लेखक: सोहनलाल सिंगरिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक, ब्यावर

प्रस्तावना: एक युग परिवर्तन का शंखनाद
भारतीय इतिहास के फलक पर कुछ ऐसे व्यक्तित्व उभरते हैं, जो न केवल समाज की दिशा बदलते हैं, बल्कि सदियों से थोपी गई दासता की जंजीरों को अपने ज्ञान के तर्क से काट देते हैं।

“मैं भंगी हूँ”—यह केवल एक पुस्तक का शीर्षक नहीं था, बल्कि यह उस समाज का आत्मघोष था जिसे मुख्यधारा ने ‘अदृश्य’ कर दिया था। भगवान दास साहेब ने इस पहचान को शर्म से निकालकर गर्व और संघर्ष के प्रतीक में बदल दिया।

आज 23 अप्रैल को उनकी जयंती पर, उनके जीवन के हर पहलू का विश्लेषण करना हमें सामाजिक न्याय की नई ऊर्जा देता है।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि: संघर्ष की नींव
एडवोकेट भगवान दास साहेब का प्रादुर्भाव 23 अप्रैल, 1927 को हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के निकट जुब्बल नामक गाँव में हुआ।
वह कालखंड भारतीय समाज में जातिवाद की पराकाष्ठा का समय था।

माता-पिता का संबल
उनके पिता श्री राम दयाल और माता श्रीमती अतेई देवी साधारण पृष्ठभूमि से थे, लेकिन उनके भीतर अपने पुत्र को शिक्षित करने की जो जिजीविषा थी, उसने इतिहास रच दिया। एक ऐसे समाज में जहाँ शिक्षा का अधिकार छीन लिया गया था, उनके माता-पिता ने उन्हें स्कूल भेजा, जो उस समय का सबसे बड़ा क्रांतिकारी कदम था।

निवास स्थान
उनका प्रारंभिक जीवन शिमला की वादियों में बीता, लेकिन उनका कर्मक्षेत्र देश की राजधानी दिल्ली और अंततः संपूर्ण विश्व बना।

शिक्षा की दुर्गम डगर: अपमान से सम्मान तक
भगवान दास जी की शैक्षिक यात्रा फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों भरी राह थी। उनकी शिक्षा का विवरण वर्तमान पीढ़ी के लिए किसी महाकाव्य से कम नहीं है:

  1. प्रारंभिक शिक्षा
    शिमला के स्थानीय स्कूलों में पढ़ते समय उन्हें कदम-कदम पर छुआछूत का दंश झेलना पड़ा। सहपाठियों द्वारा दूरी बनाना और शिक्षकों का उपेक्षापूर्ण व्यवहार उनके बाल मन को झकझोरता था, लेकिन उन्होंने इन आंसुओं को स्याही बना लिया।
  2. उच्च शिक्षा
    उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक B.A. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने कानून की शक्ति को पहचाना और एल.एल.बी. LL.B. पूर्ण की। वे जानते थे कि बिना विधिक ज्ञान के शोषितों की लड़ाई नहीं जीती जा सकती।
  3. चुनौतियाँ
    उनके पास न तो मखमली कमरे थे, न ही महंगी किताबें। आर्थिक तंगी ऐसी थी कि कई बार दो वक्त की रोटी और पढ़ाई के खर्च के बीच चुनाव करना पड़ता था। लेकिन उनके भीतर ‘बुद्ध’ और ‘अम्बेडकर’ का विचार जल रहा था, जिसने उन्हें कभी रुकने नहीं दिया।

सामाजिक और संगठनात्मक क्रांति: मिशनरी जीवन
वकालत की डिग्री हासिल करने के बाद, भगवान दास जी ने धन कमाने के बजाय ‘पे बैक टू सोसाइटी’ (समाज को लौटाना) का मार्ग चुना। उनके द्वारा स्थापित संस्थाएं और किए गए कार्य आज भी मील का पत्थर हैं:

अम्बेडकर मिशन सोसाइटी (1968)
बाबा साहेब के महापरिनिर्वाण के बाद उनके मिशन को जीवित रखने के लिए उन्होंने इस सोसाइटी की स्थापना की।

समता सैनिक दल का पुनर्गठन
1978 में उन्होंने समता सैनिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के
रूप में कमान संभाली और दलित युवाओं में अनुशासन और संघर्ष का जज्बा भरा।

लीगल एंड सोसाइटी और अम्बेडकर एडवोकेट्स एसोसिएशन
(1987) उन्होंने शोषितों को मुफ्त कानूनी सहायता देने
और बहुजन समाज के वकीलों को संगठित करने के लिए इन मंचों का निर्माण किया।

साहित्यिक अवदान: मैं भंगी हूँ” और वैचारिक प्रहार**
भगवान दास साहेब का सबसे बड़ा प्रहार उनकी कलम थी। उन्होंने महसूस किया कि इतिहास हमेशा विजेताओं ने लिखा है और हारने वालों (शोषितों) को अपमानित किया गया है।

उनकी कृति मैं भंगी हूँ ने समाज की नसों में दौड़ रहे हीनता के भाव को समाप्त कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि सफाई कामगार समाज का इतिहास शौर्य और संघर्ष का इतिहास रहा है, जिसे मनुवादी व्यवस्था ने षड्यंत्रपूर्वक दबा दिया। उन्होंने अपनी लेखनी से मनुवाद की वैचारिक चमड़ी उधेड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया।

वैश्विक मंच पर गर्जना: जेनेवा से संयुक्त राष्ट्र तक
एडवोकेट भगवान दास पहले ऐसे विद्वान थे जिन्होंने भारतीय जातिवाद को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के साथ जोड़कर विश्व मंच पर रखा।

1983 जेनेवा (UNO)
उन्होंने स्विट्जरलैंड के जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र के मंच पर अछूतों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार पर शोध पत्र प्रस्तुत किए। उन्होंने दुनिया को बताया कि भारत का जातिवाद रंगभेद (Apartheid) से भी बदतर है।

अंतरराष्ट्रीय दायित्व
वे एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स के डायरेक्टर और वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस ऑन रिलिजन एंड पीस की भारतीय शाखा के चेयरमैन रहे। उनके भाषणों और लेखों ने जेनेवा से लेकर न्यूयॉर्क तक भारत के शोषितों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।

बहुजन समाज के लिए प्रेरणा और सीख
भगवान दास साहेब का जीवन केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है। बहुजन समाज को उनसे
निम्नलिखित सीख लेनी चाहिए:

  1. बौद्धिक विद्वत्ता सर्वोपरि है
    भगवान दास जी ने सिद्ध किया कि समाज केवल नारों से नहीं, बल्कि तर्क और ज्ञान से बदलता है। हमें अपने बच्चों को उच्च शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर की समझ के लिए प्रेरित करना चाहिए।
  2. अपनी पहचान पर गर्व करें
    उन्होंने “भंगी” शब्द को गाली से बदलकर एक गौरवशाली पहचान में बदला। हमें अपनी जड़ों पर शर्मिंदा होने के
    बजाय अपने संघर्ष के इतिहास पर गर्व करना चाहिए।
  3. संगठन और अनुशासन
    उन्होंने समता सैनिक दल के माध्यम से सिखाया कि बिखरा हुआ समाज कभी शक्ति नहीं बन सकता। एकता और अनुशासन ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
  4. वैश्विक दृष्टिकोण अपनाएं
    हमें अपनी समस्याओं को केवल गाँव या शहर तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें मानवाधिकारों के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।

निष्कर्ष
एडवोकेट भगवान दास साहेब आधुनिक भारत के उन बिरले विद्वानों में से थे, जिन्होंने कलम और कानून के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन की नींव रखी। वे बाबा साहेब के सच्चे अनुयायी और बहुजन समाज के चमकते ध्रुवतारे थे।

आज 23 अप्रैल को, जब हम उनकी स्मृति को नमन कर रहे हैं, तो हमारा वास्तविक नमन तभी होगा जब हम उनकी तरह शिक्षित बनें, संगठित हों और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की सोच विकसित करें।

भगवान दास जी का जीवन हमें पुकार-पुकार कर कह रहा है, उठो, पढ़ो और अपने हक के लिए पूरी दुनिया को चुनौती दो

शत्-शत् नमन महामानव एडवोकेट भगवान दास साहेब!

लेखक
सोहनलाल सिंगरिया
सामाजिक-आर्थिक चिन्तक,ब्यावर (राजस्थान)

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