1:वह अक्सर कहता था कि उसे मुसलमानों से ख़ौफ़ (डर) लगता है, लेकिन उसकी रोज़मर्रा की बातें इस बात से मेल नहीं खाती थीं। वह अपने दोस्तों के साथ बैठकर फिल्में देखता, हँसी-मज़ाक करता और दुनिया की बातों में खो जाता था। उसे समझ ही नहीं आता था कि वह किससे डर रहा है। उसकी सोच में एक अजीब सा कॉन्ट्राडिक्शन (विरोधाभास) था, जिसे वह खुद भी नहीं समझ पाता था। उसके लिए डर एक आदत बन चुका था, जिसे उसने बिना सोचे-समझे अपना लिया था और उसी को सच मान बैठा था।
(2) उसे पुरानी फिल्मों से बहुत इश्तियाक़ (लगाव) था और वह दिलीप कुमार की फिल्में बड़े ध्यान से देखता था। वह उनकी एक्टिंग को बहुत अच्छा मानता और हर सीन को महसूस करता था। उसे यह नहीं पता था कि दिलीप कुमार का असली नाम यूसुफ़ खान है। उसके मन में जो छवि थी, वह अधूरी जानकारी पर टिकी थी। वह उन्हें एक क्लासिक (पुराना लेकिन बेहतरीन) कलाकार मानता था और उनकी हर फिल्म को दिल से पसंद करता था, लेकिन अपने मन के डर को कभी जोड़कर नहीं देख पाया।
(3)हर साल वह आमिर खान और सलमान खान की फिल्मों का इंतज़ार (प्रतीक्षा) करता था और उनके आने का बेसब्री से इंतजार करता था। उसके लिए फिल्म देखना किसी बड़े त्योहार जैसा होता था, जैसे कोई खास दिन हो। वह टिकट लेने के लिए लंबी लाइन में भी लग जाता था और अगर टिकट न मिले तो किसी और तरीके से देख लेता था। उसके अंदर फिल्म देखने को लेकर बहुत उत्साह रहता था, जैसे कोई फेस्टिवल (त्योहार) मनाया जा रहा हो, लेकिन उसका डर वहीं का वहीं बना रहता था।
(4)पढ़ाई के समय वह बहुत मेहनती था और विज्ञान में उसका खास शौक़ (रुचि) था। वह अब्दुल कलाम को अपना आदर्श मानता था और उनके जैसा बनना चाहता था। वह कहता था कि देश के लिए कुछ अच्छा करना है और आगे बढ़ना है। उसे नई चीज़ें सीखने में मज़ा आता था और वह हमेशा कुछ नया करने की सोचता था। उसके सपनों में आगे बढ़ने की चाह थी और वह नई टेक्नोलॉजी (तकनीक) को समझना चाहता था, लेकिन उसके मन का डर फिर भी खत्म नहीं हुआ।
(5) क्रिकेट के खेल में उसका बहुत जुनून (जोश) था और वह हर मैच बड़े ध्यान से देखता था। उसे मंसूर अली खान और अज़हरुद्दीन की बल्लेबाज़ी बहुत पसंद थी। वह उनके खेल की तारीफ करता और कहता कि ये खिलाड़ी बहुत खास हैं। उसे उनके खेलने का तरीका बहुत अच्छा लगता था और वह उनकी नकल करने की कोशिश भी करता था। वह खेल को दिल से जीता था और उसमें पूरी तरह डूब जाता था, लेकिन फिर भी उसके मन में एक स्टाइल (तरीका) का फर्क बना रहता था।
(6)फिल्मों की हीरोइनों में उसे मधुबाला और नरगिस का हुस्न (सौंदर्य) बहुत पसंद था। वह उनकी फिल्मों को बार-बार देखता और उनकी मुस्कान की तारीफ करता था। उसे पुरानी फिल्मों का माहौल बहुत अच्छा लगता था और वह उसमें खो जाता था। वह कहता था कि उस समय की फिल्में दिल को छू जाती हैं। उनके चेहरे की सादगी और अभिनय उसे बहुत अच्छा लगता था, जिसे वह एक अलग तरह की ग्रेस (नज़ाकत) मानता था, लेकिन उसके मन का डर अब भी बना हुआ था।
(7)जब भी वह दुखी होता था, तो वह मोहम्मद रफ़ी के गाने सुनता था और उनमें खो जाता था। उसकी आवाज़ उसे सुकून देती थी और उसके मन को शांत कर देती थी। वह कहता था कि रफ़ी के गानों में एक अलग ही असर है। उसे लगता था कि ये गाने दिल की तकलीफ को कम कर देते हैं। वह उन्हें बहुत सम्मान देता था और ध्यान से सुनता था। उसे उनकी आवाज़ में एक गहरी रूहानियत (सुकून) महसूस होती थी, जो किसी थैरेपी (इलाज) की तरह काम करती थी।
(8)हर साल 26 जनवरी को वह “सारे जहाँ से अच्छा” गाता था और देश के लिए गर्व महसूस करता था। उसे इस गीत से बहुत लगाव था और वह इसे पूरे दिल से गाता था। वह कहता था कि हमें सबके साथ मिलकर रहना चाहिए और देश को आगे बढ़ाना चाहिए। उसके अंदर देश के लिए एक सच्चा जज़्बा (उत्साह) था। वह मानता था कि सबको साथ लेकर चलना ही सही रास्ता है, जिसे वह यूनिटी (एकता) कहता था, लेकिन उसका डर अब भी उसके साथ था।
(9)जब उसे किसी से प्यार हुआ, तो उसने अपने दिल की बात कहने के लिए शायरी का सहारा लिया। वह ग़ालिब और फ़ैज़ के शेर सुनाता और अपनी भावना व्यक्त करता था। उसकी बातों में सच्चाई होती थी और वह अपने दिल की बात खुलकर कहता था। उसकी भाषा में प्यार साफ दिखाई देता था। वह अपनी प्रेमिका को खुश करने के लिए हर कोशिश करता था। उसके दिल में गहरी मोहब्बत (प्रेम) थी, जिसे वह एक सच्चे इमोशन (भावना) के रूप में जी रहा था।
(10) आख़िर में उसे यह समझ में आया कि उसका डर असली मुसलमानों से नहीं था, बल्कि उसके मन में बैठा एक वहम (भ्रम) था, जिसे उसने सच मान लिया था। यह डर अपने आप पैदा नहीं हुआ था, बल्कि धीरे-धीरे सियासत, अख़बारों और चुनावी माहौल ने उसके भीतर भर दिया था। उसने बार-बार वही बातें सुनीं—खबरों में, भाषणों में, लोगों की चर्चाओं में—और बिना परखे उन्हें अपनी
बस सच्चाई बना लिया। उसने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि जिन मुसलमानों से वह डरता है, वे उसके आसपास के वही लोग हैं, जिनके साथ वह हँसता -बोलता है। दरअसल, वह उन काल्पनिक मुसलमानों से डरता था, जिन्हें राजनीति ने डरावना बना कर पेश किया। जब उसने अपनी आंखों से सच को देखना शुरू किया, तो उसे महसूस हुआ कि उसका डर झूठा था। असली हकीकत उससे बिल्कुल अलग थी।

शेर:
मंदिर की रौशनी हो या मस्जिद की अज़ान का नूर,
हिंदू-मुसलमान साथ हों तो ही महकता है ये वतन भरपूर।

संकलनकर्ता हगामी लाल मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966

स्रोत और संदर्भ :
निर्मला भदोरिया की फेसबुक पोस्ट से प्रेरित एवं, आपसी रिश्तों, जनमानस की सोच और मीडिया व राजनीति से बने भ्रमों के अवलोकन पर आधारित है।

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