आज के दौर में सर्व समाज के सामने एक गंभीर और ज्वलंत समस्या उभरकर सामने आई है—बेटों की शादी। यह विषय अब केवल पारिवारिक नहीं रहा, बल्कि सामाजिक असंतुलन का कारण बनता जा रहा है। एक समय था जब विवाह का आधार संस्कार, परिवार, व्यवहार और आपसी समझ हुआ करता था, लेकिन आज यह समीकरण बदलकर “सरकारी नौकरी या आटा-साटा” तक सीमित होता जा रहा है। वर्तमान में समाज में एक ऐसी मानसिकता गहराती जा रही है कि यदि लड़का सरकारी नौकरी में नहीं है, तो वह विवाह के योग्य ही नहीं माना जाता। चाहे उसके परिवार के पास संपन्नता हो, जमीन-जायदाद हो, वह स्वयं पढ़ा-लिखा, संस्कारी, स्वस्थ और मेहनती क्यों न हो—उसकी इन खूबियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। दूसरी ओर, यदि लड़का किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी में है, तो वह तुरंत “योग्य वर” बन जाता है।
यह सोच केवल बेटों के पिता के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। आज हर गाँव में सैकड़ों ऐसे युवा हैं जिनकी उम्र 30 से 45 वर्ष के बीच हो चुकी है, लेकिन केवल सरकारी नौकरी या “आटा-साटा” जैसी शर्तों के कारण उनका विवाह नहीं हो पा रहा। यह स्थिति धीरे-धीरे सामाजिक असंतुलन को जन्म दे रही है। हालांकि इस समस्या का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बेटियों के पिता की चिंता भी वाजिब है। आज के समय में नशाखोरी, जुआ और कर्ज जैसी समस्याओं ने युवाओं को जकड़ लिया है। ऐसे में हर पिता यह चाहता है कि उसका दामाद जिम्मेदार, नशामुक्त और स्थिर जीवन जीने वाला हो। सरकारी नौकरी को वे सुरक्षा और स्थिरता का प्रतीक मानते हैं, इसलिए उनकी प्राथमिकता उसी ओर झुक जाती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल सरकारी नौकरी ही एक अच्छे जीवनसाथी की गारंटी है? क्या एक मेहनती किसान, सफल व्यवसायी या निजी क्षेत्र में कार्यरत युवक एक अच्छा पति नहीं बन सकता? वास्तविकता यह है कि सरकारी नौकरी की आय निश्चित जरूर होती है, लेकिन कई बार किसान और व्यवसायी उससे अधिक सक्षम और आत्मनिर्भर होते हैं। समस्या का समाधान सोच में बदलाव से ही संभव है। बेटों के पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को नशे और गलत आदतों से दूर रखें, उन्हें आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बनाएं। वहीं बेटियों के पिता को भी चाहिए कि वे केवल सरकारी नौकरी को ही प्राथमिकता न दें, बल्कि लड़के के संस्कार, व्यवहार, कार्यक्षमता और चरित्र को महत्व दें।
कुंवारे युवाओं के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। यदि नौकरी या पारंपरिक शर्तें पूरी नहीं हो पा रही हैं, तो निराश होने या गलत रास्ता अपनाने की बजाय अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर आगे बढ़ना चाहिए। आज के समय में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां व्यक्ति अपनी पहचान बना सकता है—चाहे वह कला हो, व्यवसाय हो, राजनीति हो या कोई अन्य क्षेत्र। जब व्यक्ति स्वयं को स्थापित करता है, तो समाज की सोच भी बदलने लगती है।
वास्तव में यह एक कड़वा लेकिन सच्चा तथ्य है कि समाज में स्वार्थ और दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ी है। लेकिन यदि हम सामूहिक रूप से अपनी सोच को संतुलित और सकारात्मक बनाएं, तो इस समस्या का समाधान संभव है। विवाह केवल एक सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो जीवनों का मिलन है—इसे केवल नौकरी और शर्तों के तराजू में तौलना उचित नहीं। समय आ गया है कि हम “सरकारी नौकरी” की अनिवार्यता से आगे बढ़कर “अच्छे इंसान” को प्राथमिकता दें—तभी समाज में संतुलन और खुशहाली कायम रह पाएगी।

✍️ गणपत मेघवाल सामाजिक कार्यकर्ता
नाड़सर ,भोपालगढ़, जोधपुर
