भूमिका
भारत को “विकसित राष्ट्र” बनाने का सपना अक्सर उद्योगपतियों, स्टार्टअप्स और कॉरपोरेट जगत की चमकती कहानियों से जोड़ा जाता है। हमें बार-बार बताया जाता है कि प्राइवेट सेक्टर ही इनोवेशन (नवाचार), ग्रोज़्थ (विकास) और जॉब क्रिएशन (रोज़गार सृजन) का असली इंजन है। ऊँची इमारतें, यूनिकॉर्न कंपनियाँ और तेज़ी से बढ़ता मार्केट (बाज़ार) एक आधुनिक भारत की तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन ज़रा ठहरकर देखें — क्या यह तस्वीर पूरी है, या इसके पीछे कोई छुपी हुई हक़ीक़त (सच्चाई) भी है?

आज असली सवाल यह नहीं कि प्राइवेट सेक्टर ज़रूरी है या नहीं, बल्कि यह है कि उसकी प्राथमिकता क्या है — इनोवेशन (नवाचार) या सिर्फ प्रॉफिट (मुनाफा)? क्या भारतीय निजी कंपनियाँ जोखिम उठाकर नई खोजों में निवेश कर रही हैं, या वे तैयार तकनीक खरीदकर तेज़ मुनाफे का मॉडल (ढाँचा) अपनाने में अधिक सहज हैं? यही बहस भारत के आर्थिक भविष्य की दिशा तय करेगी।

  1. R&D में कम निवेश – नवाचार से दूरी
    भारत में निजी कंपनियों द्वारा आर एंड डी (अनुसंधान एवं विकास) पर किया जाने वाला निवेश विकसित देशों की तुलना में काफ़ी कम है। ज़्यादातर कॉरपोरेट संस्थान त्वरित रिटर्न (लाभ वापसी) वाले क्षेत्रों में पूँजी लगाना ज़्यादा मुनासिब (उचित) समझते हैं, जबकि बुनियादी वैज्ञानिक शोध समय, धैर्य और जोखिम माँगता है। नतीजतन नई तकनीकों की बुनियाद अक्सर पब्लिक संस्थानों — जैसे आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान), इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) और सरकारी प्रयोगशालाओं — में तैयार होती है। निजी क्षेत्र बाद में इन्हें व्यावसायिक रूप देकर मार्केट (बाज़ार) में उतारता है। यह सूरत-ए-हाल दिखाती है कि असली नवाचार का बोझ अब भी सार्वजनिक तंत्र पर है, जबकि निजी कंपनियाँ अपेक्षाकृत सुरक्षित और लाभकारी मरहले में प्रवेश करना ज़्यादा फ़ायदेमंद (लाभदायक) मानती हैं।
  2. सुरक्षित मुनाफा, जोखिम सरकार का

कई बड़े प्रोजेक्ट्स में शुरुआती रिस्क (जोखिम) सरकार उठाती है — इंफ्रास्ट्रक्चर, वैज्ञानिक रिसर्च (अनुसंधान), रक्षा तकनीक और सार्वजनिक ढाँचे के विकास में भारी निवेश पहले राज्य करता है। इन चरणों में नतीजे अनिश्चित होते हैं, इसलिए निजी क्षेत्र अक्सर दूरी बनाए रखता है। लेकिन जैसे ही परियोजना स्थिर होने लगती है और मुनाफे की उम्मीद (आशा) साफ दिखने लगती है, निजी कंपनियाँ साझेदारी या अधिग्रहण के लिए आगे आ जाती हैं। इस पूरी सूरत-ए-हाल में जोखिम जनता का और फायदा चुनिंदा कंपनियों का हो जाता है। यही मॉडल “पब्लिक रिस्क, प्राइवेट प्रॉफिट” (जनता का जोखिम, निजी मुनाफा) कहलाता है, जो आर्थिक इंसाफ (न्याय) और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

  1. क्रोनी कैपिटलिज्म का बढ़ता असर

जब सत्ता और पूँजी के बीच गहरा गठजोड़ बन जाता है, तो उसे क्रोनी कैपिटलिज्म (पक्षपाती पूँजीवाद) कहा जाता है। इस निज़ाम में कुछ चुनिंदा कंपनियों को नीतिगत फ़ैसलों में रियायत (छूट), सस्ती ज़मीन, टैक्स में राहत और बड़े सरकारी ठेके मिलते हैं। बाहरी तौर पर यह विकास जैसा दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर प्रतिस्पर्धा कमज़ोर पड़ने लगती है। छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए मौक़ा (अवसर) सिमट जाता है, जबकि बड़े समूह और मज़बूत होते जाते हैं। नतीजतन मोनोपॉली (एकाधिकार) बढ़ती है और बाज़ार का संतुलन बिगड़ता है। यह सूरत-ए-हाल न सिर्फ आर्थिक इंसाफ (न्याय) को प्रभावित करती है, बल्कि लोकतांत्रिक नीतियों की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करती है।

  1. स्टार्टअप संस्कृति: असली नवाचार या वैल्यूएशन का खेल?

भारत में स्टार्टअप (नव-उद्यम) की तेज़ रफ़्तार वृद्धि को अक्सर नई अर्थव्यवस्था की कामयाबी (सफलता) बताया जाता है। लेकिन गहराई से देखें तो सवाल उठता है कि इन उद्यमों में कितना वास्तविक वैज्ञानिक या तकनीकी नवाचार हो रहा है। बड़ी तादाद ई-कॉमर्स, फूड डिलीवरी और फिनटेक जैसे पहले से मौजूद मॉडल (ढाँचा) को दोहराने में लगी है। ध्यान प्रोडक्ट की सामाजिक उपयोगिता से ज़्यादा वैल्यूएशन (कंपनी का अनुमानित मूल्य) बढ़ाने पर रहता है, ताकि निवेश आकर्षित हो सके। इस दौड़ में समाज की दीर्घकालिक ज़रूरतें और बुनियादी समस्याओं के हल (समाधान) पीछे छूट जाते हैं। नतीजतन चमक तो दिखती है, मगर ठोस नवाचार कम नज़र आता है।

  1. अमीरी-गरीबी की खाई और प्राइवेट सेक्टर

तेज़ी से बढ़ती वेल्थ गैप (धन असमानता) इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि विकास का फायदा बराबरी से तक़सीम (वितरित) नहीं हो रहा। एक तरफ़ बड़े कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे और संपत्ति में लगातार इज़ाफ़ा (वृद्धि) हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ मजदूरों और निम्न आय वर्ग की आमदनी उसी रफ़्तार से नहीं बढ़ पाती। रोज़गार तो बनते हैं, मगर ज़्यादातर कम वेतन और अस्थायी प्रकृति के होते हैं। यह सूरत-ए-हाल सामाजिक बेचैनी (अशांति) और असंतोष को जन्म देती है। जब मेहनत करने वाला वर्ग अपने हिस्से का न्याय नहीं पाता, तो आर्थिक तरक्की का दावा (दावा) खोखला लगने लगता है और समाज में संतुलन बिगड़ने का ख़तरा बढ़ जाता है।

  1. प्लूटोक्रेसी की ओर बढ़ता झुकाव

जब आर्थिक ताक़त कुछ गिने-चुने हाथों में सिमट जाती है, तो उसका असर सियासत (राजनीति) पर भी साफ़ दिखने लगता है। इसी हालात को प्लूटोक्रेसी (धनकुबेरों का शासन) कहा जाता है, जहाँ दौलतमंद तबक़ा नीतियों की दिशा तय करने में ज़्यादा असरदार हो जाता है। चुनावी चंदे, लॉबिंग और नीतिगत दबाव के ज़रिये बड़े कॉरपोरेट अपने हितों के मुताबिक़ फ़ैसलों को प्रभावित कर सकते हैं। नतीजतन आम जनता की ज़रूरतें और सामाजिक सरोकार पीछे छूटने लगते हैं। यह रुझान लोकतंत्र के बुनियादी उसूल (सिद्धांत) — समानता और जनहित — को कमज़ोर कर देता है, जिससे व्यवस्था का संतुलन धीरे-धीरे बिगड़ने लगता है।

  1. पब्लिक बनाम प्राइवेट: असली इनोवेटर कौन?

भारत के कई बड़े और बुनियादी नवाचारों की जड़ें पब्लिक सेक्टर में मिलती हैं। अंतरिक्ष मिशन, जीवनरक्षक दवाओं का शोध, और डिजिटल भुगतान की आधारभूत इन्फ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचा) — इन सबकी शुरुआती बुनियाद सरकारी संस्थानों ने तैयार की। इन प्रयासों में लंबा समय, भारी निवेश और ऊँचा जोखिम शामिल था, जिसे निजी क्षेत्र ने अक्सर सीधे उठाने से परहेज़ किया। बाद में निजी कंपनियों ने इन्हीं उपलब्धियों को आगे बढ़ाकर सेवाओं का विस्तार किया और उपभोक्ताओं तक सुविधाएँ पहुँचाईं। यानी असली वैज्ञानिक खोज और तकनीकी बुनियाद (आधार) सार्वजनिक तंत्र से आई, जबकि निजी क्षेत्र ने उन्हें व्यावसायिक रूप देकर बाज़ार में कामयाबी (सफलता) हासिल की। यही अंतर “इनोवेशन” और “व्यापार विस्तार” के बीच की लकीर को स्पष्ट करता है।

  1. बिज़नेस एथिक्स की अनदेखी

सिर्फ मार्केट शेयर (बाज़ार हिस्सेदारी) बढ़ाने की होड़ में कई कंपनियाँ पर्यावरण, श्रमिक अधिकार और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे अहम पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। मुनाफे की अंधी दौड़ में कामगारों की सुरक्षा, उचित वेतन और मानवीय कामकाजी हालात अक्सर पीछे छूट जाते हैं। इसी तरह प्रदूषण, संसाधनों के अत्यधिक दोहन और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले असर को भी कम तवज्जो (ध्यान) दी जाती है। बिज़नेस एथिक्स (व्यावसायिक नैतिकता) पर सेमिनार और रिपोर्ट्स तो खूब बनती हैं, मगर ज़मीनी स्तर पर उनका ईमानदार पालन (अनुपालन) कम दिखाई देता है। यह रवैया कॉरपोरेट जगत की साख (विश्वसनीयता) पर सवाल खड़े करता है और दीर्घकाल में समाज व अर्थव्यवस्था दोनों के लिए नुक़सानदेह साबित हो सकता है।

समापन

प्राइवेट सेक्टर न पूरी तरह क़सूरवार (दोषी) है, न बिल्कुल बेदाग़ (निर्दोष)। वह देश की अर्थव्यवस्था का अहम स्तंभ है, मगर उसे “इनोवेटर” कहने से पहले यह देखना ज़रूरी है कि उसका रुख़ किस दिशा में है। अगर इनोवेशन (नवाचार), सामाजिक ज़िम्मेदारी और बराबरी पर आधारित विकास उसकी प्राथमिकता नहीं बनते, तो वह सिर्फ प्रॉफिट मेकर (मुनाफा कमाने वाली इकाई) बनकर रह जाएगा।

“विकसित भारत” का सपना तभी हक़ीक़त (सच्चाई) बनेगा, जब निजी पूँजी सिर्फ फ़ायदे तक सीमित न रहकर राष्ट्र निर्माण में भी अपना किरदार निभाए। वरना विकास की चमक के पीछे नाइंसाफ़ी (अन्याय) और असंतुलन की लंबी परछाईं समाज को भीतर ही भीतर कमज़ोर करती रहेगी।

संकलन कर्ता

हगामी लाल मेघवंशी
रिटायर्ड
ड्यूटी
कमिश्नर, आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतक।
9829 230 966

स्रोत और संदर्भ

डा .पुरुषोत्तम मेघवाल के वीडियो से प्रेरणा एवं
सरकारी आर्थिक सर्वे, आरबीआई रिपोर्ट, नीति आयोग अध्ययन, विश्व बैंक डेटा, कॉरपोरेट वार्षिक रिपोर्ट, श्रम संगठन आँकड़े, शोध पत्र।

अस्वीकरण
यह लेख विश्लेषणात्मक उद्देश्य से है, किसी संस्था या व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं, पाठक स्वयं तथ्यों की जाँच करें।

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