दहेज का दानव और बेटी की मौन पीड़ा“बेटी ने खत तो लिख दिया पर पता क्या लिखे, पिता ने शादी कर दी थी मकान बेचकर।” यह पंक्ति हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई को सामने रखती है। एक पिता अपनी पूरी जिंदगी की कमाई और आशियाना केवल इसलिए बेच देता है कि उसकी बेटी की शादी सम्मान से हो सके। यह स्थिति केवल आर्थिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक दबाव का परिणाम है। ऐसे दबाव को हम जुल्म (अत्याचार) कह सकते हैं। समाज में जब सोसाइटी (समाज) की परंपराएँ इंसानियत से बड़ी हो जाती हैं, तब एक बेटी की खुशियाँ बोझ में बदल जाती हैं। यही दहेज की वह त्रासदी है जो अनगिनत परिवारों को भीतर से तोड़ देती है।

2.पहले के समय में विवाह का अर्थ दो परिवारों का मिलन होता था। माता-पिता अपनी बेटी को आशीर्वाद के साथ कुछ वस्तुएँ देकर विदा करते थे, पर उसमें दिखावा या प्रतिस्पर्धा नहीं होती थी। उस समय रिश्तों की नींव प्रेम और विश्वास पर टिकी होती थी। इस भावना को मोहब्बत (सच्चा प्रेम) कहा जा सकता है। आज के समय में कई लोग विवाह को स्टेटस (प्रतिष्ठा) दिखाने का माध्यम बना देते हैं। जब विवाह प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बन जाता है तो दहेज की मांग भी बढ़ने लगती है। यही परिवर्तन धीरे-धीरे समाज में असमानता और पीड़ा को जन्म देता है।

3.एक लड़की जब विवाह के बाद अपने ससुराल पहुँचती है तो उसके मन में नए जीवन की आशाएँ होती हैं। वह अपने नए परिवार के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश करती है। लेकिन यदि ससुराल वाले दहेज को प्राथमिकता देते हैं तो उसका स्वागत प्रेम से नहीं बल्कि अपेक्षाओं से होता है। ऐसी स्थिति लड़की के मन में गहरी तकलीफ (पीड़ा) पैदा करती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह स्थिति स्ट्रेस (मानसिक तनाव) का कारण बन जाती है। जब किसी रिश्ते की शुरुआत ही अपेक्षाओं और दबाव से होती है, तब वह संबंध लंबे समय तक सुखद नहीं रह पाता।

4.दहेज का लोभ समाज में नैतिक पतन का संकेत है। जब विवाह को लेन-देन का सौदा बना दिया जाता है, तब रिश्तों की पवित्रता समाप्त होने लगती है। इस प्रवृत्ति को लालच (लोभ) कहा जाता है। आधुनिक सामाजिक संरचना में जब हर चीज को मार्केट (बाज़ार) की दृष्टि से देखा जाने लगता है, तब संबंध भी वस्तु की तरह प्रतीत होने लगते हैं। यह मानसिकता परिवारों के बीच प्रेम और विश्वास को कमजोर करती है। परिणामस्वरूप विवाह का पवित्र बंधन एक आर्थिक समझौते में बदल जाता है।

5.इसके विपरीत जो समाज दहेज को अस्वीकार करता है, वहाँ विवाह सम्मान और समानता पर आधारित होता है। ऐसे परिवारों में बेटी को नए घर की सदस्य के रूप में स्वीकार किया जाता है, न कि किसी लेन-देन के परिणाम के रूप में। इस सोच में इंसाफ (न्याय) की भावना दिखाई देती है। आधुनिक सामाजिक दृष्टिकोण इसे इक्वालिटी (समानता) के रूप में समझता है। जब विवाह समानता पर आधारित होता है तो परिवार में विश्वास और स्नेह का वातावरण बनता है। ऐसे समाज में रिश्ते अधिक स्थायी और संतुलित होते हैं।

6.दहेज की प्रथा का सबसे बड़ा प्रभाव गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। कई माता-पिता अपनी बेटियों की शादी के लिए कर्ज़ लेने पर मजबूर हो जाते हैं। यह आर्थिक बोझ उन्हें वर्षों तक परेशान करता है। इस स्थिति को मजबूरी (लाचारी) कहा जा सकता है। आर्थिक दृष्टि से यह इकोनॉमी (अर्थव्यवस्था) पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है। जब विवाह जैसी पवित्र परंपरा आर्थिक संकट का कारण बन जाए, तो यह संकेत है कि समाज को अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा।

7.एक बेटी अपने मायके और ससुराल दोनों के प्रति गहरा प्रेम रखती है। वह चाहती है कि दोनों परिवारों के बीच सम्मान और स्नेह बना रहे। लेकिन दहेज की मांग उस संतुलन को तोड़ देती है। इससे उसके मन में गहरा दर्द (पीड़ा) पैदा होता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह उसकी इमोशन (भावना) को प्रभावित करता है। जब भावनात्मक संतुलन टूटता है तो परिवारों के बीच दूरी बढ़ने लगती है। यही कारण है कि दहेज केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि भावनात्मक संकट भी है।

8.जो समाज दहेज से दूर रहता है, वह शिक्षा और नैतिकता को प्राथमिकता देता है। ऐसे समाज में बेटियों को बोझ नहीं बल्कि शक्ति माना जाता है। इस सकारात्मक सोच को तरक्की (प्रगति) कहा जा सकता है। आधुनिक विकास की भाषा में इसे डेवलपमेंट (विकास) कहा जाता है। जब बेटियों को शिक्षा और अवसर मिलते हैं तो वे समाज के हर क्षेत्र में योगदान देती हैं। यही वह मार्ग है जो समाज को सच्ची उन्नति की ओर ले जाता है।

9.दहेज के लोभी समाज और दहेज मुक्त समाज के बीच सबसे बड़ा अंतर सोच का होता है। एक समाज परंपरा के नाम पर शोषण को स्वीकार करता है, जबकि दूसरा समाज मानवता और न्याय को महत्व देता है। इस मानवीय सोच को खैरख्वाही (भलाई की भावना) कहा जा सकता है। आधुनिक सामाजिक विचार इसे मॉरल वैल्यू (नैतिक मूल्य) के रूप में पहचानता है। जब समाज के नैतिक मूल्य मजबूत होते हैं तो अन्याय और भेदभाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।

10.अंततः यह समझना आवश्यक है कि दहेज की प्रथा को समाप्त करने के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज की सोच बदलनी होगी। जब युवक स्वयं यह निर्णय लें कि वे दहेज नहीं लेंगे, तब वास्तविक परिवर्तन संभव होगा। इस जागरूकता को बदलाव (परिवर्तन) कहा जा सकता है। सामाजिक आंदोलनों की भाषा में इसे रिफॉर्म (सुधार) कहा जाता है। जब समाज में सुधार की भावना जागती है तो बेटियों का जीवन सुरक्षित और सम्मानपूर्ण बनता है।

समापन शेर:
दहेज की आग में रिश्तों की रौशनी बुझती है,
जहाँ बेटी बिके, वहाँ इंसानियत भी रोती है।

संकलन कर्ता हगामी लाल मेघवंशी ,रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक। 98292 30966

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