बहुजन वंचित समाज का जीवन अक्सर अभाव, अपमान और सामाजिक तिरस्कार से शुरू होता है। जन्म के साथ ही उसे हीनता का बोझ सौंप दिया जाता है, जैसे उसकी नियति तय हो चुकी हो। समाज का एक वर्ग उसे नीचे देखने की आदत बना चुका है, जिससे उसके भीतर आत्मविश्वास विकसित ही नहीं हो पाता। एक सामाजिक चिंतक ने कहा था कि सबसे बड़ी कैद मन की होती है, और यह कैद दूसरों की राय से बनती है। इस समाज के व्यक्ति को बचपन से ही तौहीन (अपमान) सहनी पड़ती है, और उसे लगता है कि उसका कोई फ्यूचर (भविष्य) नहीं है।
जब किसी व्यक्ति को बार-बार यह बताया जाए कि वह अयोग्य है, तो वह अंततः इसे सच मान लेता है। यही मानसिक गुलामी सबसे खतरनाक होती है। बहुजन समाज के लोग अक्सर दूसरों की स्वीकृति के लिए जीते हैं, क्योंकि उन्हें यही सिखाया गया है। एक समाजशास्त्री के अनुसार, जब तक व्यक्ति दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर रहेगा, वह स्वतंत्र नहीं हो सकता। इस स्थिति में व्यक्ति खौफ (डर) में जीता है और हर निर्णय में कन्फ्यूजन (उलझन) महसूस करता है।
समाज की यह संरचना बहुजन वंचित व्यक्ति को हाशिए पर धकेल देती है। उसे संसाधनों से वंचित कर दिया जाता है, जिससे वह अपने सपनों को साकार नहीं कर पाता। यही कारण है कि उसका आत्मविश्वास निम्नतम स्तर पर होता है। लेकिन असली समस्या बाहरी नहीं, बल्कि भीतर बैठी हुई है। वह खुद को कमतर मानने लगता है, जिसे एक दार्शनिक और समाजशास्त्री “आत्म-भ्रम” कहता है। यह जिल्लत (बेइज्जती) का अनुभव और लो कॉन्फिडेंस (कम आत्मविश्वास) उसे आगे बढ़ने से रोकता है।
बहुजन समाज के व्यक्ति को यह समझना होगा कि उसकी पहचान दूसरों की राय से नहीं, बल्कि उसके अपने कर्म और सोच से बनती है। समाज के बनाए हुए नियम अक्सर उसे दबाने के लिए होते हैं, न कि उसे उभारने के लिए। इसलिए जरूरी है कि वह अपने भीतर झांके और अपने मूल्य को पहचाने। इस आत्मबोध के बिना मुक्ति संभव नहीं है। वह अक्सर रंजिश (द्वेष) का शिकार होता है और जीवन में डिप्रेशन (अवसाद) महसूस करता है।
सामाजिक चिंतक और दार्शनिकों का मानना है कि जब तक व्यक्ति अपने लिए जीना शुरू नहीं करता, तब तक वह अधूरा रहता है। बहुजन समाज के लिए यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसे हमेशा दूसरों के अनुसार ढाला गया है। यदि वह अपने दिल की सुनना शुरू कर दे, तो उसकी जिंदगी बदल सकती है। उसे आज़ादी (स्वतंत्रता) का अनुभव तभी होगा जब वह अपने निर्णय खुद लेगा और सेल्फ रिस्पेक्ट (आत्मसम्मान) को महत्व देगा।
समाज अक्सर उन लोगों का मजाक उड़ाता है जो भीड़ से अलग चलने का साहस करते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि वही लोग बाद में प्रेरणा बनते हैं। बहुजन वंचित समाज के व्यक्ति को यह समझना होगा कि आलोचना से डरना नहीं चाहिए। यह उसकी यात्रा का हिस्सा है। यदि वह अपने रास्ते पर डटा रहेगा, तो एक दिन वही लोग उसकी मिसाल देंगे। अभी वह तंज (व्यंग्य) सहता है, लेकिन उसमें पोटेंशियल (क्षमता) असीमित है।
बहुजन वंचित समाज के भीतर एक गहरी हीन भावना बैठा दी गई है, जो उसे आगे बढ़ने से रोकती है। यह भावना उसे हर कदम पर रोकती है और उसे दूसरों पर निर्भर बनाती है। लेकिन सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति के भीतर अपार शक्ति होती है। उसे केवल पहचानने की जरूरत है। यह गुलामी (दासता) की मानसिकता और माइंडसेट (मानसिक ढांचा) को बदलना जरूरी है।
जब व्यक्ति अपने भीतर छिपे सत्य को पहचान लेता है, तो वह समाज के डर से मुक्त हो जाता है। यह आत्मज्ञान ही असली मुक्ति है। बहुजन समाज के लिए यह एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है। उसे यह समझना होगा कि वह किसी से कम नहीं है। उसकी पहचान उसकी मेहनत और सोच से बनती है, न कि जाति से। वह हकीकत (सत्य) को समझे और अपने गोल (लक्ष्य) की ओर बढ़े।
समाज की परवाह करना एक हद तक ठीक है, लेकिन जब यह डर बन जाए, तो यह व्यक्ति को कमजोर कर देता है। बहुजन समाज के लोग अक्सर “लोग क्या कहेंगे” के जाल में फंसे रहते हैं। यह जाल उन्हें अपने सपनों से दूर कर देता है। उन्हें इस डर को तोड़ना होगा और अपने लिए जीना सीखना होगा। यह फिक्र (चिंता) और ओवरथिंकिंग (अत्यधिक सोचना) उन्हें आगे नहीं बढ़ने देती।
कुल मिलाकर जिंदगी का यह निष्कर्ष है कि जीवन एक ही बार मिलता है और इसे अपने तरीके से जीना ही सच्ची स्वतंत्रता है। बहुजन वंचित समाज के व्यक्ति को यह समझना होगा कि उसकी जिंदगी किसी और की अपेक्षाओं के लिए नहीं है। उसे अपने भीतर की आवाज सुननी होगी और उसी के अनुसार जीना होगा। जब वह खुद को स्वीकार कर लेगा, तो दुनिया की राय महत्वहीन हो जाएगी। यही सच्ची कामयाबी (सफलता) है और यही असली फ्रीडम (स्वतंत्रता) है।
शेर:
खुदी को पहचान, ये ज़ंजीरें खुद ही टूट जाएंगी,
जो डर से लड़ गया, उसकी राहें खुद ही छूट जाएंगी।

संकलन कर्ता
हगामी लाल
मेघवंशी, रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 9829 2 30966
स्रोत व संदर्भ :
सामाजिक चिंतन, बहुजन अनुभव, सामाजिक यथार्थ, आत्ममुक्ति सिद्धांत, ओशो प्रेरित विचारधारा, स्वतंत्रता, स्वाभिमान, मनोविज्ञान, आत्मबोध, सामाजिक विश्लेषण आधारित लेखन।
