल्लंघन किया जा सकता था, तो क्या यह पाखंड नहीं है? और यदि यह पाखंड है, तो आरक्षण निश्चित रूप से वह ‘जूता’ है जिसने इस पाखंड की जड़ों को हिलाकर रख दिया है।

अवतारवाद और सामाजिक जिम्मेदारी
कहा जाता है कि जब-जब पाप बढ़ता है, तब-तब अवतार होता है। आज समाज में गरीबी है, जातिवाद है, अन्याय है, फिर भी वह ’33 कोटि’ शक्तियां मौन क्यों हैं? क्या आरक्षण ने उनकी शक्तियों को सीमित कर दिया है? सत्य तो यह है कि अवतारों ने कभी जनता का वास्तविक कल्याण नहीं किया; वास्तविक कल्याण तो ‘संविधान’ ने किया है।
आरक्षण ने किसी देवता को नहीं, बल्कि उस ‘मानसिक श्रेष्ठता’ के अहंकार को बर्बाद किया है जो मेहनत के बजाय जन्म के आधार पर पूजे जाने का स्वप्न देखती थी। आरक्षण ने बहुजन समाज को वह आवाज़ दी है, जिससे वह पूछ सके कि “अगर तुम इतने ही शक्तिशाली थे, तो तुम्हें डर किस बात का है?”

बहुजन समाज को संदेश: शिक्षा ही एकमात्र अस्त्र है
हे बहुजन समाज के साथियों! हमें यह समझना होगा कि हमारा मुकाबला किसी अदृश्य शक्ति से नहीं, बल्कि उस ‘मानसिक गुलामी’ से है जो हमें तर्क करने से रोकती है। हमें बताया गया कि हम अक्षम हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब हमें अवसर मिला, हमने अपनी योग्यता सिद्ध की।
तर्क को प्रधानता दें: पाखंडी कथाओं के जाल से बाहर निकलकर विज्ञान और तर्क का साथ पकड़ें।
संविधान की रक्षा करें: संविधान ही वह ढाल है जिसने हमें ‘मटके से बच्चा निकालने’ जैसे अंधविश्वासों से निकालकर ‘डॉक्टर, इंजीनियर और अफसर’ बनने का रास्ता दिखाया।
शिक्षा पर निवेश करें: आरक्षण एक अवसर है, लेकिन शिक्षा वह शक्ति है जो स्थायी बदलाव लाएगी।

निष्कर्ष
आरक्षण ने भारत को पीछे नहीं धकेला, बल्कि भारत के उस बड़े हिस्से को मुख्यधारा में जोड़ा जिसे सदियों से हाशिए पर रखा गया था। यह सवाल कि “आरक्षण आने के बाद अवतार लेना बंद क्यों हो गया?” दरअसल एक गहरी चोट है उस विचारधारा पर जो लोगों को डराकर राज करना चाहती है।
पाखंड की नसबंदी किसी दवा से नहीं, बल्कि ‘चेतना’ से हुई है। बाबा साहेब ने हमें वह चेतना दी कि हम पत्थर में प्राण ढूंढने के बजाय जीवित मनुष्य के अधिकारों के लिए लड़ना सीखें। आज का भारत अवतारों की प्रतीक्षा में नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और वैज्ञानिक सोच के दम पर खड़ा होगा।
याद रखिए, जिसने आपको सोचने की शक्ति दी, वही आपका वास्तविक उद्धारक है।

लेखक
सोहनलाल सिंगारिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *