
(भारतीय चिकित्सा शिक्षा में पूँजी का एकाधिकार, वंचितों का संघर्ष और स्वास्थ्य व्यवस्था का यथार्थ)
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति) सोहन लाल सिंगारिया
आमुख: मेरिट का ढोल और धरातल की हकीकत
हमारे देश में जब भी सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व अथवा वंचित वर्गों के अधिकारों की बात उठती है, तो एक खास तबका मेरिट (योग्यता) की दुहाई देकर आसमान सिर पर उठा लेता है।
सोशल मीडिया से लेकर ड्राइंग रूम तक यह नैरेटिव गढ़ा जाता है कि मेरिट केवल अंकों से तय होती है और आरक्षण से योग्यता प्रभावित होती है। लेकिन क्या कभी किसी ने उस वास्तविक ‘मेरिट’ की पड़ताल की है जो बाज़ार के चौराहों पर खुलेआम बिक रही है?
आज की कड़वी सच्चाई यह है कि देश की समूची चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था में योग्यता, प्रतिभा और कठिन परिश्रम, अथाह धनबल के आगे पूरी तरह नतमस्तक हैं।
पैसा हो तो 720 में से मात्र 200 अंक (न्यूनतम क्वालिफाइंग) लाने वाला धना सेठ का नाकारा चिराग भी डॉक्टर बन जाता है, और पैसा न हो तो 450–500 से अधिक अंक लाने वाला गरीब, दलित, पिछड़ा या सामान्य वर्ग का निर्धन मेधावी छात्र जीएनएम (GNM) या बीएससी नर्सिंग की सामान्य डिग्री के लिए भी तरस जाता है।
यह विमर्श किसी वर्ग-विशेष का नहीं, बल्कि ‘पूँजीपति बनाम साधनहीन’ के उस गहरे शोषणकारी तंत्र का है, जिसे समझना हर नागरिक के लिए अनिवार्य है।
- सीटों का गणित: निजीकरण की चौखट पर बिकती मेधा
देश में कुल एमबीबीएस (MBBS) सीटों के आँकड़े ही इस षड्यंत्र की पहली गवाही देते हैं
सरकारी क्षेत्र (मात्र 46%): देश भर में लगभग 445 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें कुल सीटों की संख्या लगभग 63,971 है।
निजी एवं डीम्ड संस्थान (लगभग 54%): लगभग 391 संस्थान हैं, जहाँ 76,243 से अधिक सीटें सीधे बाज़ार के हवाले हैं।
अर्थात, देश की आधी से अधिक मेडिकल सीटें सिर्फ उनके लिए सुरक्षित हैं जिनकी जेब में करोड़ों रुपये हैं। इसे यदि सीधे शब्दों में कहें, तो 54 प्रतिशत सीटों पर केवल और केवल ‘आर्थिक आरक्षण’ लागू है, जहाँ प्रवेश की एकमात्र पात्रता ‘अमीर घराने का होना’ है।
- अंकों का खुला विरोधाभास 200 अंक बनाम 550+ अंक
नीट (NEET-UG) की परीक्षा 720 अंकों की होती है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) हर साल एक न्यूनतम क्वालिफाइंग कट-ऑफ जारी करती है—जो सामान्य वर्ग के लिए लगभग 200–215 और आरक्षित वर्गों के लिए 175 अंक के आसपास होती है।
इस कट-ऑफ का असली सच क्या है?
साधनहीन छात्र के लिए: यदि गरीब, किसान, मजदूर अथवा बहुजन समाज का छात्र 450, 500 या 520 अंक भी ले आए, तो सरकारी कॉलेज की सीमित सीटों (हाई कट-ऑफ) के कारण उसे ‘अनुत्तीर्ण’ या सीट से बाहर मान लिया जाता है। उसके अंक श्रेष्ठ होने के बावजूद वह डॉक्टर नहीं बन सकता।
करोड़पति के बच्चे के लिए:
यदि किसी रईसजादे के मात्र 200 अंक आते हैं और उसकी ऑल इंडिया रैंक 4 लाख से 6 लाख के पार भी होती है, तो भी वह निजी कॉलेज या डीम्ड यूनिवर्सिटी में मैनेजमेंट/एनआरआई कोटे की मेज पर करोड़ों रुपये फेंककर उसी दिन डॉक्टर बनने का टिकट कटा लेता है।
जो व्यक्ति राजकीय मेडिकल कॉलेजों की कठोर मेरिट में पूरी तरह ‘अपात्र’ था, वह निजी संस्थान में करोड़ों की थैली खोलते ही रातों-रात ‘पात्र’ और ‘योग्य’ मान लिया जाता है। क्या इसे योग्यता कहेंगे या धनबल की नग्न तानाशाही?
- खर्च की खाई
सपनों की नीलामी
शिक्षा का अर्थशास्त्र जब जीवन-मरण का सवाल बन जाए, तो विषमता की खाई और चौड़ी दिखने लगती है:
प्राइवेट मेडिकल कॉलेज व डीम्ड यूनिवर्सिटीज: 5.5 वर्ष की एमबीबीएस का कुल पैकेज ₹1 करोड़ से लेकर ₹2.5 करोड़ तक पहुँच चुका है।
यहाँ सालाना फीस ही ₹15 लाख से ₹30 लाख तक होती है। यह खर्च देश के 95% परिवारों की कल्पना से भी बाहर है।
विदेशों से एमबीबीएस (FMGE की भूलभुलैया): निजी कॉलेजों की लूट से घबराकर हर साल 15,000 से अधिक मध्यमवर्गीय छात्र रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान या चीन भागते हैं। वहाँ 25 से 45 लाख रुपये खर्च होते हैं, लेकिन भारत लौटने पर विदेशी ग्रेजुएट परीक्षा (FMGE) की जटिलता के कारण 80 से 85 प्रतिशत छात्र वर्षों तक लाइसेंस के लिए भटकते रह जाते हैं।
नर्सिंग तक के लाले
दूसरी तरफ, जिस साधनहीन परिवार के बच्चे ने रात-दिन एक कर पढ़ाई की, वह निजी कॉलेज तो दूर, जीएनएम या बीएससी नर्सिंग कॉलेज की 1 से 2 लाख रुपये सालाना की फीस तक नहीं भर पाता और उसका डॉक्टर बनने का सपना खेतों या छोटी-मोटी नौकरियों में दम तोड़ देता है।
- 46% सरकारी सीटें भी गरीबों की पहुँच से बाहर क्यों?
प्रायः यह तर्क दिया जाता है कि गरीब छात्र सरकारी कॉलेज में चले जाएँ। किंतु यथार्थ क्या है?
कई राज्यों के सरकारी एवं सेमी-गवर्नमेंट (राजमेस/सोसायटी स्तर के) कॉलेजों में सालाना ट्यूशन फीस, हॉस्टल, मेस, कॉशन मनी और किताबों का खर्च मिलाकर 5.5 साल में ₹5 लाख से ₹15 लाख बैठता है।
एक बीपीएल परिवार, खेतिहर मजदूर, दैनिक वेतनभोगी या तृतीय-चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के लिए ₹5 से ₹10 लाख का प्रबंध करना भी पहाड़ तोड़ने जैसा है।
बैंक एजुकेशन लोन देने में सैकड़ों कागजी अड़ंगे लगाते हैं।
परिणाम यह होता है कि मेधावी गरीब छात्र मेरिट लिस्ट में नाम आने के बाद भी कई बार फीस के अभाव में दाखिला छोड़ देते हैं या भारी कर्ज के दलदल में धकेल दिए जाते हैं।
- नीतिगत माँगें एवं ठोस समाधान
यदि वास्तव में देश को ईमानदार, योग्य और संवेदनशील स्वास्थ्य ढांचा देना है, तो इस पूँजीवादी तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए सरकार को अविलंब निम्नलिखित ऐतिहासिक कदम उठाने होंगे
सरकारी कॉलेजों का अनुपात 90% से 95% हो: देश में निजी क्षेत्र की मनमानी समाप्त कर कम से कम 90 से 95 प्रतिशत मेडिकल कॉलेज पूर्णतः राजकीय (सरकारी) नियंत्रण में संचालित किए जाएँ। स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा व्यापार नहीं, बल्कि राज्य का प्राथमिक लोक-कल्याणकारी दायित्व है।
फीस नाममात्र (₹1,000 से ₹5,000 वार्षिक) तय हो:
सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फीस अखिल भारतीय स्तर पर नॉमिनल की जाए। एम्स (AIIMS) की तर्ज पर वार्षिक शुल्क ₹1,000 से ₹5,000 के भीतर सीमित हो, ताकि एक निर्धनतम परिवार का मेधावी छात्र भी बिना किसी वित्तीय संकोच के अध्ययन कर सके।
गरीब छात्रों के समस्त खर्च का सरकारी वहन: सरकारी कॉलेजों में प्रवेश पाने वाले आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित वर्ग के विद्यार्थियों की पूरी पढ़ाई, आधुनिक हॉस्टल, पौष्टिक भोजन (मेस), स्टेथ scope, पुस्तकें एवं क्लिनिकल उपकरणों का समस्त वित्तीय भार केंद्र व राज्य सरकारें स्वयं वहन करें।
हॉस्टल एवं शैक्षणिक अवसंरचना का विस्तार: प्रत्येक सरकारी मेडिकल कॉलेज में अत्याधुनिक, सुरक्षित और पूर्णतः निःशुल्क आवासीय परिसर विकसित किए जाएँ, जिससे दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले छात्र स्वाभिमान से अपनी शिक्षा पूरी कर सकें।
निष्कर्ष
सच्ची मेरिट झोपड़ियों, ढाणियों, साधारण गाँवों और मध्यमवर्गीय बस्तियों में जलते दीयों की रोशनी में पलती है।
जब तक 200 अंक लाने वाला रईस सिर्फ अपनी दौलत की बदौलत डॉक्टर बनता रहेगा और 500 अंक लाने वाला निर्धन छात्र आर्थिक तंगी की भेंट चढ़ता रहेगा, तब तक ‘योग्यता’ की हर बात एक छलावा और सामाजिक पाखंड मात्र है।
अब समय आ गया है कि बहुजन समाज, सामान्य वर्ग के निर्धन नागरिक और समूचा जागरूक समाज इस आर्थिक विषमता के विरुद्ध लामबंद हो।
शिक्षा और स्वास्थ्य को पूंजीपतियों की जागीर बनने से बचाना ही बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के समतामूलक भारत के स्वप्न को साकार करने का वास्तविक मार्ग है।
लेखक (संकलन एवं प्रस्तुति)
सोहन लाल सिंगारिया सामाजिक-आर्थिक चिन्तक
एवं विचारक ब्यावर- 94622-60179
